शनिवार, जुलाई 31

नयन वातायन बने

नयन वातायन बने


कोष भीतर हो छिपाए
तृषित क्यों फिरते जहाँ में
पूर्ण होकर क्यों अधूरे
गीत रचते इम्तहां में I

नजर से मिश्री लुटाओ
फूल सी मुस्कान लाओ
बोल कोकिल कूक जैसे
जिंदगी में प्राण लाओ I

चैन बांटो दोस्ती दो
प्रेम झलके हर घड़ी
दूत बनके शांति का तुम
जोड़ दो टूटी कड़ी I

तुम बहो जग को बहाओ
उर महासागर बने
तुम पुलक बन कौंध जाओ
नयन वातायन बने I


अनिता निहालानी
३१ जुलाई २०१०

गुरुवार, जुलाई 29

क्यों शिला बन गया मन

क्यों शिला बन गया मन

स्रोत भीतर प्रेम का है
क्यों शिला बन गया मन
प्रीत की धारा छुपी है
मीत क्यों न बने जीवन

सामने मधुकलश खोले
राह फूलों की सजी है
दो कदम के फासले पर
बिछी कोमल चान्दनी है

किन्तु तुम कैसे अभागे
कैद बैठे कन्दरा में
कंटको से घेर आंगन
तृषित रोते हो व्यथा में

बांह फैला रागिनी भी
व्यक्त होने को है व्याकुल
रोशनी का महासागर
प्रज्वलित होने को आकुल

तोड़ झूठी श्रृंखलाएं
प्रेम सरि का बांध तोड़ो
मुक्त हो मुस्कान बांटो
नेह निज से नित्य जोड़ो

अनिता निहालानी
२९ जुलाई २०१०

बुधवार, जुलाई 28

अधूरा है जग

अधूरा है जग

हर कहानी है अधूरी
हर मन यहाँ कुछ खोजता
रहता सदा अपूर्ण जग
और राज यही खोलता

सीलें इधर सीलें उधर
पैबंद ही हैं हर तरफ
पांव सिकोडें सिर खुले
धुंधले पड़े जीवन हरफ

मुट्ठी में सिमटी रेत ज्यों
थामें इसे वह छूटता
सोना नहीं पीतल था वह
हर भ्रम यहाँ है टूटता

मिलती नहीं जग में कभी
जिस जीत की तलाश है
अपने ही भीतर झांक लें
खोलें उसे जो पाश है


अनिता निहालानी
२८ जुलाई २०१०

शुक्रवार, जुलाई 16

गरीब की बीमारी

गरीब की बीमारी

बेबस, लाचार, गरीब आदमी
बीमार पड़ने की भी जिसको इजाजत नहीं
सिवा मरने के तिल-तिल चारा नहीं
डॉक्टर की नजर भी, हिकारत भरी
सिस्टर कर देती, पुकार अनसुनी
जमादार तक करे आनाकानी
सरकारी अस्पताल जान गांव से आया
उपेक्षा ही मिली इलाज न पाया
कदम-कदम पर हैं धन माँगते
भूखे कर्मचारी न दया जानते
सेवा तो दूर कोई सुविधा नहीं
हालत बदतर होती जा रही
किससे फरियाद करे किससे गुहार
बहरे कानों तक न जाती पुकार
बेबस लाचार, गरीब आदमी
बीमार पड़ने की भी इजाजत नहीं

