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रविवार, मई 22

हर पल फूलों सा खिल महके

 हर पल फूलों सा खिल महके

धूप खिली है उपवन-उपवन

पल में  जग सुंदर कर जाये, 

जैसे हवा बँट रही कण-कण 

क्या करने से हम बँट जाएँ !


हँसी बिखेरें, प्रेम लुटा दें 

मुस्कानों की लहर उठा दें, 

हर पल फूलों सा खिल महके 

जीवन को इक खेल बना दें !


उलझ न जाएँ किसी कशिश में 

नयी ऊर्जा खोजें भीतर,

बहती रहे हृदय की धारा 

अंतर में ही बसा समुन्दर !


कुछ भी छुपा नहीं उस रब से 

यह पल भी उपहार बना लें, 

ईश्वर अंश जीव अविनाशी 

इसी सूत्र को सत्य बना लें !


मंगलवार, अप्रैल 20

मत लगाना दिल यहां पर

मत लगाना दिल यहां पर 


ख्वाब है यह जिंदगी इक 

यह सुना है,

मत लगाना दिल यहां पर 

यह गुना है !


आएगी इक बाढ़ जैसी 

महामारी, 

था अंदेशा कुछ दिलों को 

त्रास भारी !


डोलती है मौत या फिर  

भ्रम हुआ है, 

व्यर्थ ही तो ज्यों सभी का 

श्रम हुआ है !


क्या करेंगे कल यहां 

सूझे नहीं, 

कब थमेगी आग यह 

बूझे नहीं !


जो हो रहा वह मान लें 

हों कैद सब, 

जो पल मिले जी लें उन्हें 

दे चैन रब !


 

शुक्रवार, नवंबर 29

निशदिन बँटता जाता है वह



निशदिन बँटता जाता है वह



चाँद, सितारे, सूरज मांगे
वही बने हकदार ज्योति के,
काली रातें आँसू चाहे
कैसे  बिछें उजाले पथ में !

निशदिन बँटता जाता है वह
खुद ही तो जड़-चेतन होकर,
अनगिन बार मिला है सब कुछ
फिर-फिर द्वार खड़े सब खोकर !

कितनी बार ख़ुशी छलकी थी
अंतर प्रेम जगाया  सुंदर,
कितने मीत बनाए जग में
कितने गीत रचे थे मनहर !

जितना पाया वह क्या कम था
तुष्टि पुष्प खिला नहीं अब तक,
हो कृतज्ञ कहाँ छलके अश्रु
फिर भी देते जाता है रब !

जो भी जिसने माँगा जग में
अकसर वही वही पाया है,
जितना बड़ा किसीका दामन
उतना उसी में समाया है !


बुधवार, अक्टूबर 19

जिंदगी का गीत यूँ ही

जिंदगी का गीत यूँ ही

सोचते ही आज बीता
कल कभी आता कहाँ,
जिंदगी का गीत यूँ ही
छिटक ही जाता रहा !

डर छुपाये जी रहा जग
धुधं, कोहरा या धुआं सा,
मांगता रब से दुआएं
कंप रहा मन पात सा !

नींद में जो स्वप्न देखे
जागते ही खो गये वे,
जग उठे भीतर उजाला
स्वप्नवत होगा जगत ये !

मुस्कुराती जिन्दगी तब 
बाँह फैलाये मिलेगी,
हर कदम पर खिलखिलाती 
गंग धारा सी बहेगी !

गुरुवार, जुलाई 28

नाम प्रेम का लेकर

नाम प्रेम का लेकर


उससे मिलकर जाना हमने
प्यार किसे कहते हैं,
नाम प्रेम का लेकर कितने,
 खेल चला करते हैं !

चले हुकूमत निशदिन उस पर,
 जिसको अपना माना,
मैं ही उसका रब हो जाऊं
और न कोई ठिकाना !

नहीं प्रेम में कोई बंधन
मुक्त गगन के जैसा,
सब पर सहज मेह सा बरसे
मुक्त पवन के जैसा !  

