गुरुवार, फ़रवरी 27

शिवरात्रि के पावन अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें


शम्भो शंकर हे महादेव



शूलपाणि, हे गंगाधर, हे महादेव, औघड़ दाता
हे त्रिपुरारी, शंकर शम्भो, हे जगनायक, जग के त्राता !

हे शिव, भोले, मृत्युंजय हे, तुम नीलकंठ, जटाधारी
हो आशुतोष, अनंत, अनादि, हे अडोल, नागधारी !

 हे अंशुमान, त्रिनेत्रधारी, अभयंकर, हे महाकाल
विश्वेश्वर, हे जगतपिता, हे सुंदर आनन, उच्च भाल !

कैलाशपति, हे गौरीनाथ, हे शक्तिमान, डमरू धारी
हे महारूद्र, काल भैरव, तुम भूतनाथ, गरल धारी ! 

हे शार्दूल, हो तेजपुंज, हे सर्वेश्वर, नन्दीश्वर हे
त्रयम्बक, पशुपतिनाथ, हे आदिदेव हर हर हर हे !

हे विरूपाक्ष, निराकार, हे महेश, चन्द्रशेखर
सदाशिवं, हे चिदानंद, विशम्भर, हे शैलेश्वर !

भस्म विभूषित, करुणाकर, प्रलयंकर, सुंदराक्ष
हे विश्वात्मा, तुम जगतबीज, ताण्डवकर्ता, हे नटराज ! 

महेश्वरा, त्रिभुवन पालक, काशीनाथ हे जगदीश्वर
नमोः नमः हे शम्भुनाथ, नमोः नमः हे सोमेश्वर !

तुम बहाते ज्ञान गंगा, मौनधारी तत्व हो तुम
हे अडोल पर्वत जैसे, कैलाश पति अमृत हो तुम !

विमल तुम्हारा मन अंतर, ज्यों शुभ्र श्वेत धवल हिम
अंतर्ज्योति से हो प्रज्जवलित, आकार है ब्रह्मांड सम !


बुधवार, फ़रवरी 26

मिल गयी चाबी

मिल गयी चाबी


रात अँधेरी और घनेरी, घर का रस्ता भूल गया वह
दूर कहीं से ध्वनि भयानक, भटक रहा भयभीत हुआ वह 

टप टप बूंदें, पवन जोर से, ठंड हड्डियों को थी कंपाती
तभी अचानक बिजली चमकी, घर का द्वार पड़ा दिखाई 

झटपट पहुँचा द्वार खोलने, ताला जिस पर लटक रहा था
सारी जेबें ली टटोल पर, चाबी कहीं गुमा आया था

खड़ा रुआँसा भीगा, भूखा, याद आ रही कोमल शैया
नींद भूख दोनों थीं सताती, लेकिन था मजबूर बड़ा 

आसमान को तक के बोला, मदद तुम्हीं अब कर सकते
तभी हाथ कंधे पर आया, मित्र पूछता, क्या दे सकते?

खुशी और अचरज से बोला, खोलो द्वार, फिर जो मांगो
तुरंत घुमाई उसने चाबी, भीतर आ बोला, अब जागो 

मन ही तो वह भटका राही, द्वार आत्मा पर जो आता  
ज्ञान मित्र रूप में आकर, बस पल में भीतर ले जाता 

मन पाता विश्राम जहाँ पर, घर अपना वह सुंदर कितना
मिल गयी चाबी हुआ तृप्त, ‘हो’ होना चाहे फिर जितना 


शुक्रवार, फ़रवरी 21

आदमी फिर भी भटकता है

आदमी फिर भी भटकता है

राहबर आये हजारों इस जहाँ में
आदमी फिर भी भटकता है !

जरा सी बात पर भौहें चढ़ाता यह
फिर शांति की राह तकता है !

आदतों के जाल में जकड़ा हुआ पर
मुक्तियों के गीत गढ़ता है !

खुद ही गढ़ता बुत उन्हीं ही मांगता
जाने कितने स्वांग भरता है !

इस हिमाकत पर न सदके जाये कौन
शांति के वास्ते युद्ध करता है !

उलटे-सीधे काम भी होते रहेंगे
 रात-दिन जब शंख बजता है !

मंगलवार, फ़रवरी 18

दिल में उसके हम रहते हैं

दिल में उसके हम रहते हैं



वह रहता है अपने दिल में
सुना था जाने कितनी बार,
झाँका जब भी भीतर अपने
पाया केवल यह संसार !

चाह भरी थीं सुख की अनगिन
नाम छोड़ कर जाने की धुन,
खुद के बल पर मिला न जो भी
रब से उसको पाने की धुन !

लेकिन हर ख्वाहिश के पीछे
मांग ख़ुशी की छिपी हुई थी,
कुछ कर के दिखलाने में भी
भीतर एक पुलक जगती थी !

हुई जो पूरी चाह कभी तो
नयी लालसा को जन्मा कर,
एक छलावा, सम्मोहन सा
घिरा रहा अंतर उपवन पर !