अनिता निहालानी
१६ जुलाई २०१०

शुक्रवार, जुलाई 9

एक कहानी

एक कहानी

हम हिमाचल के बाशिंदे हैं I पिताजी व्यापारी हैं I हम दो भाई हैं I मैं छोटा हूँ, स्कूल तथा कॉलेज में मैं बहुत शरारती छात्र हुआ करता था I हम कुछ मित्रों का एक गैंग था, जो धमाचौकड़ी मचाने में सबसे आगे रहता था I अन्य छात्रों की ऐसी परेशानियों को हल करने का भी हमें शौक था जिसमें कुछ दादागिरी करने का मौका मिले I बड़े भाई से सदा मेरी स्पर्द्धा चलती रहती थी I वह जो करते वही मैं भी करना चाहता I ऐसे तो अध्यात्म में मेरी कोई विशेष रुचि नहीं थी, यहाँ तक की टीवी पर कोई दाढ़ीवाले बाबाजी प्रवचन दे रहे हों तो मैं चैनल बदल देता था I किसी बाबा की आँखों में नहीं देखता था इस डर से कि कहीं वह सम्मोहित न कर दें, लेकिन एक बार जब मैं कुछ दिनों के लिये बाहर गया था भैया ने ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ का बेसिक कोर्स कर लिया, लौटा तो मैंने भी कोर्स करने की जिद की I पिताजी ने कहा तुम अभी छोटे हो, २० वर्ष के होने पर ही कोर्स कर सकोगे पर मैं इतनी प्रतीक्षा नहीं कर सकता था, सो फार्म में अपनी उम्र ज्यादा लिखवा कर चला गया I कोर्स में कुछ समझ में नहीं आता था I हर दिन कुछ गृहकार्य दिया जाता था पर मैंने वह भी नहीं किया, लेकिन ‘सुदर्शन क्रिया’ करने के बाद भीतर कुछ ऐसा परिवर्तन हुआ जो शब्दों में कहा नहीं जा सकता I मैं जब छठी-सातवीं का विद्यार्थी था तो अक्सर मन में कई विचार उठते थे..... इस सामान्य से प्रतीत होने वाले जीवन के पीछे अवश्य कुछ और भी है... केवल खाना-पीना, पढ़ना और सो जाना मात्र इतना ही तो जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता..... मन में प्रश्न भी उठते थे कि कौन सी शक्ति इस ब्रह्मांड का नियंत्रण कर रही है? मन में इतने विचार कहाँ से आते हैं? जीवन में एक नियमितता कहाँ से आती है? लगता था कि कई बातें एक अंतराल के बाद पुनः घटित हो रही हैं, लेकिन कारण समझ से बाहर था I इन सवालों का जवाब खोजने निकला तो शिक्षकों व मातापिता दोनों ने कहा इस उम्र में ऐसी बहकी-बहकी बातें क्यों करते हो, पढ़ने में मन लगाओ I धीरे-धीरे मन में सवाल उठने बंद हो गए और मैं अपनी सामान्य दिनचर्या में व्यस्त हो गया I
सन् २००२ कि बात है गुरूजी हिमाचल आ रहे थे, सत्संग स्थल हमारे निवास से आधे घंटे की दूरी पर था I जब मित्रों ने कहा सत्संग चलते हैं तो पहले मैंने मना कर दिया क्योंकि एक तो पिताजी कहीं भी आसानी से जाने नहीं देते थे, दूसरे मुझे डर था कि सत्संग में जाने से हमारी इमेज खराब हो जायेगी, लोग क्या सोचेंगे? कौन हमसे मदद माँगने आयेगा? पर मित्रों ने जोर दिया और किसी तरह पिताजी को राजी कर हम वहाँ पहुँचे I मैं गुरूजी के आने से पहले मंच पर बायीं ओर बैठ गया बल्कि यह कहना सही होगा कि मुझे बैठा दिया गया I मन में तर्क-वितर्क चल रहे थे I लोग भजन गा रहे थे और मस्त थे, तार्किक बुद्धि ने सोचा बिना किसी कारण ये इतने प्रसन्न क्योंकर हैं ? तभी गुरूजी का प्रवेश हुआ, वे हाथ में पकड़ी माला को घुमाते हुए लगभग नाचते हुए से आये और आसन पर आराम से बैठ गए I बुद्धि ने कहा कि सत्संग में बड़े-बड़े वीआईपी आये हैं, गुरूजी उनको सम्बोधित करके जरूर कोई गूढ़ ज्ञान की चर्चा करेंगे किन्तु यहाँ तो बात ही कुछ और थी I एकदम अनौपचारिक ढंग से गुरूजी ने पूछा, ‘हाँ, सब कैसे हो? खुश हो? सबने ‘हाँ’ में उत्तर दिया, मेरे मन में विचार चलने लगे कैसे गुरु हैं यह?, कि तभी वे मेरी दिशा में पलटे एक पल रुके, फिर सामने देखा.. अगले ही पल फिर पलटे और उंगली से अपनी ओर आने का इशारा किया I मेरे सामने जो मित्र था मैंने उसे कहा, “जाओ गुरूजी तुम्हें बुला रहे हैं, शायद उन्हेँ पानी चाहिए” वह गया और लौट आया, गुरूजी ने फिर कहा, “नहीँ तुम इधर आओ” मेरी बायीं ओर दूसरे मित्र थे उन्हें मंजीरे देकर भेज दिया, पर गुरूजी ने कहा, “तुम जो चश्मा लगाये हो इधर आओ,” मैंने इधर-उधर देखा यकीन नहीं हो रहा था कि मुझ अनजान को वह क्यों बुला सकते हैं I डरते-डरते उनके पास गया, उन्होंने पूछा, “हाँ, हनी कैसे हो? कुछ बोलना चाहा पर जवाब तो कुछ सूझा नहीं, भीतर प्रश्न उठा, आप को मेरा नाम किसने बताया? गुरूजी ने फिर कुछ सामान्य प्रश्न किये, खुश हो? पढ़ रहे हो? बिजनेस भी कर रहे हो? धीरे-धीरे मन संयत हुआ और जवाब दिए पर तार्किक मन भीतर सवाल कर रहा था हजारोँ लोग बैठे हैं और गुरूजी इतनी साधारण बातें कर रहे हैं I अंत में उन्होंने आश्रम आने का निमंत्रण दिया, मैंने घबरा कर ‘हाँ’ में सर हिला दिया I अपनी जगह आकर बैठा तो लगा जैसे कोई स्वप्न देखा हो, लेकिन भीतर कुछ बदल गया था I सत्संग के बाद घर पहुँचा तो कितने ही दिनों तक गुरूजी की याद बनी रही फिर अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गया I
२००३ आया, कॉलेज में अवकाश था I बैंगलोर आश्रम में एडवांस कोर्स होने वाला था I एक बार फिर मित्रों ने कहा बैंगलोर चलना है I पिताजी को मनाना आसान नहीं था, मन में विचार भी चल रहे थे कि यदि छुट्टियों में यहीं रहा तो पिताजी दुकान पर बिठा देंगे I बैंगलोर जाकर कोर्स नहीं भी किया तो कम से कम एक नया शहर घूमने को मिलेगा, सो युक्ति से पिताजी को मनाया और मुझे तब महसूस हुआ कि जरूर कोई और भी चाहता है कि मैं बैंगलोर आकर कोर्स करूँ, कि कोई शक्ति है जो मुझे एक पूर्व निर्धारित मार्ग पर ले जा रही है I हम कुछ मित्र रवाना हुए I यात्रा के दौरान जैसा कि सभी के साथ होता है मन में विचारों की रेल भी चलती रही I इसे मैं why-why माइंड कहता हूँ, आश्रम कैसा होगा? क्या रहने के लिये वहाँ कुटीर होंगे? क्योंकि एक सुविधाजनक वातावरण में मैं बड़ा हुआ था, सदा ए सी में सफर करना, अपनी ही वस्तुएं इस्तेमाल करना, अपने ही बिस्तर पर सोना, ये मेरी प्राथमिकताएँ थीं I किताबों में पढ़ी प्राचीन कथाओं के अनुसार झोपड़ियों वाले आश्रम का एक चित्र मन में बन गया था, किन्तु जैसे ही बैंगलोर आश्रम में कदम रखा मन में सन्नाटा छा गया I सारे विचार एकाएक रुक गए I शाम का समय था आश्रम में उत्सव का माहौल था I देखते ही देखते बत्तियां जल उठीं और सारा आश्रम सुंदरता का मूर्तिमान रूप बन सज उठा I भीतर से आवाज सुनाई दी “धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है” I अगले दिन से कोर्स शुरू हो गया, जिसमें मुझे मित्रों से अलग कर दिया गया I मौन का पालन भी करना था, मन में आशा लेकर गया था कि गुरूजी से भेंट होगी, पर अभी तक नहीं हुई थी, सो उदासी महसूस कर रहा था I एक संध्या मैं बालकनी में बैठा था गुरूजी ने ऊपर देखकर हाथ हिलाया तो मैंने भी सबके साथ हाथ हिलाया, मुझे लगा गुरूजी को मेरा स्मरण कहाँ होगा, अगले दिन मैं दूसरी तरफ बैठा गुरूजी ने फिर मुझे देख कर हाथ हिलाया, इसके बाद एडवांस कोर्स बहुत अच्छा लगने लगा I पूर्ण मौन चल रहा था जो मुझे भीतर से जोड़ रहा था, कई प्रश्न पुनः उठने लगे जिनके जवाब भी भीतर से मिलने लगे I लगा ऐसा बहुत कुछ है जो दिखाई नहीं देता, सुनाई नहीं देता, बचपन के अधूरे सवालों के भी कुछ-कुछ जवाब मिलने लगे थे I
