शनिवार, अक्तूबर 30

हरसिंगार के फूल झरे

हरसिंगार के फूल झरे

हौले से उतरे शाखों से
बिछे धरा पर श्वेत केसरी
हरसिंगार के फूल अनूठे !

रूप-रंग, गंध की निधियां
लुटा रहे, मस्त, वैरागी
शेफाली के पुष्प नशीले !

प्रथम किरण ने छुआ भर था
शरमा गए, झर झर बरसे
सिउली के ये कुसुम निराले !

कोमल पुष्प बड़े शर्मीले
नयन खोलते अंधकार में
उगा रवि घर छोड़ चले !

नन्हीं सी केसरिया डंडी
पांच पंखुरी श्वेत वर्णीय
खिल तारों सँग होड़ करें !  

मदमाती खुशबू के तोहफे
बाँट रहे हैं मुक्त हृदय से
 मीलों तक फिजां महकाते !

अनिता निहालानी
३० अक्टूबर २०१०

शुक्रवार, अक्तूबर 29

कौन है वह

कौन है वह


वह है एल्केमिस्ट अनोखा !

अहंकार लोहे सा भारी
गला के उसको कुंदन करता
ओंकार सोने से दिल का
कोना कोना गुंजित करता I

एक निराला केटेलिस्ट भी !

होने से जिसके सब होता
कुछ करता ना सप्रयास वह
अनायास ही कृपा बरसती
मन स्वयं ही परिवर्तित होता I

सबसे बड़ा पारखी भी वह !

आरपार सब दिल का परखे
झूठी आशा नहीं दिलाता
कितना पानी चढ़ा है दिल पे
सच्चे मोती सा चमकाता I

गोता खोरी सीखें उससे !

मन सागर में उतर के गहरे
मणियों, रतनों को फिर पाएँ
भीतर के प्रांगण को झिलमिल
ज्योति बिन्दुओं से दमकाएं I

एक यात्री दूर देश का !

बिन वाहन सृष्टि में घूमे
अम्बर में डेरा है उसका
सूर्य चन्द्र सजा थाल में
प्रभु वन्दन होता है जिसका I

वह है माली बहुत सुजान !

परमात्मा का बीज गिराता
कृपा वारि से उसे सींचता
खाद ज्ञान की प्रेम ऊष्मा
देकर पौधा खूब बढ़ाता I

वीणा वादक दिल वाद्य का !

अंतर्मन को झंकृत करता
देह को चिन्मय और उर्जित
भाव पुष्प सम सुरभित होते
बुद्धि जिसको देख चमत्कृत I

अनिता निहालानी
२९ अक्तूबर २०१०    
   



बुधवार, अक्तूबर 27

कहाँ खो गयी

कहाँ खो गयी

कहाँ खो गयी
लुप्त हो गयी
प्रेम की वंशी की धुन प्यारी I

चैन ले गया
वैन दे गया
गोकुल का छलिया गिरधारी I

देने में सुख
लेना ही दुःख
सीख दे रही हर फुलवारीI

मौन हुआ मन
है स्थिर तन
बरसी भीतर रस पिचकारीI

अगन विरह की
तपन हृदय की
जल जाये हर चाह हमारी I

अनिता निहालानी
२७ अक्तूबर २०१०  

सोमवार, अक्तूबर 25

अनहद नाद

अनहद नाद

ढोल बजें कभी गरजें मेघ
मधुर कृष्ण बांसुरी की धुन
चहकें पंछी कभी हजारों
मदिर घुंघरूओं की रुनझुन !

कभी बजें इकतारे के सुर
वीणा पर कभी गूंजें राग
अद्भुत ध्वनियाँ कौन सुनाये
कौन सुनाये फाग, विहाग ?

सुनते सुनते मन खो जाये
गहन मौन भीतर छा जाये
मौन से उपजे है संगीत
सन्नाटा भी गीत सुनाये !