सोमवार, जुलाई 22

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आप सभी को शुभकामनायें

गुरु पूर्णिमा 

सदगुरु दूत खुदा का न्यारा
उसकी ओर ही करे इशारा I

जग को रब की खबर सुनाये
उस जैसा ही नेह लुटाए I

एक यही लाया पैगाम
कण-कण में व्यापा है राम I

साक्षी है वह परम ब्रह्म का
राज खोलता सृष्टि भ्रम का I

सदगुरु जीवन का संगीत
पोर-पोर से गाये गीत I

सबका पल पल रखता ध्यान
सदा सभी को अपना मान I

सदगुरु दूर करे अज्ञान
प्रेम भरे मिटा अभिमान I

सदगुरु शिखरों पर ले जाये
मन को सुंदर पंख लगाये I

जैसे एक अलौकिक घटना
सदगुरु सुंदर सच्चा सपना I

दूर करे हर चिंता मन की

पकड़ा दे मस्ती जीवन की I

सोमवार, अगस्त 20

ईद मुबारक



ईद मुबारक 

एक ही अल्लाह
एक ही रब है,
एक खुदा है
एक में सब है !

अंत नहीं उसकी रहमत का
करें शुक्रिया हर बरकत का,
उसकी बन्दगी जो भी करता  
क्या कहना उसकी किस्मत का !

जग का रोग लगा बंदे को
नाम दवा कुछ और नहीं है,
वही है मंजिल वही है रस्ता
तेरे सिवा कोई ठौर नहीं है !

सारे जहां का जो है मालिक
छोटे से दिल में आ रहता,
एक राज है यही अनोखा
जाने जो वह सुख से सोता !

तू ही अव्वल तू ही आखिर
तू अजीम है तू ही वाहिद,
दे सबूर तू नूर जहां का
तू ही वाली इस दुनिया का !

अल कादिर तू है कबीर भी
तू हमीद और तू मजीद भी,
दाता है, तू रहीम, रहमान
अल खालिक तू मेहरबान !

तेरे कदमों में दम निकले
दिल में एक यही ख्वाहिश है,
तेरा नाम सदा दिल में हो
ईद पे तुझसे फरमाइश है !





 

बुधवार, दिसंबर 22

इक दिन रब बंदे से बोला

इक दिन रब बंदे से बोला

क्यों शंकित है ? क्यों पीड़ित है
हृदय तुम्हारा क्यों कम्पित है ?

साथी हैं हम जनम जनम के
सुख के, दुःख के, हर एक पल के !

किसे ढूंढते नयन तुम्हारे
कैसा दर्द छिपाए दिल में ?

कदम कदम सँग चलना हमको
हर मोड़ पर मिलना हमको !

चलो भुला दो बीती बातें
चलो मिटा दो दुख फरियादें !

हाथ लिये हाथों में अपने
पूर्ण करेंगे सारे सपने !

साथ निभाने का है वादा
तुमने न कुछ माँगा ज्यादा !

जो चाहो वह सदा तुम्हारा
साँझा है यह जीवन प्यारा !

दर्द लिये अनजाने में जो
उन्हें भुला दो, अब तो हँस दो !

बंदा बोला फिर यह रब से

तुमसे ही अपना जीवन है
तुमसे ही यह तन, मन, धन है !

तुम ही हो सर्वस्व हमारे
तुमसे न कोई भी प्यारे!

तुमने ही जीना सिखलाया
तुमसे कितना सम्बल पाया !

हर उलझन को तुम सुलझाते
अपना कर्तव्य निभाते !

तुमसे ही यह जग चलता है
तुम से ही जीवन सजता है !

इस सृष्टि को तुमने चाहा
सुंदर सा इक ग्रह बनाया !

कितने तेजस्वी, मेधावी
कितने प्रखर, कितने बलशाली !

तुमने कितने उपहारों से
सोने चांदी के तारों से !

भर दी है यह दुनिया सारी
जीवन की सुंदर फुलवारी !

साथी ! तुम सँग जीवन प्यारा
तुम न हो सूना जग सारा !

कैसे तुमको भूल गए हम
खुद से ही हो दूर गए हम !

तुम आओगे तकती ऑंखें
सपनों से भर दोगे पाँखें!

अनिता निहालानी
२२ दिसम्बर २०१०