कोर्स के बाद सब प्रतिभागियों की विदाई से पहले गुरूजी एक-एक कर सबसे मिल रहे थे मैं एक कोने में था वहीं से हाथ हिलाकर विदा ली तो गुरूजी ने हाथ की उंगलियां मोड़ कर जैसे मेरे अभिवादन का जवाब दिया मन में आया कहीं गुरूजी मुझे बुला तो नही रहे फिर सोचा इतने सारे लोग प्रतीक्षा में खड़े हैं I मैं कुछ ही दूर गया था कि एक शिक्षक दौड़ते हुए आये और बोले, “गुरूजी तुम्हेँ बुला रहे हैं” मैं उनके साथ लौटा तो उन्होंने एक रेलिंग का मार्ग रोक कर मुझे वहीं गुरूजी की प्रतीक्षा करने को कहा I अनेक लोग मेरे पीछे खड़े थे, गुरूजी वहीं से आने वाले थे I हाथ में पकड़ी माला घुमाते हुए अपने चिर-परिचित अंदाज में वह आये और अचानक मेरा हाथ पकड़ कर भागने लगे, वहाँ खड़े लोग भी हमारे पीछे भागने लगे, पूरी भगदड़ मच गयी I मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था, कुछ दूर जाकर उन्होंने कहा, “जा रहे हो? मत जाओ, आश्रम में रुक जाओ” I
मैंने कहा, “कल तो मेरी वापसी की टिकट बुक है, जाना ही होगा” I
वे बोले, “कल हम दो सप्ताह के लिये तमिलनाडु जा रहे हैं, लौट कर तुमसे मिलेंगे” I
मन ने झट प्रतिक्रिया की, मुझे अकेला छोड़ कर खुद तो जा रहे हैं, फिर रुकने को भी कह रहे हैं !
गुरूजी बोले, “ऐसा करो तुम भी मेरे साथ चलो” मुझे एक और झटका लगा पहले आश्रम में आकर बिना कुछ किये भीतर मौन का अनुभव, कोर्स के दौरान गुरूजी का मुझे पहचानना, मेरा हाथ पकड़ कर भगाते हुए ले जाना और अब अपने साथ यात्रा का निमंत्रण! तब मेरी उम्र भी कम थी टीनएजर के ख़िताब से अभी निकला भर था I किसी तरह मैंने इतना ही कहा कि मुझे सोचना पड़ेगा I हम आगे बढ़े गुरूजी से मिलने आये एक परिवार में एक छोटी लड़की परीक्षा के आनेवाले परिणाम के भय से रो रही थी, गुरूजी ने कहा, “क्यों रोती है? तू तो हर सुबह ‘ओम नमो शिवाय’ का जप करती है न?” लड़की रोना भूल कर आश्चर्य से बोली आपको कैसे पता? मुस्कुराते हुए गुरूजी कहने लगे, ”मुझे सब पता है I फिर मुझे बोले, “कल सुबह सात बजे फ्लाइट है तुम छह बजे तैयार रहना” मैंने फिर कहा, “मैं सोच के बताऊँगा” आँखों के सामने पिताजी का चेहरा आ रहा था कितनी मुश्किल से कुछ दिनों के लिये आज्ञा मिली थी अब दो हफ्ते और घर से दूर रहने पर वे अवश्य ही बहुत नाराज होंगे I लौट कर मित्रों को बताया तो उनका चेहरा देखने लायक था, उन्हें मुझसे ईर्ष्या भी हो रही थी और वे खुश भी थे I रात भर सोचता रहा जाऊँ या न जाऊँ, मैं जानना चाहता था कि गुरु क्या होते हैं? गुरु तत्व क्या है ? अंततः निर्णय लिया कि जाना चाहिए, सुबह साढ़े छह बजे मैं निर्धारित जगह पर पहुँचा तो पता चला गुरूजी चले गए हैं, रात भर जगने के कारण आधा घंटा देर तो मुझे हो ही गयी थी I मैं अपना सामान उठाये पीछे लौट ही रहा था कि एक बार फिर एक वरिष्ठ शिक्षक आये और बोले तुम हमारे साथ ट्रेन से चल रहे हो, तुम्हारा टिकट बना हुआ है, मैं एक बार फिर आश्चर्य से भर गया, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था, वह शिक्षक बोले, “गुरूजी जानते थे कि तुम देर से आओगे इसीलिए तुम्हारा ट्रेन का टिकट बनवाया है I”
तमिलनाडु पहुँचे तो गुरूजी का व्यस्त कार्यक्रम आरम्भ हुआ, सत्संग, सभाएँ, उदघाटन समारोह, मीटिंग्स, आदि आदि में सारा समय निकल जाता था I मैं गुरूजी का बैग और आसन लेकर उनकी कार में पीछे बैठता था I सब कुछ ठीक था पर एक तो दक्षिण भारतीय भोजन फिर उसमें मुझे वहाँ लाल चावल मिलते थे, ठीक से खा नहीं पाता था कई बार भूख मिटती नहीं थी संकोच के कारण किसी से कह भी नहीं पाता था I एक दिन गुरूजी ने बुलाया और पूछा, ”ठीक से खा नहीँ रहे हो? मैं चौंका किसने कहा होगा वही प्रश्न उठाने वाला मन सामने आ गया और गुरु की क्षमता पर सहज ही विश्वास नहीं हुआ लेकिन उसके बाद हर दिन मेरे लिये उत्तर भारतीय भोजन की व्यवस्था होने लगी I यात्रा के दौरान एक बार कई गाडियों का काफिला जा रहा था, गुरूजी ने अपनी गाड़ी एक कच्चे रस्ते पर मोड़ने को कहा, एक कुटीर के सामने हमारी कार रुकी, एक बुजुर्ग महिला आयी और बोली कबसे मैं आपकी प्रतीक्षा कर रही थी I गुरूजी ने उसे कुछ फल व पैसे दिए, कुछ दिनों बाद पता चला कि उनकी देह शांत हो गयी I
हम यात्रा के दौरान किसी एक स्थान पर ज्यादा नहीं रुकते थे, मेरे सारे कपड़े मैले हो गए थे, धोने का समय ही नहीं मिला था I मैं चिंतित था कि कल गुरूजी के साथ क्या पहन कर जाऊँगा, तभी दरवाजे पर किसी ने खटखटाया, गुरूजी बुला रहे हैं, मैं फिर डरते डरते उनके पास गया, कहीं कोई भूल तो नहीं हो गयी, एक धोती और अंगवस्त्र देते हुए वे बोले, “कल इसे पहन लेना” आश्चर्य से मैं कुछ देर मौन खड़ा रहा, यह बात तो अभी तक किसी से कही भी नहीं थी, मैंने कहा, “पर मुझे तो यह पहनना नहीं आता, तो वे कहने लगे इस धोती को साड़ी की तरह पहन लेना और ऊपर से अंगवस्त्र डाल लेना I अगले दिन समुद्र तट पर कार्यक्रम था लोग फूल, मालाएं व उपहार दे रहे थे जिन्हें मैं गुरूजी के हाथ से लेकर कार में रख कर आता थोड़ी देर में पुनः गुरूजी का हाथ भर जाता वह मुझे पकड़ा देते, रेत पर धोती पहन कर भागना बड़ा कठिन लग रहा था, डर था कहीं धोती में पैर न फंसे I गुरूजी को अब मंच पर जाना था, मुझे आगे जाकर आसन बिछाना था, पर लोगों का हुजूम मुझे आगे जाने से रोक रहा था, लगभग भीड़ को धकेलते हुए जब मैं तेजी से आगे बढा तो अचानक मेरी धोती खुल गयी, बहुत शर्म आयी, पर इतनी भीड़ में किसी का ध्यान हम पर नहीं था लोग गुरूजी की झलक पाने को बेताब थे जो अभी आने वाले थे, मैंने आसन बिछाने का काम किसी अन्य सहयोगी को सौंपा और किनारे पर जाकर धोती ठीक करने लगा, गुरूजी मंच पर पहुँच गए मैं भी अपनी जगह पर जाकर बैठ गया, रैम्प पर चल कर जब वह लौटे तो माइक हटा कर मुस्कुराते हुए बोले, “अब सब टाइट है न ?” मैं शर्म से पानी-पानी हो गया, कहाँ मैं सोच रहा था अच्छा हुआ किसी ने देखा नहीं, गुरूजी तो काफी पीछे थे, अब लगता है गुरूजी ठीक कहते हैं, “God Loves Fun” I
उसी टूर की बात है, एक शाम दिन भर का थका मैं एक हाल में जमीन पर ही अपने बैग पर सर रखकर लेट गया, सबके लिये कमरे नहीं थे, मुझे मच्छर भी काट रहे थे, माँ की याद भी आ रही थी, अपने घर का सुविधाजनक वातावरण छोड़ कर यहाँ अकेले सोया हूँ, मन बहुत उदास था, सोचते-सोचते नींद आ गयी I सुबह क्या देखता हूँ एक वरिष्ठ शिक्षक भी मेरे निकट ही फर्श पर सोये हैं I उनसे पूछा आपको तो सोने का स्थान मिला था फिर यहाँ कैसे? उनका जवाब सुनकर मेरी आँखों से अश्रुपात होने लगा, वे बोले आधी रात को गुरूजी का फोन आया, हनी हाल में अकेला रो रहा है, उसके पास जाओ I मुझे लगा कोई है जो माँ से भी ज्यादा ध्यान रखता है I पल भर में सारा दर्द कृतज्ञता में बदल गया I
यात्रा समाप्त हुई और मैं घर लौटा, बहुत कुछ बदल चुका था, जीने में आनंद आ रहा था I पहले मन में क्रोध था, हिंसा थी, गुस्सा आने पर हाथ में पकड़ी वस्तु तक तोड़ देता था, why-why मन अब vow-vow मन में बदल चुका था I प्रश्न वाचक चिन्ह ? का घुमाव सीधा होकर विस्मय बोधक ! चिन्ह में परिवर्तित हों गया था I खुशी-खुशी कॉलेज गया, कोर्स कर लिया था, गुरूजी के साथ रहा था मन एक अद्भुत आनंद व शक्ति का अनुभव कर रहा था I पहले ही दिन कुछ लडके मुझे पकड़ कर रैगिंग के लिये ले गए, मन में जरा भी डर नही था, उन्होंने व्यर्थ के सवाल पूछने शुरू किये, व्यर्थ के काम करने को कहे, मैंने मना किया तो दस-बारह लड़कों ने पकड़ लिया और उनके नेता ने लोहे की एक चेन निकल ली I गुरूजी ने कहा था कि यदि किसी के मन, वाणी और भाव से हिंसा विलीन हो जाती है तो उसके सामने हिंसक प्राणी भी हिंसा त्याग देता है I मुझे जरा भी भय नहीं लग रहा था, भीतर गुरूजी के वचनों के प्रति विश्वास था, अचानक उस लडके ने मारने के लिये उठाया हाथ नीचे कर लिया, कॅालर से पकड़ कर धक्का दिया और वे सब चले गये I उस दिन मुझे पता चला कि सबसे बड़ी ताकत क्या है? कि वे ज्यादा शक्तिशाली थे या म्रेरे भीतर का प्रेम व आनंद!

