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सोमवार, दिसंबर 2

मन से अमन तक

मन से अमन तक 



हर श्वास वर्तमान में घटती है 
हर वचन वर्तमान में बोला जाता है 
हर भाव वर्तमान में जगता है 
हर फूल वर्तमान में खिलता है 
हर भूख वर्तमान में लगती है 
हर गलती वर्तमान में ही हो रही होती है 
सब कुछ घटा है और घट रहा है वर्तमान में 
तो मन क्यों नहीं रहता वर्तमान में 
कभी बीते हुए कल को ले आता है 
कभी भविष्य को लेकर डरता है 
यूँही तिल का ताड़ बनाकर 
कल्पनाओं में घरौंदे बनाता-बिगाड़ता है 
मन जिसे कहते हैं 
वह भूत और भावी की परछाई है 
भूत जो कभी वर्तमान था 
भावी जो कभी वर्तमान बनेगा 
मन एक प्रतिबिम्ब है 
छाया मात्र.. 
और उसी से चलता है जीवन 
ऐसा जीवन भी एक भ्रम के अतिरिक्त भला क्या होगा 
मन सदा पुराने को ढोता है 
भविष्य को भी अतीत के चश्मे से देखता है 
वास्तविक जीवन इसी क्षण में है 
जब अस्तित्व मौजूद है पूर्ण रूप से 
जिसे ढाल सकते हैं नए-नए रूपों में 
वर्तमान सदा नया है 
हर पल अछूता, प्रेम पूर्ण  
हर पल असीम और अनंत !

सोमवार, जुलाई 24

कविता हुंकारना चाहती है

कविता हुंकारना चाहती है

छिपी है अंतर के गह्वर में
या उड़ रही है नील अंतरिक्ष की ऊँचाईयों में
घूमती बियाबान मरुथलों में
या डुबकी लगाती है सागर की गहराइयों में
तिरती गंगा की शांत धारा संग
कभी डोलती बन कावेरी की ऊंची तरंग
खोज रही है अपना ठिकाना
झांकती नेत्रों में... नहीं उसके लिए कोई अजाना
 घायल हो सुबकती हिंसक भीड़ देख
पड़ जाती मस्तक पर नहीं मिटने वाली रेख
 पूछती कितने सवाल
क्यों धर्म, जाति और देश की
हदों के नाम पर इतना बवाल
तोड़ कर हर घेरा झाँकना चाहती है
जातीयता की संकीर्ण दीवारों के पार
शांति की मशाल बन जलना चाहती है
बरसना चाहती है शीतल फुहार बनकर
जला दिए जिनके स्कूल
चंद सिरफिरे वहशी दरिंदों ने
उन मासूमों के गाँव पर
उनके जमीरों के भीतर भी ढूँढना चाहती है
इंसानियत की एक खोयी किरण
सोये हुए लोगों को जगाने के लिए
अमन और चैन की हवा बहाने के लिए
आंधी बनकर घुमड़ना चाहती है
गरज-गरज कर
कविता हुंकारना चाहती है !

सोमवार, मार्च 5

अमृत बन कर तू ढलता है



अमृत बन कर तू ढलता है


तुझसे परिचय होना भर है
कदम-कदम पर तू मिलता है,
उर का मंथन कर जो पाले
परम प्रेम से मन खिलता है !

भीतर के उजियाले में ही
सत्य शाश्वत झलक दिखाता,
कण-कण में फिर नजर तू आये
श्वास-श्वास में भीतर आता !

पहले आँसू जग हेतु थे
अब तुझ पर अर्पित होते हैं
अंतर पुष्प अश्रु माल बन  
अंतर के तम को धोते हैं !

पात्र यदि मन बन पाए तो
अमृत बन कर तू ढलता है,
हो अर्पित यदि हृदय पतंगा
ज्योति बन कर तू जलता है !

शुभ संकल्प उठें जब मन में
भीतर इन्द्रधनुष उगते हैं,
सुंदरता भी शरमा जाये
ऐसे सहस्र कमल खिलते हैं !

बुधवार, जून 8

एक और आजादी


एक और आजादी

कौन आजाद हुआ
किसके माथे से गुलामी की स्याही छूटी
दिलों में दर्द है बिगड़ते हालातों का
देश खामोश, माथे पे उदासी है वही
खंजर आजाद हैं सीनों में उतरने के लिये
मौत आजाद है लाशों पे गुजरने के लिए !

मगर हर क़ुरबानी 
करीब ले न जाएगी मंजिल के ?
राह दिखाती है उम्मीद यही लाखों को
छूटेगी जमीं से गुलामी की स्याही
शहादत इक दिन तो रंग लाएगी
फिर से खुशियों का परचम फहरेगा  
सिलसिला जीत का जारी हो जारी रहेगा !

होगा आजाद हर शख्स भुखमरी से तब
मिलेगी शिक्षा खुशहाली नजर आयेगी
बेईमान नहीं होंगे शासक अपने
बजेगी बंसी चैनो-अमन की हर तरफ
दुनिया देखेगी चिड़िया एक सोने की
देश बढ़ेगा ध्वजा सत्य की लहराएगी !


अनिता निहालानी
८ जून  २०११