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शनिवार, जुलाई 29

मन का कैनवास

मन का कैनवास 


सिकुड़ जाता है मन का चोला 

तो घुटने लगती हैं श्वासें 

और जन्म होता है हिंसा का 

शायद आत्मरक्षा में 

मन घायल करता है 

पहले स्वयं को 

फिर अपनों को 

यदि शांत न हो पीड़ा तो 

समाज और  

संसार को, 

युद्धों का जन्म ऐसे ही होता है 

सिकुड़ी संकुचित चेतना का परिणाम है क्रोध !

जब फैल जाता है मन का कैनवास 

जिसमें समा जाते हैं धरती और आकाश 

अपने-पराये सब हो अनुकूल 

प्राणी, पशु, पौधे, चट्टान, फूल 

तो प्रेम का जन्म होता है 

प्रेम मुक्त करता है 

सहलाता है 

भर जाता है आनंद से 

सारी कायनात को 

तो किसको चुनेंगे 

संकुचन या विस्तार 

हिंसा या प्यार ! 


मंगलवार, मार्च 4

आना वसंत का

आना वसंत का

जब नहीं रह जाती शेष कोई आशा
 निराशा के भी पंख कट जाते हैं तत्क्ष्ण !
जब नहीं रह जाती ‘मैं’ की धूमिल सी छाया भी
उसकी झलक मिलने लगती है उसी क्षण
निर्भर, निर्मल वितान सा जब फ़ैल जाता है
मन का कैनवास
 प्रेम के रंग बिखेर जाता है कोई अदृश्य हाथ
माँ की तरह साया बन कर चेताती चलती है
छंद मयी हो जाती है कायनात !
छूट जाते हैं जब सारे आधार
तब ही भीतर कोई कली खिलती है
बज उठते हैं मृदंग और साज
जुड़ जाते हैं जाने किससे अंतर के तार !
जब पक जाता है ध्यान का फल भी
झर जाता है जन्मों का पतझड़
और उतर आता है चिर वसंत जीवन में !



बुधवार, अगस्त 22

कवि की आत्मा




कवि की आत्मा

एक कविता हूँ मैं
अपने हाथों से लिखा है
जिसे परमात्मा ने
काव्य धर्म है जिसका.....

या अनंत के कैनवास पर
उसकी कूंची से खिंचा
एक स्ट्रोक
उत्सव कर्म है जिसका....

लहर हूँ एक
महाविस्तीर्ण सागर में
 सृष्टि के
नृत्य ही होना है जिसका....

बुधवार, अगस्त 3

कैनवास मन का


कैनवास मन का

कभी फैलता है तो...
फैलता ही चला जाता है.... मन का आकाश
अनंत को छूता हुआ सा...
अंतरिक्ष की गहराइयों में खोता हुआ सा...
और जब सिकुड़ता है तो एक नोक की तरह
चुभती है उसकी उपस्थिति
ऐसा सिकुड़ता है कि कभी-कभी दम घुटता है
श्वास भी लेनी होती है कठिन
कभी उड़ता है गगन में... मेघ की भांति
या पंछी सा उन्मुक्त...
और कभी सहम कर दुबक जाता है अँधेरे कोने में
मन को देख लिया है
खेलते हुए खेल
 आत्मा के आंगन में
और जान लिया है, वही है वह अनंतता जिसमें
फैलता और सिकुड़ता है मन का कैनवास....
काठ की गुड़िया जैसे एक के भीतर एक बंद है
बड़ी से छोटी होती हुई या छोटी से बड़ी होती हुई
 भीतर छिपा है
सूक्ष्म...से सूक्ष्मतर...सूक्ष्मतम होता
प्रेम का तन्तु
और घेरे है वही
स्थूल... से स्थूलतर... और स्थूलतम... होता
अनंत तक विस्तार है जिसका
वही प्रकाश है प्रकाशक भी
और
प्रकाशित कोई दूसरा है क्या... ?