जीजाजी

शुभकामनाएँ

मेधा प्रखर मस्तिष्क उर्वर
चेस खेलते हैं नेट पर
इस उम्र में लगते युवा
ऐसे हैं हमारे जीजा !

ड्राईव करके मीलों जाते
शेयर मार्केट के गुर आते
बागवानी का शौक जवां
ऐसे हैं हमारे जीजा!

साहित्य से बड़ा लगाव
कर्मठता का है स्वभाव
महल सा घर दिया बना
ऐसे हैं हमारे जीजा!

हैं उदार मनोवृत्ति के
पक्के हैं वह पर नियम के
लक्ष्मी की पायी है कृपा
ऐसे हैं हमारे जीजा!

सदा स्नेह पाया है उनसे
आज दुआ निकली है दिल से
स्वस्थ रहें सानंद सदा
ऐसे हैं हमारे जीजा!

स्वीकारें शुभदिन की बधाई
अधरों पर कविता है आयी
सिर पर हाथ रहे बना
ऐसे हैं हमारे जीजा!

अनिता निहालानी
९ जुलाई २०१०

कोई है

कोई है

सुलग रहा है रह-रह कर दिल
जाने कैसी पीड़ा छाई,
पलकों के पीछे से कोई
झांक रहा न दिया दिखाई I

भीतर ही भीतर यह कैसी
शक्ति का विस्फोट हो रहा,
बाहर आने को है व्याकुल
पर न कोई मार्ग पा रहा I

व्यर्थ न जाएँ सांसें देखो
व्यर्थ न हों जीवन का प्याला,
भीतर जो है अमृत का घट
भीतर जो छा गया उजाला I

भरा हुआ कृपा का बादल
बरस रहा है हर पल हम पर,
अहम् का छाता लिया लगाये
भिगो न पाता बहता निर्झर I

पल भर खाली हो कर देखें
पाएँ भीतर परम प्रकाश,
बांटें फिर कण-कण में उसको
भीतर पालें जो आकाश !


अनिता निहालानी
९ जुलाई २०१०

यात्रा विवरण


एक यात्रा सिंगापुर की.....

कोलकाता में रात्रि के दस बज कर दस मिनट हुए थे, और सिंगापुर एयरलाइन्स के जहाज में सीट के सामने लगा स्क्रीन बता रहा था कि... उस वक्त सिंगापुर में बारह बज कर चालीस मिनट हुए थे और..... कोलकाता से सिंगापुर तक २९०५ किमी की यात्रा तीन घंटे चौंतीस मिनटों में पूरी होगी I यह बोईंग खचाखच भरा था, परंपरागत पोषाक पहने सुन्दर परिचारिकाएँ भोजन सामग्री ला रही थीं I जब हमारी बारी आयी, आधी रात बीत चुकी थी I नींद से आखें बोझिल थीं पर धरती से हजारों मील ऊपर कुछ नया खाने का आकर्षण जगाए हुए था, सो थोड़ा कुछ खाकर हम स्वप्न लोक में खो गए I विवाह की पचीसवीं सालगिरह सिंगापुर में मनाने का विचार हमें एक रविवार को बातोँ-बातोँ में आया था, हमारे कई परिचित वहाँ हो आये थे और ढेरों किस्से सुनाते रहते थे. सेंटोसा आइलैंड... बर्ड पार्क.. डाल्फिन शो... तथा अन्य कई रोचक जानकारियाँ हासिल कर हम किसी जागरूक पर्यटक की भांति सिंगापुर जा रहे थे I

एशिया के दक्षिणपूर्व में स्थित विश्व के सबसे छोटे बीस देशों में से एक सिंगापुर काफी समय से पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहा है I जनवरी २०१० में हमें इस सुंदर द्वीप की यात्रा का सुखद अवसर मिला था I दिन अभी उगा भी नहीं था कि सिंगापुर कस्टम की औपचारिकताओं को पूरा कर हम चांगी हवाई अड्डे से बाहर निकले I सफेद टोयोटा में फ्रांसिस हमें लेने आया था I स्वच्छ सड़कों के किनारे क़तार बद्ध पेड़ लगे थे I लाल बत्ती पर कार रुकी तो हमें थोड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि इतनी सुबह कोई अन्य वाहन नजर नहीं आ रहा था I फिर याद आया कि सिंगापुर मे कानूनों का सख्ती से पालन होता है, यह एशिया के भ्रष्टाचार मुक्त देशों में प्रथम है तथा विश्व के दस भ्रष्टाचार मुक्त देशों में से एक है I होटल पहुंचे, फेंगशुई का प्रतीक होटल की बाहरी दीवार पर बहता हुआ पानी, खम्भों पर लिपटा लाल साटन, फूलोँ से सजा मुख्य द्वार, छत से लटके लाल गुब्बारे.... सभी उसकी सुंदरता बढ़ा रहे थे I अठाहरवीं मंजिल पर डीलक्स रूम की खिडकी से जगमगाती रंगीन रोशनियों का मोहक नज़ारा नज़र आया और हम सफर की सारी थकान भूल गए I

भारत में जब लोग सुबह की चाय पी रहे होंगे हम नहा धो कर सिंगापुर का डेढ़ सौ साल पुराना प्रसिद्द बोटैनिकल गार्डन देखने निकल पड़े I होटल से कुछ दूर ही MRT(Mass Rapid Transit) स्टेशन था, जहाँ से हमने एक मददगार स्थानीय महिला की सहायता से स्वचालित मशीन से जुरोंग ईस्ट की टिकट ली, वहाँ से बस द्वारा हम अपने गंतव्य पर पहुँचे I यूँ तो ६४ हेक्टेयर में फैला २००० ट्रॉपिकल पौधों का घर, झीलों में तैरते हंसों तथा मूर्तियों से सजा पूरा बगीचा ही दर्शनीय है, हमें सबसे अधिक आकर्षित किया नेशनल ऑर्किड गार्डन ने, जहाँ रंगों कि अनोखी छटा बिखरी हुई थी I कई दशकों से यहाँ ऑर्किड्स की हाइब्रिड किस्में उगायी जाती रही हैं I पीले रंग के हर शेड में, बैंगनी, लाल, गुलाबी, सफ़ेद, यानि कि सभी शोख रंगों में ऑर्किड्स का मानो एक खजाना था, जो मंत्रमुग्ध कर रहा था I यहाँ बच्चों के लिये भी एक आकर्षक पार्क है I जब घूमते-घूमते हमारे पैरों ने जवाब दे दिया तो हम वापस लौटे I उसी दिन कुछ विश्राम के बाद हम साइंस सिटी देखने निकले, जहाँ विज्ञान के आधुनिकतम विषयों को सैकड़ों नमूनों के द्वारा रोचक ढंग से दर्शाया गया है. जीनोम प्रदर्शनी, माइंड’स आई तथा काइनेटिक गार्डन दर्शनीय हैं I ओमनी थिएटर में हमने सागरीय जीवों पर एक IMAX फिल्म देखी, जिसमें नाचते हुए सर्पों का दृश्य अनोखा था I

