प्रिय पुत्र के जन्मदिवस पर
तुम आये जीवन में जिस पल
जगमग मन में हुआ उजाला,
अपने ही तन की माटी से
गढ़ डाला जब रूप निराला !
उस नन्हें तन के भीतर से
तुम झांक रहे जैसे गोपाला,
सुंदर मुखड़े से नित अपने
सबको मोहित कर डाला !
बालक हुए किशोर बने तुम
बड़े प्रेम से हमने पाला,
युवा हुए हो, दूर गए अब
घर को सूना कर डाला !
है जोश और धैर्य अनोखा
और भ्रमण का शौक बड़ा,
हो एकांत प्रिय, तुम मौनी
अंतर है मजबूत गढ़ा !
जीवन में कुछ पाना तुमको
तुच्छ नहीं वह श्रेष्ठ धर्म हो,
सुख आनंद से खिले रहो तुम
सदा सुघड़ तुमसे हर कर्म हो !