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सोमवार, अक्टूबर 6

चक्र से बाहर

चक्र से बाहर 


आने दो यादों के बादल 

छाने दो भावों के बादल, 

वर्तमान का नभ अनंत है 

तिरने दो शब्दों के बादल !


उड़ें हवा संग, हों काफ़ूर 

बहकर यहाँ से जायें दूर, 

नीला गगन स्वच्छ निर्मल पर 

सदा अचल, रहे अडिग हुज़ूर !


तुम भी तो कुछ उसके जैसे 

कहाँ ख़त्म होती है सीमा, 

हर पल नया रूप धर आये 

दिखे न परिवर्तन, हो धीमा !


माना जाह्नवी अति पुरातन 

जल इस क्षण में नया आ रहा, 

एक चक्र में घूमती सृष्टि 

हो जो बाहर, वही देखता !


सोमवार, मार्च 18

गहराई में जा सागर के

गहराई में जा सागर के 


हँसना व हँसाना यारों 

 अपना शौक पुराना है,

आज जिसे देखा खिलते 

कल उसको मुरझाना है !

 

जाने कब से दिल-दुनिया 

ख़ुद के दुश्मन बने हुए, 

बड़े जतन कर के इनको 

तम से हमें जगाना है !

 

बादल नहीं थके अब भी  

कब से पानी टपक रहा ,

आसमान की चादर में 

 हर सुराख़ भरवाना है !


सूख गये पोखर-सरवर  

 दिल धरती का अब भी नम, 

उसके आँचल से लग फिर 

जग की प्यास बुझाना है !


दर्द छुपा सुख  के पीछे  

 संग फूल के ज्यों कंटक, 

किसी तरह  हर बंदे को 

 माया से भरमाना है !


ऊपर ही सोना भीतर 

पीतल, पर उलटा भी है 

गहराई में  सागर के  

सच्चा मोती पाना है !


रविवार, अप्रैल 16

पलकों में है बंद ख़्वाब इक


पलकों में है बंद ख़्वाब इक 


झर-झर झरता बादल नभ से 

सम्मुख दरिया भी बहता है,

सब कुछ पाकर भी इस दिल का 

प्याला ख़ाली ही रहता है !


जाने किसको ढूँढ रही हैं 

 दिवस-रात्रि स्वप्निल दो आँखें  

जाने कैसे बिगड़ी जातीं  

 बनते-बनते सारी बातें ! 


हर सुख पाया है इस जग का

फिर भी इक कंटक  चुभता है, 

पलकों में है बंद ख़्वाब इक 

अक्सर ही आकर तकता है ! 


पूर्ण नहीं होती यह कैसी 

प्यास जगी है अंतर्मन में, 

जीवन सूना-सूना लगता 

थिरता कब  आयी जीवन में !


कसक न दिल की दूर हुई है 

 कैसे होगी यह भान नहीं, 

सुख-सुविधा के अंबार लगे  

ख़ुद का ही नर को ज्ञान नहीं ! 


मंगलवार, मार्च 7

बादलों के पार


बादलों के पार
उठे धरा से छूने अम्बर
मेघपुंज के पार आ गए
छूटी पीछे दो की दुनिया
इक का ही आधार पा गए I

दूर कहीं है गंध धरा की
स्वर्णिम क्षण यह दृश्य अनोखा
ढका गया बादल से हर कण
दिखे कहीं न कोई झरोखा I

निर्मल नीले नभ की छाया
श्वेत मेघ तिरते झलकाते
मानो बिखरी शुभ्रा कपास 
या उड़तीं बगुलों की पातें I

हिमाच्छादित पर्वत माला
ज्यों मीलों दूर चली जाती
श्वेत बादलों की यह शैया
परीलोक की याद दिलाती I

रविवार, नवंबर 13

जो जीवन हँसता था जग में

जो जीवन हँसता था जग में 

कल डोल रहा था खुशियों में 

अब गम की चादर ओढ़ी है,   

हर सुख के पीछे दुःख आता 

यह खूब बनायी जोड़ी है !


जब बादल से नभ ढक जाए 

चन्दा सूरज भी घबराए, 

फिर खिले चांदनी धूप उगे 

तारामंडल भी मुस्काये !


जब जन्मा ढोल बजे घर में 

फिर मातम इक दिन छाएगा, 

जो जीवन हँसता था जग में 

खामोश कहीं खो जायेगा !


जो दौड़ा फिरता था गतिमय 

अब बेबस शैया पर लेटा, 

यहाँ मौसम नित  बदलते हैं 

परिवर्तन ही सच जीवन का !


बस  वही  न बदले कभी यहाँ 

देखा करता है जो जग को, 

शून्य, पूर्ण, मौन, आनन्दमय

मन के भी पार एकरस वो !


शुक्रवार, अप्रैल 15

निरभ्र गगन खुलता जाता

निरभ्र गगन खुलता जाता 

नील वितान धरा को थामे 

मन मेघ देख क्यों कँप जाता, 

पल भर में छँट जाते बादल 

नीरव अंबर खुलता जाता !