इतिहास बताता है कि युरोपियन सिंगापुर में आये इससे पूर्व यह मलय प्रायद्वीप का भाग था I १८१९ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने ‘सर स्टैमफोर्ड रैफल्स’ (जिन्हें आधुनिक सिंगापुर का संस्थापक कहा जाता है व जिनकी श्वेत संगमरमर की प्रतिमा हमने सिंगापुर रिवर के तट पर सिटी टूर के दौरान देखी) के नेतृत्व में एक व्यापारिक केन्द्र स्थापित किया, जो बाद में ब्रिटिश हुकूमत का एक प्रमुख आर्थिक तथा सामरिक केन्द्र बन गया I द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कुछ समय के लिये जापानियों के अधिकार में चले जाने के अलावा सिंगापुर १९६३ तक ब्रिटेन का भाग रहा, तब यह मलेशिया में शामिल हो गया, किन्तु दो वर्षों के बाद १९६५ में स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में कॉमनवेल्थ तथा UNO में दाखिल हुआ I आज अमीर देशों कि सूची में सिंगापुर का स्थान विश्व में पाचवां तथा एशिया में तीसरा है I दिल्ली की आबादी से तिहाई आबादी वाला तथा क्षेत्रफल में आधे से भी कम वाला यह शहर-राष्ट्र दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है I यह ६३ छोटे-छोटे द्वीपों से मिल के बना है, जुरोंग तथा सेंटोसा द्वीप अपेक्षाकृत बड़े हैं I एक वर्ष में यहाँ लगभग १० मिलियन पर्यटक आते हैं I यहाँ का मुख्य आकर्षण है सुंदरता तथा मेहमाननवाजी I यह पर्यटकों के लिये पूर्णतया सुरक्षित स्थान है I यहाँ चीनी, भारतीय, मलय तथा युरेशियन लोग रहते है, मंडारिन, तमिल, मलय तथा अंगरेजी यहाँ की राष्ट्रीय भाषाएँ है I सिंगापुर में वाहनों की संख्या बहुत अधिक है, इसके बावजूद यहाँ प्रदूषण नहीं है I सारा शहर एक बगीचा नजर आता है, हरा-भरा तथा साफ-सुथरा I

अगले दिन हम सिटी टूर पर निकले I आर्ट हाउस, पार्लियामेंट हाउस, विक्टोरिया थिएटर, फुलर्टन होटल देखते हुए हम मर्लिन पार्क में रुके, जहां अर्ध्मत्स्य तथा अर्धसिंह के रूप में ८.६ मीटर ऊँचा श्वेत मर्लिन का बुत है I सिंगापुर का अर्थ ही है सिंह का पुर या नगर, सिंह की एक विशाल मूर्ति सेंटोसा द्वीप में भी है I नेशनल म्यूजियम, एस्प्लेनेड पार्क, वार मेमोरियल पार्क, चाइना टाउन, जेम फैक्ट्री अदि दिखाने के बाद फ्रांसिस हमें सिंगापुर फ्लायर ले गया, १६५ मीटर ऊँचा यह व्हील लन्दन के व्हील से भी ऊँचा है I ऊँचाई से हमने सागर में लंगर डाले अनेकों जहाज देखे I सिंगापुर पोर्ट दुनिया के व्यस्ततम पोर्ट्स में से एक है I यह विश्व का चौथा विदेशी मुद्रा विनिमय केंद्र है I सिंगापुर रिवर ‘मरीना बे’ में सागर से मिलती है, यहाँ स्थित है आधुनिक वास्तुकला का बेजोड़ नमूना एस्प्लेनेड थिएटर, जिसके विशाल कंसर्ट हॉल में हमने एक शाम पश्चिमी शास्त्रीय संगीत सुना, वह एक अविस्मरणीय अनुभव था I

रात्रि का समय था नाईट सफारी का, सिंगापुर जू से सटा है नाईट सफारी पार्क, जहाँ रात में निकलने वाले जंगली जानवरों को चांदनी का भ्रम देते कृत्रिम प्रकाश में दिखाया गया I रात के अंधेरे में हमारी ट्राम जंगल के बीच से गुजरते हुए एक रहस्यमय वातावरण का निर्माण कर रही थी I ४० हेक्टेयर के क्षेत्रफल वाला यह पार्क सौ से अधिक जातियों के लगभग एक हजार जंगली जानवरों को संरक्षण देता है I
सिंगापुर जू के समान जुरोंग बर्ड पार्क भी एक दर्शनीय स्थान है I यहाँ हमने ‘बर्ड्स एंड बडीज’ तथा ‘बर्ड्स ऑफ प्रे’ दो शो देखे, जिनमें कुशल प्रशिक्षक बाज, हॉक, फालकन तथा रंगबिरंगे तोतों द्वारा खेल दिखाते है I पक्षियों को उनके इशारों पर करतब करते देख सभी दर्शक रोमाचिंत थे I एक खास बात थी शो द्वारा दिया गया सन्देश – रीड्यूस, रीयूज, रीसाइकिल अर्थात पर्यावरण को साफ रखने के लिये हमें चीजों का इस्तेमाल कम करना चाहिए, दुबारा इस्तेमाल करना तथा व्यर्थ वस्तुओँ को पुनः इस्तेमाल के योग्य बनाना चाहिए I

जुरोंग बर्ड पार्क में ६०० प्रकार के ९००० पक्षी प्राकृतिक वातावारण में रहते हैं I पैनोरेल में बैठकर हमने विशाल उद्यान देखा I यहाँ रंग बिरंगे तोते, शुतुरमुर्ग, पेलिकेन तथा सैकडों की संख्या में गुलाबी फ्लेमिंगो को झील में एक साथ निहारना सुखद अनुभव था I पेंगुइन के लिये आर्कटिक जैसा वातावारण था I हमने डॉल्फिन शो का आनंद लिया, जिसमें चार गुलाबी रंग की डाल्फिनों ने नृत्य तथा गेंद के साथ अनोखे करतब दिखाए, दो छोटे काले रंग के ‘सी लायन’ भी प्रशिक्षक के इशारों पर कलाबाजी दिखाकर दर्शकों को अभिभूत कर सके I ‘अंडरवाटर वर्ल्ड’ में पानी के अंदर एक पारदर्शी सुरंग के द्वारा रंगबिरंगे कोरल, शार्क, स्टोन फिश, जेली फिश, ईल, आक्टोपस, समुद्री कछुए, सी लायन तथा अनेकों प्रकार के समुद्री जीव देखना एक रोमांचक अनुभव था I यहाँ हमने दुनिया के सबसे ऊँचे मानव निर्मित झरने के सामने खड़े होकर फोटोग्राफी की I
सिंगापुर नाम है मस्ती का, समृद्धि का, मेहनत का, स्वच्छता और समन्वय का. यहाँ जिधर देखें लोग स्वस्थ, सम्पन्न व सहज नजर आते हैं I सड़कों के किनारे हरी घास के गलीचे हैं, पेड़ हैं, हरियाली हैI कंक्रीट के जंगल के बीच घास के हरे-भरे मैदान हैं I लोग मुस्तैदी से काम पर लगे हैं, थैंक्यू, सॉरी उनकी जबान पर चढ़े हैं I इन्सान की शक्ति की दाद देनी पड़ती है यहाँ के वैभव को देखकर. औरतें हर क्षेत्र में आगे हैं I दुनिया के सामने मेहनत, ईमानदारी व भाईचारे की मिसाल है यह मुल्क I