दस्तक देता वह अव्यक्त
मिलने के उसके यही ढंग
झलक दिखाता छुप जाता फिर
अदृश्य के अनगिन हैं रंग I

अनहद नाद गूंजता भीतर
उसके ही संदेशे लाता
शांति, प्रेम के पुष्प खिलाकर
सुरभि अनोखी से भर जाता I

है ज्योतियों की ज्योति वह
एक सुनहला ज्ञान प्रकाश
स्वयं ही स्वयं पर रीझे मुग्ध
स्वयं को दे अनंत आकाश !

अनिता निहालानी
२५ अक्टूबर २०१०    


शुक्रवार, अक्तूबर 22

मन छोटा सा

मन छोटा सा

चाह मान की जिसे जिलाए
वह है अपना छोटा सा तन
कुछ पाने की आस लगाये
वह है अपना छोटा सा मन !

अमन हुआ जब मुक्त हो गया
त्यागी तृष्णा रिक्त हो गया
लाखों हैं बुद्धि में बढ़ कर
जाना जब तब सिक्त हो गया !

मान की आशा ले डूबती
गर्व की नैया सदा टूटती
स्वयं से ही आगे जाना है
दुइ की गागर सदा फूटती !

सहज रहें जैसे हैं बादल
पंछी, पुष्प, चाँद और तारे
भीतर जाकर उसको देखें
जिससे निकले हैं स्वर सारे !

अनिता निहालानी
२२ अक्तूबर २०१०

 

गुरुवार, अक्तूबर 21

जितना दौड़ो कम पड़ता है

यह कविता मेरी छोटी बहन के लिये है और यह उन सब कामकाजी महिलाओं के लिये भी है जो वर्षों से अपने प्रोफेशन के साथ साथ घर की जिम्मेदारी बिना शिकायत के निभाती आ रही हैं, किन्तु अब उम्र के उस पडाव पर आ पहुंची हैं, जहाँ खुद से खुद की मुलाकात होती है, प्रौढावस्था तक आते आते तन व मन तनाव से ग्रस्त हो चुके होते हैं जीवन में सभी उपलब्धियां हासिल कर चुकने के बाद भी एक खालीपन सा लगता है... एक नयी तलाश शुरू होती है खुद की तलाश....  
जितना दौड़ो कम पड़ता है
सुंदर मुखड़ा, गोरी रंगत
नन्हीं-मुन्नी एक परी थी,
घुंघराले थे काले कुंतल
घर भर में सबसे छोटी थी I

पढ़ने में भी थी होशियार
नृत्य कला सौंदर्य विचार,
हँसती तो गालों में गढ्ढे
आँखों में थे स्वप्न हजार !

कब वह इतनी बड़ी हो गयी
निज पैरों पर खड़ी हो गयी,   
मेहनत कर वह बनी डॉक्टर
ड्यूटी की संभाला भी घर I

जो चाहा पाया जीवन में
बच्चों को संस्कार दिया,
सँग मरीजों के अपनों सा
सदा प्रेम व्यवहार किया I

आज उम्र के दोराहे पर
जग में कुछ कर के दिखलाए
 थक कर बैठी रही सोचती
या फिर मानव धर्म निभाए ?

मानव होने का अर्थ क्या
निज के भीतर खुद को पाना,
तोड़ के मन, बुद्धि के घेरे
आत्म शक्ति से प्रीत लगाना I

जितना दौड़ो कम पड़ता है
यह जग अंधा एक कुआँ है,
कभी तृप्त ना हो सकता यह
सदैव अधूरा ही हुआ है I

युगों युगों से यही कहानी
दोहराती स्वयं को आयी है,
जग यह माया जाल घना है
भीतर ही खुशियाँ पायीं हैं I

दो पल थम कर खुद सँग हो ले
जिसने पाया, भीतर पाया,
नहीं छोड़ना कुछ भी बाहर
जिसको तृष्णा तजना आया I

