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सोमवार, मई 23

तू आनंद प्रेम का सागर



तू आनंद प्रेम का सागर

तू ही मार्ग, मुसाफिर भी तू
तू ही पथ के कंटक बनता,
तू ही लक्ष्य यात्रा का है
फिर क्यों खुद का रोके रस्ता !

मस्ती की नदिया बन जा मिल
तू आनंद प्रेम का सागर,
कौन से सुख की आस लगाये
तकता दिल की खाली गागर !

सूर्य उगा है नीले नभ में
खिडकी खोल उजाला भर ले,
दीप जल रहा तेरे भीतर
मन को जरा पतंगा कर ले !

मन की धारा सूख गयी है
कितने मरुथल, बीहड़ वन भी,
राधा बन के उसे मोड़ ले
खिल-खिल जायेंगे उपवन भी !

एक पुकार मिलन की जागे
खुद से मिलकर जग को पाले,
सहज गूंजता कण कण में जो
उस पावन अंतरे को गाले !

अनिता निहालानी
२३ मई २०११     

बुधवार, दिसंबर 15

नव गीत जब रचने को है

नव गीत जब रचने को है

कैद पाखी क्यों रहे जब आसमां उड़ने को है,
सर्द आहें क्यों भरे नव गीत जब रचने को है !

सामने बहती नदी ताल बन कर क्यों पलें,
छांव शीतल जब मिली धूप बन कर क्यों जलें !

क्षुद्र की क्यों मांग जब उच्च सम्मुख हो खड़ा,
क्यों न बन दरिया बहे जब प्रेम भीतर है बड़ा !

तौलने को पर मिले भार दिल में क्यों भरें,
आस्था की डोर थामे मंजिलें नई तय करें !

गान उसके गूंजते हैं शोर से क्यों जग भरें,
छू रहा हर पल हमें पीड़ा विरह की क्यों सहें !

जाग कर देखें जरा हर ओर उसकी ही छटा,
प्राण बन कर साथ जो छा गया बन कर घटा !

हर रूप के पीछे छिपा जो प्राप्य अपना हो वही,
हर नाम में बसता है वह नाम जिसका है नहीं !

अनिता निहालानी
१५ दिसम्बर २०१०