सिंगापुर के दक्षिणी भाग में स्थित सेंटोसा द्वीप किसी युग में समुद्री डाकुओं की शरणस्थली हुआ करता था, जो बाद में ब्रिटिश सेना का अड्डा बन गया I आज यह पर्यटकों के लिए एक सुन्दर स्थान है, जहाँ भविष्य में एक थीम पार्क तथा युनिवर्सल स्टूडियो भी बनने वाला है I हमने कई घंटे इस द्वीप पर बिताए I यहाँ भी एक विशाल सफ़ेद मर्लिन है I स्काईटावर पर चढ़ कर दूर तक फैले क्षितिज को देखा I ‘इमेज़ेज ऑफ सिंगापुर’ में पुरानी वस्तुओं तथा ध्वनि व प्रकाश की सहायता से इतिहास की यात्रा की I बच्चों के लिये यहाँ एक तितली पार्क तथा एक कीट पार्क है I यहाँ का मुख्य आकर्षण है ‘सौंग्स ऑफ द सी’ जहाँ अग्नि, जल तथा लेजर किरणों के माध्यम से आकाश में एक अद्भुत दृश्यजाल उत्पन्न कर दिया गया I एक कहानी के इर्दगिर्द बुना प्रकाश, रंगों व संगीत का ताना-बना, समुद्रतट पर बैठे सैकड़ों दर्शकों को एक अनोखे लोक में ले गया I बाद में हमने पूरे कार्यक्रम का एक डीवीडी भी खरीदा I

एक सुबह पैदल चलते हुए हम होटल से कुछ ही दूर स्थित ‘लिटिल इंडिया’ इलाके में पँहुच गए, जहाँ बड़ी संख्या में तमिल रहते है I अगरबत्ती तथा फूलोँ की सुगंध ने हमें मोह लिया I बंदनवार सजे थे, एक विशाल वैन में सीढ़ी पर सवार हो एक व्यक्ति सड़क पर बने द्वार पर तोरण सजा रहा था I भक्ति संगीत हवा में गूंज रहा था, पोंगल की तैयारी जोरशोर से हो रही थी I यहाँ के बाजार बिलकुल भारतीय बाजारों की तरह लग रहे थे I रविवार की संध्या को हमने देखा की लिटिल इंडिया के पार्क तथा सडकों के किनारे के स्थान लोंगो से खचाखच भर गए हैं, पता चला कि सप्ताह में एक बार वे आपस में मिलकर सुख-दुःख बांटते है, तथा भारत आने-जाने वाले लोगों से धन या सामान मंगवाते-भेजते हैं I इसी तरह की भीड़ चाइनाटाउन में चीनी लोगों की होती है I चाइनाटाउन में प्राचीन बौद्ध व चीनी मंदिरों के साथ एक हिंदू मंदिर व मस्जिद भी है, यहाँ पुराने और नए का अद्भुत संगम है. १८२० में यहाँ पहला चीनी व्यापारी आया था, आज यह सिंगापुर का बड़ा व्यापारिक केन्द्र है I

हमारी यात्रा की अंतिम संध्या चायनीज तथा जापानीज़ गार्डन में बीती I यहाँ दो आकर्षक पगोडा तथा एक विशाल झील के चित्र हमने उतारे I पश्चिमी सिंगापुर में स्थित ये विशाल बगीचे बोन्साई तथा सीमेंट के लैम्पों के लिये जाने जाते हैं I ‘चीनी नए वर्ष’ पर चायनीज गार्डन फूलोँ से सजाया जाता है तथा ‘मिड ऑटम फेस्टिवल’ पर सितम्बर में जापानीज़ गार्डन लैम्पों के प्रकाश से जगमगा उठता है I

दुनिया के हर कोने से सिंगापुर आने वाले यात्रियों के साथ गुजारे ये दिन एक सुखद स्मृति बनकर हमें जीवन भर गुदगुदाते रहेंगे ! कल्पना कीजिये आप एक विश्वस्तरीय रंगशाला में बैठे हैं आपके आगे एक चायनीज़ परिवार है, दायें एक ऑस्ट्रेलियाई महिला बैठी है, बाएं यूके से आयी एक नन्ही लड़की है, कुछ दूर पर एक अश्वेत युवक है और सिंगापुरी तो हैं ही, यह शहर जैसे पर्यटकों को ध्यान में रख कर बनाया गया है I हम लौट आये हैं यादों का एक खजाना लेकर और एक सपना लेकर भी कि एक दिन भारत भी अपनी स्वच्छता, पारदर्शिता, ईमानदारी पर गर्व कर सकेगा I