कर कर के भी जो न मिलता
शांत हुए से सहज मिलेगा,
कुछ भी नहीं शांति के आगे
भाव सधे तो प्रेम खिलेगा I

जीवन का है यही रहस्य
जिसने छोड़ा उसने पाया,
सहज रहा जो जैसा भी है
उसने साथ स्वयं का पाया I

अनिता निहालानी
२१ अक्तूबर २०१०   












मंगलवार, अक्तूबर 19

मुक्ति का छंद

मुक्ति का छंद

रोकें नहीं ऊर्जा भीतर
पल पल बहती रहे जगत में
त्वरा झलकती हो कृत्यों से
पांव रुकें ना थक कर मग में I

हरसिंगार से नित रिक्त हों
पुनः पुनः मंगल ज्योति झरे
जमी हुई ऊर्जा पाहन सी  
सृजन नहीं, तो विनाश करे  I

नदी रुकी जो नष्ट हो गयी
बहती सदा स्रोत से पाए
जीवन जो नित बढ़ना जाने
मंजिल वह इक दिन पा जाये I

पुण्यों की ऊर्जा बहायें
भीतर ना कुछ लोभ रहे
भरता ही जाता है आंचल
जब जब मुक्ति का छंद बहे !

लुटा रही है सारी सृष्टि
हम भी दोनों हाथ उलीचें
क्षण क्षण जियें तो स्वर्ग है
बंधी हुई मुठ्ठी ना भींचें !

अनिता निहालानी
१९ अक्टूबर २०१०  

शनिवार, अक्तूबर 16

विजयादशमी

विजयादशमी
आज विजयादशमी है !
आज, एक विशेष दिन है
आज भी तो रावण के पुतले जलेंगे,
हर वर्ष की तरह
और, अगले वर्ष कई और खड़े हो जायेंगे !
....क्या वर्ष भर.... हम रावण से मुक्त रहेंगे ?
नहीं,...तब तक नहीं
जब तक, दस इन्द्रियों वाले दशरथ का
विवेक रूपी पुत्र राम
निर्वासित किया जाता रहेगा,
और रावण रूपी अहंकार
बुद्धि रूपिणी पुत्रवधू सीता को
हर कर ले जाता रहेगा,
अब सीता राम का मिलन होता ही नहीं
यदि होता तो राष्ट्र आतंक के साये में न जीते
हम दूध के नाम पर रसायन
और दवा के नाम पर जहर न पीते
न होती विषमताएं समाज में
न होता रावण राज !

आखिर कब घटेगा दशहरा हमारे भीतर?
कब ?
तभी न, जब
विवेक राम का साथ देगा
वैराग्य लक्ष्मण
दोनों प्राण रूपी पवन पुत्र के जरिये
बुद्धि सीता को मुक्त करेंगे
तब होगा रामराज्य
जर्जर हो यह तन, बुझ जाये मन
उसके पहले
जला डालें अपने हाथों

अहंकार रावण, मोह रूपी कुम्भकर्ण
लोभ रूपी मेघनाथ भी
उसी दिन होगी सच्ची विजयादशमी !

अनिता निहालानी
१६ अक्तूबर २०१०

गुरुवार, अक्तूबर 14

शरद की एक संध्या

शरद की एक साँझ

भीगी-भीगी दूब ओस से
हरीतिमा जिसकी लुभाती
शेफाली की मोहक सुरभि
झींगुर गान सँग तिर आती I

शरद काल का नीरव नभ है
रिक्त मेघ से, दर्पण जैसा
दमक रहा साँझ का तारा
चन्द्र बना सौंदर्य गगन का I

हल्की हल्की ठंडक प्यारी
सन्नाटे को सघन बनाती
पेड़ों, पौधों की छायाएं
उपवन रहस्यमयी बनातीं I

नन्हें नन्हें कीट दूब में
श्वेत पतंगे ज्योति खोजते
नवरात्रि पूजा मंगल स्वर
छन के आते मंदिर पट से I

एक और आवाज गूंजती
नीरवता को भंग कर रही
बिजली गुम हो गयी लगती है
जेनरेटर की धुन बज रही !

