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सोमवार, मार्च 16

जहाँ खुला आकाश मात्र था

जहाँ खुला आकाश मात्र था 


भ्रम के कितने सर्प पल रहे 

मानव को ख़ुद ही डसते हैं, 

 लगती होड़ सुपर होने की 

अहंकारी मुल्क भिड़ते हैं !


जहाँ खुला आकाश मात्र था 

मानव ने दीवारें गढ़ लीं, 

सीमाओं में बाँधा मन को 

जहाँ प्रेम था, हिंसा पढ़ ली ! 


पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें 

मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की, 

कोई इन्हें तोड़ने निकले 

झर जाएँगी भुर भुर करतीं !


जो जैसा है, वैसा ही है 

होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये, 

 तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का 

जोड़, मोड़ से वापस आये ! 


गुरुवार, अगस्त 15

स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ

स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ 


गगन  रंगा  केसरिया आज 

प्रकृति  भी फहराये तिरंगा, 

माटी का इक खंड नहीं है 

भारत भू है दिल धरती का !


देश आज आगे बढ़ता है 

बाधायें कितनी भी आएँ, 

क़ुर्बानी देकर जो पायी 

आज़ादी नव स्वप्न दिखाए !


सागर की धुर गहराई हो 

या अंतरिक्ष की ऊँचाई, 

देश-विदेश भारतीयों ने 

प्रतिभाओं की अलख जगायी !


माना अभी राह लंबी है

विकसित होने में भारत के,

इकजुट होकर पूर्ण करेंगे 

स्वप्न सभी भारतीय मिल के !


शनिवार, फ़रवरी 19

चलना है हमको नव पथ पर

 चलना है हमको नव पथ पर 

देश, प्रदेश, शहर, गाँव सभी 

बुला रहे हैं हसरत भर कर,  

हाथ मिला लें, कदम बढ़ा लें 

चलना है हमको नव पथ पर  !


माना लंबी राह सामने 

निकल पड़ें हम साथ डगर पर, 

इक दूजे का हाथ थामते 

सारा जग लगता आँगन घर !


बनें चेतना की चिंगारी 

जगमग दीप जलाएँ मिलकर, 

ज्योति उस करुणामयी माँ की

चलती फिरती आग बनें फिर !

 

भस्म करे सारी भय बाधा 

पथ प्रशस्त कर दे जीवन का, 

बाहर भीतर भेद मिटा दे 

 पावन वही प्रकाश बनें हम !


चाहे दुःख  की ज्वालाएँ हों 

 शीतल सावन हो अंतर में, 

जो न कभी कम हो बहने से 

नयनों का उल्लास बनें हम !


शुक्रवार, अप्रैल 30

घड़ी विचित्र यह दौर अनोखा

घड़ी विचित्र यह दौर अनोखा


जूझ रहा है देश आजकल 

जिस विपदा से वह है भारी,

तुच्छ हुई है सम्मुख उसके 

जो कुछ भी की थी तैयारी !


हैं प्रकृति के नियम अनजाने 

मानव जान, जान न जाने, 

घड़ी विचित्र यह दौर अनोखा 

कभी न पहले ऐसा देखा !


कोटि-कोटि जन होते पीड़ित 

उतनी हम सांत्वना बहायें,

भय आशंका के हों बादल 

श्रद्धा का तब सूर्य जलाएं !


पृथ्वी का जब जन्म हुआ था 

अनगिन बार बनी यह बिगड़ी,  

प्रलय भी झेली, युद्ध अनेक

 महामारियों की विपदा भी !


किन्तु सदा सामर्थ्यवान हो 

विजयी बन वसुधा उभरी है 

इसकी संतानों की बलि भी 

व्यर्थ नहीं कभी भी हुई है 


सब जन मिलकर करें सामना 

इक दिन तो यह दौर थमेगा, 

मृत्यु-तांडव, विनाशी-लीला  

देख-देख मनुज संभलेगा !


जीतेगी मानवता इसमें 

लोभी मन की हार सुनिश्चित, 

जीवन में फिर धर्म जगेगा 

मुस्काएगी पृथ्वी प्रमुदित !


 

शुक्रवार, अगस्त 14

स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हार्दिक शुभकामनायें

 देश हमारा 

 

सदा सत्य की राह दिखाता

गीत शांति का रहे सुनाता, 

‘वसुधैव कुटुंबकम’ मानकर 

सदा सभी का सुहित चाहता !

 

देश हमारा आगे बढ़ता 

सुख-समृद्धि के मार्ग खोलता, 

हर आपदा को दे चुनौती 

हँसकर मिलकर उसको सहता !

