मंगलवार, सितंबर 1
जीवन क्षण भंगुर है
बुधवार, जून 5
अब चलो, पर्यावरण की बात सुनें
अब चलो, पर्यावरण की बात सुनें
ख़त्म हुई चुनाव की गहमा गहमी
अब चलो, पर्यावरण की बात सुनें
सूखते जलाशयों पर नज़र डालें
कहीं झुलसती धरती की बात सुनें
कहीं घने बादलों का करें स्वागत
उफनती नदियों का दर्द भी जानें
पेड़ लगायें, जितने गिरे या कटे
जल बचायें, भू में जज्ब होने दें
गर्म हवाओं में इजाफ़ा मत करें
ग्रीनहाउस गैसों को ना बढ़ायें
बरगद लगायें बंजर ज़मीनों पर
न हो, गमलों में चंद फूल खिलायें
पिघल रहे ग्लेशियर बड़ी तेज़ी से
पर्वतों पर न अधिक वाहन चलायें
सँवारे कुदरत को, न कि दोहन करें
मानुष होने का कर्त्तव्य निभायें
पेड़-पौधों से ही जी रहे प्राणी
है यह धरा जीवित, उसे बसने दें
जियें स्वयं भी जीने दें औरों को
नहीं कभी कुदरती आश्रय ढहायें
साथ रहना है हर हाल में सबको
बात समझें, यह औरों को बतायें !
गुरुवार, अक्टूबर 27
प्रकट और अप्रकट
प्रकट और अप्रकट
जगत
बुना है
प्रकट और अप्रकट
तन्तुओं से
मन
कुछ-कुछ ज़ाहिर होता है कर्मों से
कुछ छिपा ही रहता है भीतर
कितना छुपाना है
कितना दिखाना
शायद यह सीख लिया है
सहज ही कुदरत से
जड़ें छिपी रहती हैं
भूमि में दूर तक अंधकार में
और ऊपर फूल खिलाता है पेड़
मन की जड़ें भी फैली हैं
रिश्तों, वस्तुओं, स्मृतियों में
ना जाने कितने जन्मों की
अनंत की छाँव में यह खेल चलता है
यह धूप-छाँव का खेल ही जीवन है
हर श्वास में उगता निःश्वास में ढलता है !
मंगलवार, मार्च 15
कुदरत की होली
कुदरत की होली
झांको कभी निज नयनों में
और थोड़ा सा मुस्कुराओ,
रंग भरने हैं अंतर में मोहक यदि
हाथ कुदरत से अपना मिलाओ !
नीले नभ पर पीला चाँद
रूपहले सितारों में जगमगाये
कभी स्याह बादलों में
इंद्र धनुष भी कौंध अपनी दिखाए !
हरे रंग से रंगी वसुंधरा
जिस पर अनगिन फूल टंके हैं
ज़रा संभल कर जाना पथ पर
तितलियों के झुंड उड़े हैं !
होली खेलती दिनरात यह कुदरत
जगाना उल्लास ही इसकी फ़ितरत
केवल आदमी लड़ाई के बहाने खोजता
जहाँ रंगों के अंबार लगते
तुच्छ बातों को एक मसला बना लेता !
रंग सजते बन उमंग जीवन में
भर जाते तरंग तन और मन में
अगर रंग भरने हैं सदा के लिए अंतर में
सहज हर भोर में
संग सूरज के खिलखिलाओ
हाथ कुदरत से अपना मिलाओ !
सोमवार, फ़रवरी 28
इतना सा सच अनुभव कर ले
बुधवार, फ़रवरी 9
सच
सच
यहाँ अपना कुछ भी नहीं है
काया यह कुदरत से मिली
मन माया भी जिसमें खिली
भाषा ज्ञान मिला जगत से
जग से ही पाया जब सब कुछ
यहाँ खोना कुछ भी नहीं है
बस एक अहसास है, होने का
वह कौन है ? कोई क्या माने
कभी रस धार मन में फूटती सी
कहाँ हैं स्रोत ? कोई क्या जाने
कभी इक दर्द भी दिल में समाता
जहाँ में दुःख बहुत देखा न जाता
हुआ है मौन मन ! अब क्या कहे यह
अजाना है सफर ! जाना किधर !