बच्चों की पालना

उचित पालन-पोषण बनाम जिम्मेदार नागरिक

अंगरेजी में एक कहावत है कि ‘ चाइल्ड इज ऐज ओल्ड ऐज हिज एन्सेसटर्स’ अर्थात बच्चा उतना पुराना होता है जितने उसके पूर्वज. ईसा ने कितना सही कहा था कि बच्चे की शिक्षा-दीक्षा उसके जन्म से एक सदी पूर्व ही आरम्भ हो जाती है, उस समय भले ही उसका अस्तित्त्व न हो पर उसकी जड़ तो होती है. माता-पिता को संस्कार उनके पूर्वजों से ही मिलते हैं, उनके रहन-सहन, आचरण का असर निश्चित ही बच्चे पर पड़ने वाला है. पिता से भी अधिक माता का उत्तरदायित्व कहीं अधिक है, गर्भावस्था में बच्चे पर माँ की मानसिक भावनाओं व विचारों का बहुत असर पड़ता है. यदि माँ स्वस्थ, स्वच्छताप्रिय, मधुरभाषिणी, मेहनती व निष्ठावान है तो संतान आगे चलकर अवश्य ही श्रेष्ठ व प्रतिभावान होगी.
मानव जीवन के अनेकानेक कर्त्तव्यों में संतान उत्पन्न करना व उसका यथायोग्य पालनपोषण करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है. भारत में आज भी बालविवाह की प्रथा जारी है जिससे कम उम्र में मातापिता बने युवक युवतियाँ इस कर्त्तव्य को ठीक से निभा नहीं पाते, जिसका कुपरिणाम सारे समाज को भोगना पड़ता है. आज देश में हजारों अनाथ व आवारा बच्चे हैं जिन्हें उचित देखभाल नहीं मिल रही है, यही बच्चे बड़े होकर समाज की शान्ति के लिये घातक सिद्ध हो सकते हैं. कहना न होगा कि आज के अपराधी प्रवृत्ति में लगे युवक यदि बचपन में अच्छे संस्कारयुक्त वातावरण में पाले गए होते तो न जाने इनमें से कितने योग्य, परोपकारी, समाजसेवी सभ्य नागरिक होते.
किसी देश का भविष्य उसकी भावी पीढ़ी पर निर्भर करता है. सुयोग्य बालक ही राष्ट्र के सुयोग्य नागरिक बनते हैं. बच्चों में राष्ट्रीयता की भावना का विकास, अनुशासन और समर्पण, संस्कारवान माता के पालन से ही आती है. समाज में व्याप्त अनीति व भ्रष्टाचार को रोकने के लिये भावी पीढ़ी को चरित्रवान, ईमानदार तथा परिश्रमी बनाने का उत्तरदायित्व मातापिता का है. कर्मक्षेत्र में उतरने का अवसर मिलने पर जो सफलतापूर्वक अपना कर्तव्य निभाता है वही सच्चा नागरिक है. जो दूसरों का सम्मान करते हुए अपना सम्मान बनाये रखने में सक्षम हो वही अच्छा नागरिक है. जिन सदगुणों के आधार पर सम्मान पाया जा सकता है वे हैं- शिष्टता, परोपकार, स्वच्छता, सदाचार तथा व्यवस्था. इन गुणों का बीजारोपण बच्चों में आरम्भ से ही कर देना चाहिए. बच्चों का मानस इतना कोमल होता है कि उसमें बोये बीज आसानी से पनप जाते हैं. उन्हें बचपन से ही ऐसे वातावरण में रखा जाना चाहिए जिससे उनमें उदार भावनाओँ का जन्म हो. घर में किसी भी तरह का भेदभाव न हो, लड़का-लड़की दोनों को शिक्षा का अधिकार मिले, अन्यथा बच्चों में न्याय के प्रति अश्रद्धा कि भावना आ जाती है.
बच्चों से क्रम से ऐसे काम लेने चाहिए जिनसे उनमें जिम्मेदारी का भाव पनपने लगे. उनको रहन-सहन उठने-बैठने का एक सलीका सिखाना चाहिए. शिष्टाचार व मेलजोल सिखाने के लिये उन्हें मित्रोँ व सम्बधियों के यहाँ ले जाना चाहिए. बालक को भी अपने मित्रों को घर बुलाकर भोजन कराने का अवसर देना जरूरी है इससे उनमें सामाजिकता और आपसी सौहार्द उत्पन्न होगा. उनके नैतिक विकास के लिये अच्छी पुस्तकें पढ़ने की आदत बचपन से डालनी चाहिए.
बच्चों का निर्माण मातापिता अपनी वाणी से नहीं अपने आचरण से भलीभाँति कर सकते हैं. प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक आर्थर डिन्गले ने कहा है ‘बालक उस पर अमल नहीं करता जो कुछ आप कहते हैं, बल्कि वह तो उससे सीखता है जो आप करते हैं. यदि मातापिता अपने दैनिक जीवन में पड़ोसियों, संबधियों तथा समाज के अन्य लोगों की निंदा करते रहते हैं तो बच्चे भी समाज विरोधी व क्रोधी स्वभाव के हो जाते हैं. यदि मातापिता जानबूझ कर या अनजाने में अपने बच्चों के सामने झूठ बोलते हैं तो बड़े होकर उनसे सच्चाई की उम्मीद रखना व्यर्थ है. वैसे प्रत्येक बच्चे के स्वभाव, संस्कार, मूल प्रवृत्तियों में अपनी कुछ न कुछ विशेषतायें होती हैं, फिर भी जैसे एक माली खाद-पानी देकर काट-छांट कर पौधे को अधिक उपयोगी व फलदायी बना सकता है, वैसे ही प्रत्येक बच्चा अपनी प्रतिभा को विकसित कर एक श्रेष्ठ नागरिक बन सकता है. उसके निर्माण पर ध्यान न देने से होनहार बालक भी अविकसित रह सकता है. प्रत्येक बच्चे में एक जन्मजात प्रतिभा होती है, यदि उसको बढ़ावा दिया जाये तो वह एक दिन असाधारण स्थिति प्राप्त कर सकता है.
बच्चों का सही ढंग से पालन करने के लिये उनके निर्वाह के लिये साधन जुटाने के अलावा तीन बातें विशेष रूप से आवश्यक हैं – प्रेम, अनुशासन तथा स्वतंत्रता. ये क्रमश बच्चे के हृदय, चरित्र तथा व्यक्तित्व को अभिसिंचित करती हैं, तथा उन्हें एक सही दिशा देकर एक जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करती हैं. प्रत्येक मातापिता अपने बच्चे से प्रेम करते हैं पर उस प्रेम की अभिव्यक्ति इस प्रकार होती है कि या तो अधिक लाड़-प्यार से बच्चे बिगड़ जाते हैं या उनमें आत्मविश्वास की कमी रह जाती है. कुछ मातापिता अधिक लाड़-प्यार के कारण उनकी गलतियों की तरफ से आंखें मूंद लेते हैं, कुछ हर बात पर टोकते रहते हैं. प्रेम और अनुशासन का संतुलन बच्चों को बुराइयों के प्रति सजग रहना तथा अच्छाइयों के लिए लगाव रखना सिखाएगा. इसी तरह बच्चे को खुली छूट देना या बिलकुल स्वतंत्रता न देना दोनों गलत हैं. मातापिता को कदम-कदम पर बच्चे के सही विकास के लिये सोच समझ कर निर्णय लेने होंगे.
आज समाज में जो अफरा-तफरी मची हुई है, सामाजिक मूल्य खोते जा रहे हैं, कानून का पालन नहीं होता, अपराध बढ़ रहे हैं, प्रदूषण का स्तर बढता जा रहा है, विद्यार्थी आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाने लगे हैं. स्पष्ट है कि आज के नागरिक जिम्मेदार नहीं हैं, तुच्छ स्वार्थ के कारण वे अपने कर्त्तव्यों को भुला बैठे हैं. इन सबके पीछे गहराई से देंखे तो पता चलता है कि जिस वातावरण में उन्हें पाला गया वहाँ सच्चाई, ईमानदारी, पारदर्शिता तथा परोपकारिता जैसे गुणों को सिखाने की कोई व्यवस्था नहीं थी. आज न तो मातापिता के पास इतना समय है न शिक्षक इतने आदर्शवादी हैं जो बच्चों में अच्छे मूल्यों की स्थापना करें. किन्तु निराश होने की आवश्यकता नहीं है, आज भी समाज को राह दिखाने वाले संत तथा विद्वान मौजूद हैं जरूरत है सजग रह कर उनसे मार्गदर्शन ग्रहण करने की ताकि भावी पीढ़ी को सही ढंग से पाला जा सके.