 

शांति यहाँ का मूलमन्त्र है 

परम अनूठा लोकतंत्र है, 

साथ निभाता सब देशों का 

कोरोना जब विश्व झेलता !

 

लहर तिरंगा यही सुनाए

भारत की संस्कृति फैलाये, 

राम-कृष्ण की पावन धरती    

कण-कण इसका प्रीत सिखाये !

 

हर मन में आह्लाद भरा  है 

आज स्वतन्त्रता दिवस मनाएं, 

महिमामय भविष्य सम्मुख है 

धैर्य से वर्तमान निभाएं !

 


मंगलवार, जून 2

आह्वान

आह्वान 


चलो सँवारें गाँव देश को 
सूखे पत्ते जरा बुहारें
भूलों के जो बने खंडहर
उन्हें गिराकर
या भावी की आशंकाएँ 
जो घास-फूस सी उग आयी हैं 
उन्हें हटाकर 
सूरज को फिर दे आमन्त्रण 
वर्तमान के इस शुभ पल में  
फूल खिला दें 
ग्राम्य देवता धीरे से आ 
कर कमलों से उन्हें हिला दें 
सुखद स्मृति कोई पावन 
बहे यहाँ फिर शुभ यमुना बन 
तट पर जिसके बजे बाँसुरी
हँसे कन्हैया का वृंदावन 
चलो पुकारें, दे आमन्त्रण 
हर शुभता को 
उगे हुए झंखाड़ उखाड़ें 
आशंका की यदि बदलियां 
छायीं मन पर 
बह जाने दें झरते जल को 
भीग उठे श्यामल धरती का 
हर इक रज कण !

बुधवार, नवंबर 30

जागरण


 जागरण 

सोयी हुई देशभक्ति भी 
जाग  रही है दिल में सबके,
खोयी हुई आस्था जागी 
मूल्यों के प्रति हर अंतर में !

तप कर सोना कुंदन बनता 
जनता तप हेतु तैयार,
घण्टों पंक्ति में लगकर भी 
कम न होता दिल में प्यार !

भारत नए दौर में पहुँचा 
नई ऊर्जा नई  लहर है,
पारदर्शिता लेन-देन में 
नई चेतना डगर-डगर है !

 नहीं  रुकेगी यह यात्रा 
अब स्वर्णिम युग की आहट  है 
जो न इसके संग चल रहे 
उन कदमों में घबराहट है !

दुनिया देखे परिवर्तन को  
देश नई करवट लेता है,
नव गति, नव उल्लास समेटे 
'सत्यमेवजयते' गाता  है !






बुधवार, नवंबर 16

बदल रहा है देश

बदल रहा है देश

लोग निकल रहे हैं घरों से
छोटे-बड़े सब समान होकर खड़े हैं लम्बी-लम्बी कतारों में
जिन्हें एक नहीं कर पाये सद उपदेश और भगवान
उन्हें एक ही कतार में ले आया है इस देश का संविधान
आखिर प्रधानमन्त्री को चुना है जनता ने
उसका संवैधानिक हक है
जनता को जागरूक बनाना
देश से भ्रष्टाचार मिटाना
अब किसी को हिम्मत नहीं होगी
नोटों से भरे तिजोरी
या फिर बेहिसाब कमाई में से करे कर चोरी
अब इस देश का कोई माईबाप है
जिसको देना हर किसी को जवाब है
देश बदल रहा है
हमको भी बदलना है
न कि ‘सब चलता है’ का मन्त्र जपना है
अब यहाँ बेईमानी नहीं चलेगी
अभी तो गंदगी फ़ैलाने वालों की नकेल भी कसेगी
स्वच्छ भारत का सपना अब हकीकत बन रहा है
वाकई देश बदल रहा है !

बुधवार, मई 20

गाँठ सभी खोल लो


गाँठ सभी खोल लो
  

एक वर्ष और बीता
गठरी न बांधो और
जाने कब चलना हो
अंतिम हो कौन भोर ?

हल्का ही मन रहे
सफर जाने कैसा हो,
गाँठ सभी खोल लो
कौड़ी न पैसा हो !

एक ही लगन रहे
जाना है उसी देश,
कोई जहाँ तके राह
भटके बहुत परदेश !