अनिता निहालानी
१३ अक्तूबर २०१०

बुधवार, अक्तूबर 13

प्रेम पंख देता है मन को

प्रेम पंख देता है मन को

प्रीत की मस्ती में डोले मन
क्या डोलेगी यह पुरवैया,
प्रेम पुलक बन लहराए तन
शरमाए सागर में नैया !

प्रेम पंख देता है मन को
उड़ने का सम्बल भर देता,
पल में पथ के कंट जाल हर
फूलों कलियों से भर देता !

हृदय गुफा का द्वार खोलता
अमृत घट बन मधु बरसाए,
सहज जगाता दिव्य चेतना
‘कोई है’ जो नजर न आये !

प्रेम से ही सृष्टि का वर्तन
इससे पूरित जग का हर कण,
प्रेम ऊर्जा व्याप रही है
यही संवारे प्रतिपल जीवन !

एक प्रेम की ही सत्ता थी
जब न था कुछ भी सृष्टि में,
एक हुआ अनेक प्रेम वश
ज्यों बदली बदले बूंदों में !

जैसे माँ निज अंग से रचती
शिशु को प्रेम सुधा पिलाती,
प्रेम की धारा बहती अविरल
जग के कण-कण को नहलाती !

वही कृष्ण राधा बन डोले
प्रेम रसिक बन अंतर खोले
मीरा की वीणा का सुर वह
बिना मोल के कान्हा तोले !

बाल, किशोर, युवा वृद्ध हो
प्रेम से ही पोषण पाते सब
हर आत्मा की ललक प्रेम है
खिले तभी प्रेम मिले जब !

अनिता निहालानी
१३ अक्तूबर २०१०

सारे जग को मीत बना लें

सारे जग को मीत बना लें

सीखें जगना और जगाना
स्वयं को पाकर उसको पाना
उसके बिना है सूना जीवन
गीतों में संदेश सुनाना I

जग के आकर्षण में फँसकर
भूल गए हम अपना ही घर
जहाँ एक दिन सबको जाना
जहाँ गूंजते मुक्ति के स्वर I

अभी कहाँ जग पाकर पाया
केवल भ्रम को गले लगाया
जग यह, तब ही, अपना होगा
जग कर जब जगदीश को ध्याया I

छल का ही व्यापार यहाँ है
जीवन का आधार कहाँ है ?
जिन बातों पर मरते मिटते
उनमें कोई सार कहाँ है ?

झूठ-मूठ ही खेला करते
अपनेपन का दम हम भरते
निज से ही जो प्रेम किया न
प्रेम कहाँ दूजों से करते I

एक बार बस मूल को पालें
फिर चाहे छलांग लगा लें
स्रोत ऊर्जा का भीतर पा
सारे जग को मीत बना लें !
अनिता निहालानी
१३ अक्तूबर २०१०

सोमवार, अक्तूबर 11

कहानी एक दिन की

कहानी एक दिन की

दिनकर का हाथ बढ़ा
उजियारा दिवस चढ़ा
अंतर में हुलस उठी
दिल पर ज्यों फूल कढ़ा !

अपराह्न की बेला
किरणों का शुभ मेला
पढ़कर घर लौट रहे
बच्चों का है रेला !

सुरमई यह शाम है
तुम्हरे ही नाम है
अधरों पर गीत सजा
दूजा क्या काम है !

बिखरी है चाँदनी
गूंजे है रागिनी
पलकों में बीत रही
अद्भुत यह यामिनी !


अनिता निहालानी
११ अक्तूबर २०१०

हम डाकिये

हम डाकिये

जो भी जिसने जग में पाया
एक उसी स्रोत से आया
सदा मुक्त हो उसे लुटायें
क्यों न हम डाकिये बन जाएँ ?