अनिता निहालानी

एक अनोखा बचपन

एक अनोखा बचपन

नन्हा पुनः आकाश को एकटक देखता पाया गया, माँ ने जब सारा घर छान लिया तो उसे ध्यान आया कि कहीं पिछली बार की तरह वह बगीचे में घास पर लेट कर आकाश की नीलिमा में तो नहीं खो गया I आहट पाते ही वह चौंक कर उठ बैठा, काले लम्बे व घने केशों से सजा उसका साँवला चेहरा व बड़ी-बड़ी आंखें सभी को मंत्र मुग्ध कर लेती थीं I
“बेटा, तू आकाश में क्या खोजता फिरता है?
“माँ, मैं आकाश के पार जाना चाहता हूँ, जाने क्या है उसके पार, तुम जानती हो क्या?”
माँ खिलखिला कर हँस पड़ी. “वहाँ कुछ भी नहीं है बेटा, यह नीला रंग भी तो आभास मात्र है I”
“नहीं, वहाँ कुछ है, जरूर कुछ है, एक दिन मैं उसको ढूँढ निकालूँगा I”
ठीक है, अभी तो तुझे स्कूल के लिये तैयार होना है I
स्कूल पहुंचा तो मित्रों ने घेर लिया, आज भी उसे दो छात्रों के बीच मध्यस्थता करानी थी I उसका निर्णय सब आँख मूंद कर मानते थे I अध्यापक भी उसकी निर्दोष आंखों और तीव्र बुद्धि से प्रभावित थे I एक वर्ष में दो कक्षाएं पास करता हुआ वह आठ साल की उम्र में छठी का विद्यार्थी था I बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी भी उससे बातें करते अक्सर देखे जा सकते थे I जब कोई उससे पूछता वह बड़ा होकर क्या करेगा तो सदा एक ही जवाब वह मुस्कुराते हुए देता था, मैं दूर देशों तक लोगों से मिलने जाऊँगा, वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं I पूछने वाला चकित हो जाता तो वह हँस पड़ता, बच्चे के मुँह से निकली बात को महत्वहीन समझ कर लोग भुला देते I
छोटी बहन उसकी सबसे बड़ी प्रशंसिका थी, जब तक वह घर में रहता आगे-पीछे घूमती रहती, फिर भी कभी-कभार उनमें झगड़ा हो जाता तो वह चुपचाप अपने काम में लग जाता जैसे कुछ हुआ ही न हो I बहन थोड़ी देर मुँह फुलाए रखती फिर खुद ही धीरे से आकर बात करने लगती क्योंकि वह तो तब तक झगड़े की बात भूल ही चुका होता था I दोनों मिल कर खेलों की नई-नई योजनाएँ बनाने लगते I वह जब ध्यान मग्न होता तो बहन उसका चेहरा देखती रह जाती, उसे छोटी उम्र से ही अहसास हो गया था कि उसका भाई अन्य सब बच्चों से अलग है I जब बच्चे बिना किसी जरूरत के फूल-पत्ती व टहनियाँ तोड़ते हुए निकल जाते वह पूजा के लिये फूल तोड़ने में भी झिझकता था, एक चींटी तक को मारना भी उसे मंजूर नहीं था, स्कूल में पैर की ठोकर से फुटबाल उछालते समय जब अन्य छात्रों को खुशी से भरे देखता तो उसका कोमल हृदय कांप जाता, वह अपने पैरों की ओर देख कर सोचता इनसे किसी को ठोकर मारना तो दूर हल्की सी चोट भी नहीं लगाई जा सकती I जब दूसरे बच्चे मैदान में धमा-चौकड़ी मचाते वह नयन मूंदे जाने क्या सोचा करता नहीं तो निकट के मंदिर के पुजारी की गतिविधियों को ध्यान से देखा करता I कभी-कभी मुहल्ले के बच्चे खेल खत्म कर उसके निकट आ बैठते और वह उन्हें काल्पनिक मूर्ति की पूजा करना सिखाता, ध्यान करना सिखाता I कई श्लोक उसे कंठस्थ थे अपनी मधुर आवाज में जब गाता सब मौन हो सुनने लगते I
पिता एक सरकारी दफ्तर में अधिकारी थे, उनका सामान बैठक में बड़ी मेज पर एक छोटी अटैची में रखा रहता था, कुछ फाईलें, जरूरी कागजात, पेन, चश्मा तथा चाबियाँ यही सब था उस सामान में I उसने देखा कि पिता जब दफ्तर के लिये तैयार होते हैं तो सारा घर उनके आगे पीछे घूमता है, माँ खाना बनाते-बनाते उनके कपड़े आदि रख जाती, नौकर जूते पॉलिश कर ले आता I पिता गम्भीर मुद्रा में सब पर हुकुम चलाते I एक दिन सोने से पहले उसने अटैची से सारा सामान निकाल कर अपने खिलौने उसमें रख दिए, पिता ने अगले दिन रोज की तरह अटैची उठाई व दफ्तर चले गए I वहाँ अपने सामान की जगह खिलौने देख पहले तो सकपका गए पर साथियों को हँसते देख खुद भी हँसने लगे I घर आने तक सोचते रहे कि उनके बेटे ने ऐसा क्यों किया, शायद वह उन्हें समझाना चाहता था कि जिन फाइलों को लेकर वह इतने गम्भीर हो जाते हैं, वे खिलौनों से बढकर कुछ नहीं I काम को अति महत्व देने से जीवन हाथ से छूट जाता है I घर आकर बालक को बुलाया तो वह चुपचाप आकर खड़ा हो गया, इशारे से उन्होंने पूछा, मेरा सामान कहाँ है? वह हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गया, जहाँ सलीके से सारी फाइलें व अन्य चीजें रखीं थीं I पुत्र की मासूमियत देख वह मुस्कुरा दिए I जीवन का एक सूत्र आज इस नन्हे बालक ने उन्हें पकड़ा दिया था I
उसे दादी से बहुत लगाव था पर उनकी कुछ बातोँ का विरोध करने से वह नहीं चूकता था, चाहे इसके लिये उनके कोप का भाजन भी बनना पड़े I ग्वाले को घर में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं थी क्योंकि वह एक हरिजन था I वह जानबूझ कर उसके साथ खेलता कभी उसके घर भी चला जाता I बाद में इसके लिये दादी की डाँट सहनी पड़ती I घर में काम करने वाली छोटी बालिका के साथ भी उसकी सहानुभूति थी, दिन भर उसको काम करते देख उसका मन करुणा से भर जाता I भगवदगीता के श्लोक उसे केवल याद ही नहीं थे वह जीवन में उनका पालन भी कर रहा था I दादी रोज संध्या बेला में एक आसन बिछा कर पूजा की थाली लिये भगवान की प्रतीक्षा करती थी, जाने किस रूप में वह आ जाएँ, इसलिए हर अतिथि को आदर सहित खिलाती व उपहार देती, उसे इस खेल में बहुत मजा आता I परमात्मा के प्रति उसका सहज प्रेम उसके जीवन की हर बात से जाहिर हो रहा था I
उस दिन वह जल्दी-जल्दी स्कूल से लौटा, सुबह उसकी पूजा व ध्यान अधूरा रह गया था क्योंकि घर में कुछ काम था I पर उसने कमरे में जाते ही देख लिया पूजा का स्थान खाली था, माँ ने फिर सब सामान हटा दिया था, माँ भोजन लाई तो उसने मुँह फेर लिया, थोड़ी देर बाद वह सारा सामान ताजे फूलों के साथ रख कर जाने लगी तो उसने कनखियों से उसकी नम आँखों को देखा और वह दौड़ कर उसके गले से लिपट गया I उसे याद आया पिछले हफ्ते ही उसने माँ को नाराज किया था जब स्कूल टूर से लौटने पर उसका खाली बैग देख कर माँ ने पूछा था “तेरे कपड़े कहाँ हैं, ओढ़ने व बिछाने की चादरें व शाल कहाँ हैं?”
कुछ और पूछने का मौका न देते हुए वह मुस्कुरा कर बोला, “मेरे मित्रों को तुम्हारी पसंद बहुत भाती है, मेरा सब कुछ तुम्हीं तो लाती हों माँ I”
पर माँ रोज-रोज की इस लुटाऊ वृत्ति से तंग आ चुकी थी सो खूब डाँट सुनायी I लेकिन दोनों जानते थे कि इस डाँट का असर ज्यादा दिन तक रहने वाला नहीं है I माँ को भय था कि इतना वैराग्य कहीं उसे घर से दूर न ले जाये I ध्यान में डूबे अपने पुत्र को देख कभी उसके शैशवकाल कि वह घटना याद आ जाती जब छत में लगी छड़ से लोहे की भारी जंजीरों सहित उसका लकड़ी का पालना नीचे आ गिरा था वह तो बेहोश ही हो गई थी पर नन्हा शिशु मुस्का रहा था I थोड़ा सा बड़ा होने पर जब वह भाषा का ज्ञान सीख गया उसकी कही हर बात मानता था, वही बालक अब सारा समय मंदिरों, मसजिदों, व चर्चों के चक्कर लगाता रहता था I
माँ पुत्र के इस व्यवहार से चिंतित हो जाती तो वह उसे आश्वस्त करता, माँ के कहने पर उसने पढ़ाई जारी रखी तथा भविष्य में नौकरी के लिये इंटरव्यू देने के लिये भी मान गया, पर उसके जीवन का उद्देश्य स्पष्ट था, वह सरे विश्व के लोगों के जीवन को खुशियों से भर देना चाहता था I
अनिता निहालानी
९ जुलाई २०१०