गुरुवार, फ़रवरी 27

खुल गए जो बंधन कब के

खुल गए जो बंधन कब के



इक यादों की गठरी है इक सपनों का झोला है, जो इन्हें उतार सकेगा उसमें ही सुख डोला है ! जो कृत्य हुए अनजाने या जिनकी छाप पुरानी, कई बार गुजरता अंतर उन गलियों से अक्सर ही ! खुल गए जो बन्धन कब के तज-तज कर पुनः पकड़ता, ढंग यही आता उसको उनमें खुद व्यर्थ जकड़ता ! सुख बन चिड़िया उड़ जाता मन में ही जो उलझा है, जब तक यह नहीं मिटेगा यह जाल कहाँ सुलझा है !

सोमवार, फ़रवरी 24

मौन

मौन

मन मौन हुआ जाता है 
मुखर हुआ था सदियों पहले 
शब्दों की चादर ओढ़े, 
घर से निकला... घूम रहा था 
अब लौटना चाहता है 
शब्द काफी नहीं उसके लिए 
जो बयान करना चाहे 
मन अब मौन कहा चाहता है 
शब्द नहीं जिसको कहने के लिए 
दुनिया की किसी भाषा में 
ओस कोई कैसे लिखे 
जो रात  बरस जाती है 
हरियाली को तृप्त करती 
बारिश कोई कैसे लिखे 
जो झर-झर, झर जाती है ! 
खत्म हो गयी है शब्दों की पूंजी 
सब खर्च हो गए जितने मिले थे 
दुनिया की उलझन को बयान करते 
अब न उलझनें बचीं न शब्द 
अब इस नाटक पर 
पर्दा डालना चाहता 
खोजना चाहता है उस स्रोत को ही 
जहाँ से शब्द उतरते हैं 
है 

बुधवार, फ़रवरी 19

प्रेम



प्रेम 



प्रेम की नन्ही सी किरण 
हर लेती है सदियों के अंधकार को 
हल्की सी फुहार प्रीत की 
सरसा देती है मन माटी को 
प्रेम ‘उसका’ पता है 
प्रेम जगे जिस अंतर 
वहां कलियाँ  फूटती ही रहती हैं 
सद्भाव की 
जिसने पाया हो परस 
इसकी अनमोल छुवन का 
नहीं रह जाता वह अजनबी 
इस अनन्त सृष्टि  में 
बढ़ाता है हर फूल 
उसकी ओर मैत्री का हाथ 
हवा सहला देती है 
श्रम से भीगे मुख को 
बदलियाँ छाँव बनकर
 हर लेती हैं धूप की गर्माइश 
वह बांटता चलता है 
निश्च्छल मुस्कान 
और बन जाती है 
प्रेम ही उसकी पहचान !

सोमवार, फ़रवरी 17

सोये हैं हम

सोये हैं हम... 


बस जरा सी बात इतनी 
सुख की चादर ओढ़ मन पर 
खोये हैं हम 
सोये हैं हम !
एक सागर रौशनी का 
पास ही कुछ दूर बहता 
पर तमस का आवरण है 
कह इसे कई बार 
यूँ ही रोये हैं हम…!
नींद में भी जागता मन 
फसल स्वप्नों की उगाता 
जाने कितने बीज ऐसे 
बोये हैं हम !
नींद उसकी जागरण भी 
चंचला मति आवरण भी 
जाग देखें कैसी 
भावना सँजोये हैं हम !

शुक्रवार, फ़रवरी 14

ढाई आखर जिसने बांचे

ढाई आखर जिसने बांचे 



ढाई आखर जिसने बाँचे अंतर पिघल-पिघल बह जाये, अधरों पर स्मित नयन मद भरे एक रहस्य मधुर बन जाये ! कदमों में मीरा की थिरकन कानों में कान्हा मुरली धुन, यादें पनघट बनी डोलतीं घटता पी से मिलन प्रतिक्षण ! मानस के उत्तंग शिखर से भावों की इक नदी उतरती कण-कण उर का डूबे जिसमें धुली-धुली मनकाया हँसती ! खो जाता ज्यों नीलगगन में हंस अकेला उड़ता कोई, अंतर सागर में मिल जाता तृप्त हुआ दीवाना सोई !


बुधवार, फ़रवरी 12

जाने क्यों


जाने क्यों

फूलों के अंबार जहाँ हम काँटों को चुन लेते, सुंदरता की खान जहाँ कुरूपता हम बुन लेते ! देव जहां आतुर नभ में आशीषों से घर भरने, स्वयं को ही समर्थ मान लगते बाधा से डरने ! भेद जरा जाना होता इस अनंत जग में आकर, किसके बल पर टिका हुआ किसे रिझाते गा गाकर ! सुख की आशा में डोले झोली में दुःख भर जाता, ‘मन’ होने का ढंग यही कुछ ना उसे और आता !