सोमवार, जुलाई 28

जहाँ मौसम बदलते नहीं

जहाँ मौसम बदलते नहीं


जहाँ कोई नहीं दूसरा
एक ऐसा भी देश है
जो नहीं धारण किया जाता प्रदर्शन के लिए
एक ऐसा भी वेश है
जहाँ टूट जाती हैं सब बेड़ियाँ
छूट जाती हैं रागात्मक छवियाँ
एक ऐसा भी प्रदेश है
जहाँ ठहर जाता है काल का रथ
ध्वनि का होता नहीं प्रवेश है
जहाँ नहीं कोई विरोध
जन्म लेती नहीं कोई कुंठा
कोई विडम्बना भी नहीं सताती
जहाँ दो न रहने से कोई स्मृति भी नहीं रह जाती
जहाँ खो जाती है अपनी छाया भी
नितांत एकांत ही जिसका होना है
एक ऐसा भी आदेश है
जहाँ मौसम बदलते नहीं पल-पल
जहाँ वसंत पतझड़ के आने की आहट नहीं देता
जहाँ बिन बरसे बादल कभी गुजरा ही नहीं
जहाँ नित एक रस मधुरता छायी है
जिसमें होना विपदा का मानो विदेश है
जहाँ निर्धूम अग्नि जलती है
 ज्योति की अखंड शिला पल-पल पिघलती है
जहाँ कोई मार्ग नजर नहीं आता
पर मंजिल हर कदम पर मिलती है
ऐसा भी एक स्वदेश है
जाना जहाँ संकट के मार्ग से गुजरना है
जहाँ टिकना तलवार की धार पर चलना है
 जो स्वयं को खो कर ही जाना जाता है
एक ऐसा भी महेश है !  


सोमवार, अगस्त 26

काश्मीर की बर्फीली चोटियों पर

काश्मीर की बर्फीली चोटियों पर  

उन्होंने रक्त बहाया
अंतिम बूंद तक
ताकि सलामत रहे देश...
 भटके मीलों पैदल रह भूखे
वज्र बनाया अस्थियों को
भीगे शोलों की वर्षा में
 तपन समोई भीतर अपने
ताकि भारत, भारत रहे...
व्यर्थ न हो यह उनका बलिदान
बर्फीले रस्तों पर घट रहा है जो
सम्भवतः नया वीर जन्मता होगा
 उसी क्षण में ही
जब मरता होगा सैनिक कोई !
सदा सीने पर खायी गोलियाँ
नहीं दिखाई किसी ने पीठ
बढ़ते ही गये एक लक्ष्य लेकर
चढ़ते ही गये न रुके कदम कभी उनके
ताकि मरण सार्थक बने 

रविवार, जनवरी 1

कब होगा जागरण



कब होगा जागरण

बूढी परी ने शाप दिया था उस दिन
सो गया सारा देश
राजभवन के चारों ओर उग आये बड़े बड़े जंगल
थम गया था जीवन
गुम हो गए लोग गहरी नींद में
लेकिन स्वप्न चलते रहे थे भीतर
स्वप्न में वे विचरते थे भीतर
खुले मैदानों में...
खाते-पीते थे... जगने की फ़िक्र ही नहीं की उन्होंने...
स्वप्न में ही जी ली थी पूरी सदी
और फिर... आया था राजकुमार
सोयी राजकुमारी को जगाने
लेकिन गहरी निद्रा का मोह घना था
स्वप्न में ही चल रहा है खेल
और मुस्का रहा है राजकुमार
नींद में ही गढ़ ली है उन्होंने उसकी मूर्ति
और पूजा कर रहे है...
अचरज में पड़ा वह ढूँढने निकल पड़ा है
बूढी परी को...



गुरुवार, जून 23

मेरे सपनों का भारत


मेरे सपनों का भारत

जो देश गुलाम बना था तब
अब जाग गया है, हुंकारे,
कोई लूट नहीं पायेगा
जन-जन देखो यही पुकारे !

जो गुजर गया फिर ना होगा
अब नई इबारत लिखनी है,
इस भारत की तस्वीर नयी
जग के नक्शे में भरनी है !

आदर्शों की ध्वजा, पताका
अब पुनः यहाँ लहराएगी,
सत्य, अहिंसा और प्रेम के
जनता गीत नए गायेगी !

भूखा ना कोई सोयेगा
हो निर्भय नारी निकलेगी,
शोषण, पीड़न अब न होगा
हर बच्ची कलिका सी खिलेगी !

भयमुक्त हो जन विचरेंगे
अपनेपन की प्रबल कामना,
डंडे का कोई काम न होगा
जब फैलेगी सद् भावना !

थाने भी निरापद होंगे
संसद में न धींगामुश्ती,
बाहुबली बस रंगमंच पर
केवल मैदानों में कुश्ती !

वेदों की ऋचाएँ फिर से
अधरों पर शोभित होंगी,
अपनी भाषा, अपनी बोली
जग में गौरवान्वित होगी !

ऐसा होगा देश हमारा
स्वप्न सभी भारतीयों का,
पूर्ण करेंगे मिलजुल कर हम
नव जोश जगा है हम सब का !

अनिता निहालानी
२३ जून २०११