न कोई यह बताता
इशारों में ही, सूनी राह पर, लिए है जाता
मगर हर बार गिरने से भी वह ही बचाता
फ़िकर किसको ? जब पाना कुछ भी नहीं है
यहाँ अपना कुछ भी नहीं है !
सोमवार, अक्टूबर 18
लेकिन सच है पार शब्द के
लेकिन सच है पार शब्द के
कुदरत अपने गहन मौन में
निशदिन उसकी खबर दे रही,
सूक्ष्म इशारे करे विपिन भी
गुपचुप वन की डगर कह रही !
पल में नभ पर बादल छाते
गरज-गरज कर कुछ कह जाते
पानी की बौछारें भी तो
पाकर कितने मन खिल जाते !
जो भी कुछ जग दे सकता है
शब्दों में ही घटता है वह,
लेकिन सच है पार शब्द के
जो निशब्द में ही मिलता है !
‘सावधान’ का बोर्ड लगाये
हर कोई बैठा है घर में,
मिलना फिर कैसे सम्भव हो
लौट गया वह तो बाहर से !
या फिर चौकीदार है बुद्धि
मालिक से मिलने ना देती,
ऊसर-ऊसर ही रह जाता
अंतर को खिलने ना देती !
प्राणों का सहयोग चाहिए
भीतर सखा प्रवेश पा सके,
सच को जो भी पाना चाहे
मुक्त गगन सा गीत गा सके !
सोमवार, जून 21
धरती, सागर, नीलगगन में
धरती, सागर, नीलगगन में
सत्यम, शिवम, सुंदरम तीनों
झलक रहे यदि अंतर्मन में,
बाहर वही नजर आएँगे
धरती, सागर, नीलगगन में !
सत्यनिष्ठ उर तीव्र संकल्प
बन शंकर सम करे कल्याण,
सुंदरता का बोध अनूठा
जगा दे जड़-चेतन में प्राण !
कुदरत भी अनुकूल हो रहे
अंतर अगर सजग हो जाये,
हर दूरी तज स्वजन बना ले
दोनों एक साथ सरसायें !
अंतर्मन हो सदा प्रतिफलित
बाहर सहज सृष्टि बन जाता,
उहापोह हर द्वंद्व मनस का
जग में कोलाहल बन जाता !
सोमवार, मई 24
सृष्टि का रहस्य नहीं जाने
रविवार, अप्रैल 11
उस अनंत के द्वार चलें हम
उस अनंत के द्वार चलें हम
बाहर की इस चकाचौंध में
भरमाया, भटकाया खुद को
काफी दूर निकल आए हैं
अब तो घर को लौट चलें हम !
कुदरत की यह मूक व्यथा है
ठहरो, थमो, जरा तो सोचो,
व्यर्थ झरे सब, सार थाम लो
अब तो कदम संभल रखें हम !
माना मन के नयनों में कुछ
स्वप्न अभी भी करवट लेते,
किस आशा का दामन थामें !
आज अगर जीवन खो दें हम !
जो भव रोग बना हो छूटे
आश्रय मिले मनस गुहवर में,
सीमित हैं साधन जीवन के !
उस अनंत के द्वार चलें हम
लौट चलें हैं दूर वतन से
जाने कब यह शाम घिरेगी,
जिस घर जाना नियति सभी की
उसकी राह न कहीं मिलेगी !
सोमवार, अप्रैल 5
क्यों रहे मन घाट सूना
क्यों रहे मन घाट सूना
पकड़ छोड़ें, जकड़ छोड़ें
भीत सारी आज तोड़ें,
बन्द है जो निर्झरी सी
प्रीत की वह धार छोड़ें !
स्रोत जिसका कहाँ जाने
कैद है दिल की गुफा में,
कोई बिन भीगे रहे न
आज तो हर बाँध तोड़ें !
रंग कुदरत ने बिखेरे
क्यों रहे मन घाट सूना,
बह रही जब मदिर ख़ुशबू
बहा आँसूं हाथ जोड़ें !
जो मिले, भीगे, तरल हो
टूट जाये हर कगार,
पिघल जाये दिल यह पाहन
भेद का हर रूप छोड़ें !


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