तभी किसी ने कहा कान में
शरण में आ जाओ तुम मेरी,
नयन मूंद कर अब जब झाँका
तृप्ति की थी राह सुनहरी !

मन में कौंध गया तब राज
दिल में उसके हम रहते हैं,
जहाँ अभाव कभी न कोई
सुमिरन के दरिया बहते हैं !




रविवार, फ़रवरी 16

इंतजार इक नयनों में पलने देना

इंतजार इक नयनों में पलने देना


कुछ करना कुछ ना करने की जिद करना
अच्छा है खुद से सब कुछ होने देना

करने में सीमा होगी श्रम भी होगा
अच्छा है बस उसको ही करने देना

जैसे कलियाँ फूल बनी इतराती हैं
किस्मत वाले बन सब कुछ घटने देना

क्या करना जब खबर नहीं कोई इसकी
इक मुस्कान न अधरों से हटने देना

खाली होकर कभी-कभी तो बैठ रहो
मिलजुल रहना रार नहीं तनने देना

हर दिन कुदरत एक चुनौती लाएगी  
दोनों बाहें फैला कर स्वागत करना

कितनी देर लगेगी उससे मिलने में
हौले से बस पलकों को खुलने देना

शुभ करने का दिल चाहे कर ही लेना
पछतावे से दिल का न आँगन भरना

खुला रहे हर पल ही दरवाजा मन का
भेद छिपा कर नहीं कभी उससे रखना

जीवन भर भी मिलने में है लग सकता
एक प्रतीक्षा अंतर में झरने देना






मंगलवार, फ़रवरी 11

कुछ बातें दिल से

कुछ बातें दिल से


शिकायतें कर लीं बहुत जमाने से
सिर कहीं अब तो झुकाया जाये

बोझ ढोयें अच्छाइयों का कब तक
चलो औरों को बेहतर बताया जाये

नेकियाँ कर के भी रोये बुराई कर के भी
आखिर इन्सान को किस तरह हंसाया जाये

उमगती ख्वाहिशें सताती दिलोजान को
  किसी के दर पे उनको चढ़ाया जाये

नेमतें सौंप दे तो बढ़ती ही जाएँगी
कर के अर्पण दुःख को भी घटाया जाये

मुगालता हो गया हासिल कुछ करने का
वरना क्या है जो रब को दिखाया जाये

न कुछ अपना न कुछ हस्ती है हमारी
जान इस सच को जरा मुस्कुराया जाये



शनिवार, फ़रवरी 8

बहने दो

बहने दो


बहने दो पावन रसधार, मत रोको !
झरने दो नयनों से अश्रुधार, मत टोको

माना मन का परिचय है बंधन से
डरता है अनहद की गुंजन से

खिलने दो अन्तस् की डार, मत रोको !
भरने दो भीतर फागुनी बयार, मत टोको !

माना मन स्वप्नों में खोया है
अनजाने रस्तों पर रोया है

छाने दो प्रियतम का प्यार, मत रोको !
खुलने दो अंतर का द्वार, मत टोको !

सुनने दो कानों को कुदरत की भाषा
गिर जाये जन्मों से बाँध रही आशा

कुछ भी न रहने दो, मत रोको !
जीवन को कहने दो, मत टोको !




बुधवार, फ़रवरी 5

लो आ गया वसंत

लो आ गया वसंत


धूप रानी हो गयी
रुत सुहानी हो गयी
बाग में कलियाँ खिलाता
छा गया वसंत
लो आ गया वसंत !

खुशबुएँ तन पर लपेटे
रंग अनगिन भी समेटे
भू सजाता मुस्कुराता
भा गया वसंत
लो आ गया वसंत !

भ्रमर गूँजते विकल
तितलियों के उड़ें दल
कुम्हलाया मुरझाया मन
खा गया वसंत
लो आ गया वसंत !

मंजरी मदहोश हुई
मस्तियों की कोष हुई
आम्र वन में खिलखिलाता
सा गया वसंत
लो आ गया वसंत !
  


सोमवार, फ़रवरी 3

झर जाये हर चाह तो

झर जाये हर चाह तो


थम कर ठिठक जाता है
खाली हुआ मन !
रीझ-रीझ जाता है खुद पर ही
तकने लगता है निर्निमेष अंतहीन
निज साम्राज्य को....
मौन एक पसरा है
राग बज रहा हो फिर भी कोई जैसे
सन्नाटा गहन चहूँ ओर
धुन गूंज रही हो कोई जैसे
नजर न आता दूर तक
पर साथ चल रहा हो कोई
पर होता है हर कदम अहसास
दृष्टि हटते ही बाहर से
भीतर अनंत नजर आता है
नहीं दीवारें न कोई रास्ता
अंतहीन एक अस्तित्त्व
ढक लेता है रग-रग को
भर देता है तृप्ति भीतर
झरना ऐसा झरता है
हर लेता जो तृषा जन्मों की
जहाँ किया नहीं जाता कुछ भी
सब कुछ अपने आप घटता है
गूंजता है मानो कोई दिव्य आलाप
झर जाती है हर चाह
मन से जिस क्षण..