झोली कभी न होगी खाली
छिपा वहाँ है अनंत खजाना
छोड़ कृपणता हों उदार तो
जानें, देना ही है पाना I

देने में ही राज छिपा है
लुटा रहा वह युगों युगों से
कुदरत में अनमोल रत्न हैं
देना चाहे हमें कभी से I

थोड़ा सा पाकर हम हर्षित
छुपा-छुपा कर सबसे रखते
प्रेम भाव भी मुस्कान भी
जाने क्यों देने से डरते I

क्या कुछ हमसे खो जायेगा
क्या अपना है पास हमारे
जो तुच्छ है वही कमाया
श्रेष्ठ सभी गुण उसके सारे I

उसका ही उसको लौटाएं
व्यर्थ भार क्यों ढोयें जग में
खाली हों बांसुरी जैसे
सुर उसके गूंजेगें हम में I

अनिता निहालानी
११ अक्तूबर २०१०

शुक्रवार, अक्तूबर 8

हे माँ तुझे प्रणाम!

हे माँ तुझे प्रणाम !

आश्विन शुक्ला नवरात्रि का
उत्सव अद्भुत कालरात्रि का
देवी दुर्गा महामाया का
राज राजेश्वरी, जगदम्बा का I

कल्याणी, निर्गुणा, भवानी
अखिल विश्व आश्रयीदात्री
वसुंधरा, भूदेवी, जननी
धी, श्री, काँति, क्षमा, स्मृति I

श्रद्धा, मेधा, धृति तुम्हीं हो
माता गौरी, दुःख निवारिणी
जया, विजया, धात्री, लज्जा
कीर्ति, स्पृहा, दया कारिणी I

चिन्मयी देवी पराम्बा तुम
उमा, पार्वती, सती, भवानी
ब्रह्मचारिणी, ब्रह्मस्वरूपिणी
सावित्री, शाकम्बरी देवी I

काली माँ, कपालिने अम्बा
स्वाहा तुम स्वधा कहलाती
विश्वेश्वरी, आनन्ददायिनी
शांतिस्वरूपा, आद्याशक्ति I

त्रिगुणमयी, करुणामयी, कमला
चण्डिका, शाम्भवी, सुभद्रा
हे भुवनेश्वरी, माता गिरिजा
मंगल दात्री, हे जगदम्बा!

सिंह वाहिनी, माँ कात्यायनी
चंद्रघंटा, कुष्मांडा देवी
अष्टभुजा, स्वर्णमयी माँ
त्रिनेत्री तुम सिद्धि दात्री I

इच्छा, कर्म, ज्ञान की शक्ति
अन्नपूर्णा, इड़ा, विशालाक्षी
कोटिसूर्य सम काँति धारिणी
क्षेमंकरी, माँ शैलवासिनी I

गूंजे घंटनाद व निनाद
नाश किये मुंड और चंड
कुंडलिनी स्वरूपा माता
महिषासुरमर्दिनी प्रचंड I

शक्ति बिना हैं शिव अधूरे
सृष्टि के कार्य नहीं पूरे
ज्योतिर्मयी, जगतव्यापिनी
सजे मार्ग, मंदिर कंगूरे I

देवी का आगमन सुंदर
उतना ही भव्य प्रतिगमन
जगह जगह पंडाल सजे हैं
करते बाल, युवा सब नर्तन I

अनिता निहालानी
८ अक्तूबर २०१०

गुरुवार, अक्तूबर 7

खुलवाओ जो बंद द्वार है

खुलवाएं जो बंद द्वार है

भीतर भरा भंडार अनोखा
बाहर का सब फीका फीका
भीतर बहते अमृत सरवर
बाहर का जल फीका फीका

माना की यह जग सुंदर है
माया ही माया है सारी
पल भर का ही खेल जगत का
डूबी जिसमें बुद्धि हमारी

झूठे सिक्के हैं ये जग के
ज्यादा दिन न चल पायेगें
राज खुलेगा जब इस जग का
जाने के दिन आ जायेगें