रविवार, फ़रवरी 9

एक न एक दिन

एक न एक दिन... जहाँ दो हैं संघर्ष जारी रहेगा जहाँ दो हैं मार-काट नहीं रुकेगी कभी दूसरे की सोच पर मार अभी अन्य के विचार की काट जहाँ दो हैं वहाँ अहंकार टकराएगा एक यदि भीरु होगा दूसरा दबाएगा एक यदि सहिष्णु होगा दूसरा सताएगा जहाँ दो होंगे और समझ होगी वहीं चैन होगा जहाँ दो होंगे और आपसी सम्मान होगा वहीं शांति होगी कुछ तत्व हैं जो समझदारी को कमजोरी मानते हैं जो लड़ने-भिड़ने को होशियारी मानते हैं शांति के हिमायती सहते हैं हर अत्याचार पर एक न एक दिन वे भी हो जाते हैं लाचार अब उधर भी जज्बात उभरने लगते हैं अपनी पहचान के दीप जलने लगते हैं अब साफ हो गया है या तो बराबरी और समझदारी ही काम आएगी अन्यथा चैन घटता ही जाएगा....

बुधवार, फ़रवरी 5

मेरा भारत महान

मेरा भारत महान मत कहें स्वयं को देशभक्त कायर हैं हम अपमान सहकर उदासीन होने की आदत हो गयी है हमें हजार वर्षों की गुलामी ने पंगु बना दिया है हमारी सोच को विदेशी ताकतों ने देश पर ही राज नहीं किया हमारी चेतना पर भी राज किया जो या तो निर्लिप्त है या अनभिज्ञ होने का स्वांग रचती है हमें जगाया शंकराचार्य ने, स्वामी दयानन्द ने हम कहाँ जागे हुंकार भरी स्वामी विवेकानन्द ने हमने तब भी यकीन नहीं किया आज भी जगाया जा रहा है हम इधर-उधर ताकने लगते हैं शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन दबाकर सोचते हैं हम सुरक्षित हैं हम प्रेम तो कर ही नहीं सकते नफरत भी हमें नहीं आती अहिंसा के आवरण में अपनी कायरता को छिपाये हम सिनेमा हाल में राष्ट्रगान गा लेने को ही देश भक्ति समझ लेते हैं !

सोमवार, फ़रवरी 3

पारिजात हों उपवन में

पारिजात हों उपवन में

मानस हंस ध्यान मोती 
चुन-चुन कर पुलकित होता, 
सुमिरन डोरी में जिसको 
अंतर मन निरख पिरोता !

मुस्कानों में छलक उठे 
सच्चे मोती की आभा, 
जिसने पहचाना सच को  
दुनिया में वही सुभागा !

ध्यान बिना अंतर मरुथल 
मन पंछी फिरे उदासा,
रस की भीनी धार बहे 
वह है प्यासा का प्यासा !

कोई जो डुबकी मारे 
छू भी लेता उस घट को, 
अमृत छलक रहा निरन्तर 
खोलो उर घूँघट पट को !

ध्यान बरसता मृदु रस सा 
कण-कण काया का हुलसे, 
खोजें इक सागर गहरा
व्यर्थ ही ताप में झुलसें !

तृप्त हुआ जब मन सुग्गा 
बस इक ही नाम रटेगा, 
कृत-कृत्य जगत में डोले 
ज्यों मन्द समीर बहेगा !

या सुवास बन फैलेगा  
जग के इस सूनेपन में, 
शब्द सहज झरेंगे ज्यों 
पारिजात हों उपवन में !

रविवार, फ़रवरी 2

सुख की फसल भीतर खिले

उन सभी बच्चों के नाम जिनका आज जन्मदिन है और जो घर से दूर हैं

सुख की फसल भीतर खिले


 है गगन सीमा तुम्हारी उसके पहले मत थमो, बिखरी हुईं मन रश्मियां इक पुंज अग्नि का बनो ! जब नयन खोले थे यहाँ अज्ञात थी सारी व्यथा, कुछ खा लिया फिर सो गए इतनी ही थी जीवन कथा ! फिर भेद मेधा के खुले सारा जगत पढ़ने को था, थी हर कदम पर सीख कुछ हर दिवस बढ़ने को था ! अनन्त है सभी कुछ यहाँ अभाव केवल भ्रम ही है, सीमित इसे हमने किया मंजिल कदम-कदम ही है! खुद का भरोसा नित करो मन में न भय कोई पले, है स्वप्न में जन्नत अगर सुख की फसल भीतर खिले ! दूर घर से देश से भी जन्मदिन पर लो दुआएं, नव वर्ष बीते सुख भरा मिल सभी यह गीत गाएं !