मन का कैनवास
सिकुड़ जाता है मन का चोला
तो घुटने लगती हैं श्वासें
और जन्म होता है हिंसा का
शायद आत्मरक्षा में
मन घायल करता है
पहले स्वयं को
फिर अपनों को
यदि शांत न हो पीड़ा तो
समाज और
संसार को,
युद्धों का जन्म ऐसे ही होता है
सिकुड़ी संकुचित चेतना का परिणाम है क्रोध !
जब फैल जाता है मन का कैनवास
जिसमें समा जाते हैं धरती और आकाश
अपने-पराये सब हो अनुकूल
प्राणी, पशु, पौधे, चट्टान, फूल
तो प्रेम का जन्म होता है
प्रेम मुक्त करता है
सहलाता है
भर जाता है आनंद से
सारी कायनात को
तो किसको चुनेंगे
संकुचन या विस्तार
हिंसा या प्यार !
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