वक्त रहे अमृत को पालें
त्याग तमस उजास उगा लें
मृत्यू ग्रसने आये पहले
खुद ही उससे हाथ मिला लें

जीवन छुपा ढूढें उस पार
खुलवाएं जो बंद है द्वार
हममें भी कुछ श्रेष्ट छिपा है
खुद से रखा नहीं सरोकार

अनिता निहालानी
७ अक्तूबर २०१०

बुधवार, अक्तूबर 6

दर्द की दास्तां

दर्द की दास्तां

जो दर्द छुपा भीतर
खुद तुमने गढ़ा उसको
नाजों से पाला है
खुद बड़ा किया उसको I

तुमने उसे माँगा है
ऊर्जा पुकारी है
यदि मुक्त हुआ चाहो
मर्जी यह तुम्हारी है I

हम ही कर्ता धर्ता
हमने ही भाग्य रचा
अनजाने में ही सही
दुःख वाली लिखी ऋचा I

अब हम पर है निर्भर
यह दांव कहाँ खेलें
जीवन शतरंज बिछा
कैसे यह चाल चलें I

सुख की यदि चाह तुम्हें
बोली तो लगाओ अब
क्या कीमत दे सकते
यह सर तो गवाओं अब I

अनिता निहालानी
६ अक्तूबर २०१०

सदगुरु

सदगुरु

सदगुरु का गुरुत्व अनोखा
ईश्वरीय ज्योति सरीखा,
जो अनंत प्रेम बरसाए
उत्सव जीवन में ले आये !

जग का मार्ग बड़ा कंटीला
सदगुरु का पथ रंगीला,
श्रद्धा, शील, प्रज्ञा का दाता
सहज समाधि का प्रदाता I

कुछ पालूं, कुछ तो बन जाऊं
इस चक्र से बाहर निकाले
बिना किये ही जो मिलते हैं
दे प्रसाद में सुख निराले I

कोहिनूर सा जगमग चमके
सदगुरु है जीवन की ज्योति
बरसाएँ प्रमुदित मन सारे
आनंद अश्रुओं के मोती !

दूर रहे न निकट ही रहता
जहाँ भी हो सुरभि फैलाये
श्रद्धा के सेतु पर दिल के
संदेशे आयें और जाएँ I

अनिता निहालानी
६ अक्तूबर २०१०

मंगलवार, अक्तूबर 5

सहज प्रेम

सहज प्रेम

सहज प्रेम जीवन में आये, कैसी उलटफेर कर जाये

जो भी सच लगता था पहले
स्वप्न सरीखा उसे बनाता
छुपा हुआ भीतर जो सुख है
खोल आवरण बाहर लाता

जैसे कोई दुल्हन घूंघट, आहिस्ता से रही उठाये

कुछ होने का जो भ्रम पाला
शून्य बनाकर उसे मिटाता
पत्थर सम जो अंतर्मन था
बना मोम उसको पिघलाता

कैसे अद्भुत खेल रचाए, उथलपुथल जीवन में आये

हर पल नया नया सा दर्शन
अद्भुत है उस रब का वर्तन
हरि अनंत हरि कथा अनन्ता
यूँ ही संत नहीं किये समर्पण

नित नूतन वह परम प्रेम है, पल पल नया-नया सच लाए

ऊपर से दिखता है जो भी
भीतर कितने भेद समोए
जैसे कोई कुशल चितेरा
छुपा हुआ नव रंग भिगोये

या फिर नर्तक एक अनूठा, हर क्षण नयी मुद्रा दिखलाये

भीतर कोई है, मार्ग दो
बाहर आने को अकुलाता
फूट रहा जो रक्त गुलाल
उत्सुक तुम्हें लगाना चाहता

अहो ! सुनो यह स्वर सृष्टि के, नव गीत नव छंद सुनाये

अनिता निहालानी
५ अक्टूबर २०१०