 

काले धूसर घनघोर मेघ 

कहाँ कभी ढक पाये नभ को 

बना वही है आश्रय स्थल फिर

 अकुलाहट क्यों हो अंतर को !

 

ज़रा खोल दें खिड़की मन की 

या गवाक्ष की ओट गिरा दें,

खुला-खुला सा नभ दिख जाए 

नज़र उठा भर उधर देख लें !

 

चाहे मीलों दौड़ लगाए 

या पंछी सा तिरता जाए, 

वही विस्तीर्ण अनंत प्रदेश 

हर सीमा से मुक्त कराए !


बुधवार, अप्रैल 13

वह

वह

 

कभी भोर होकर भी 

भोर नहीं होती 

घटटोप बादलों से 

आवृत हो जाता है नील  नभ 

अंशुमान मेघों की अनेक परतों के पीछे 

पंछी देर तक दुबके रहते हैं कोटरों में 

रात भर बरस कर भी 

बदलियाँ थकी नहीं होतीं 

टप टप झरती हैं 

पेड़ों की डालियों से बूँदे रह रह कर 

मंदिरों के द्वार खुल जाते हैं 

पर भक्त गण नहीं आते 

ऐसे में यदि कोई 

परमात्मा को घर बैठे आवाज़ लगाए 

तो क्या उससे दूर रह पाएगा वह 

पल भर में पानी से भरे सारे रास्तों को पार करके 

प्रकट हो जाएगा न 

सम्मुख उसके  

पूछा मुन्नी ने दादी से !


शनिवार, फ़रवरी 12

तुम हो

तुम हो 


तुम हो, तभी तो 

फूल खिलते हैं 

मौसम बहारों के  

लौट आते 

तितलियाँ मंडराती हैं और 

कूजती है कोकिल अमराई में 

सुना ना तुमने !

तुम हो, तभी तो 

दूर कोई सितारा 

टूट कर चमक दिखाता है 

पपीहा राग सुनाता 

प्रपात खिलखिलाता है 

एक नज़र भर देखा 

बादल बरस गया झूम कर 

एक आवाज़ भर दी थी 

सागर में लहरें  उठीं  

लिया चाँदनी को मुट्ठी में भर 

तुम हो, तभी तो 

जीवन में नया अर्थ खिलता  है 

तुम्हारे संग साथ से 

यह जग 

हर रोज़ नया होकर मिलता है  !


शुक्रवार, जनवरी 28

एक सूर्य उग आए ऐसा

एक सूर्य उग आए ऐसा


​​
दीप जले अंतर में ऐसा 

ज्योति कभी ना ढके तमस से, 

जगमग कर दे राहें सारी 

कोई विकार छिपे न मन से !


अंत:लोक में जाग उठें हम 

एक सूर्य उग आए ऐसा, 

युगों युगों की नींदें टूटें 

स्वप्न कभी मत घेरे मन को !


अब भी बादल छाते नभ पर 

तूफां भीषण तेज हवाएँ, 

किंतु अमर यह ज्योति अनुपम 

बाल न बाँका ज़रा कर पाएँ !


जो भी जगता इस प्रकाश में 

उसे न अंधकार का भय है, 

मिथ्या जैसे स्वप्न लोक है 

वैसे ही यह जगत लुप्त है  !


सोमवार, अप्रैल 5

वर्षा थमी

वर्षा थमी 

पंछी छोड़ नीड़ निज चहकें 
मेह थमा निकले सब घर से, 
सूर्य छिपा जो देख घटाएँ 
चमक रहा पुनः चमचम नभ में !

जगह जगह छोटे चहबच्चे
 फुद्कें पंछी छपकें बच्चे, 
गहराई हरीतिमा भू की
 शीतलतर पवन के झोंके !

पल भर पहले जो था काला 
नभ कैसा नीला हो आया, 
धुला-धुला सब स्वच्छ नहा कर  
कुदरत का मेला हो आया !

 इंद्रधनुष सतरंगी नभ में
 सुंदरता अपूर्व बिखराता,
 दो तत्वों का मेल गगन में 
स्वप्निल इक रचना रच जाता !

जहाँ-जहाँ अटकीं जल बूँदें 
 रवि कर से टकराकर चमकें, 
जैसे नभ में टिमटिम तारे 
पत्तों पर जलकण यूँ दमकें !

 कहीं-कहीं कुछ धूसर बादल 
छितरे नभ में होकर निर्बल,
 आयी थी जो सेना डट के
 रिक्त हो गयी बरस बरस के ! 

पूर्ण तामझाम संग आयी 
काले मेघा गज विशाल हो, 
हो गर्जन तर्जन रणभेरी 
चमके विद्युत तिलक भाल ज्यों !

मंगलवार, अक्टूबर 6

मन और वह

मन और वह 

मन  हिरण सा दौड़ता है 

धरती से आकाश तक 

अनभिज्ञ.... कि कोई है ज्योति शिखा सा 

भीतर जलता है, अकंप 

जो उसमें प्राण फूँकता है 

मन बादलों की तरह डोलता है 

चाहता है दूर अंतरिक्ष के पार जाना 

अनभिज्ञ.... कि कोई है पूनो के चाँद सा 

जो उससे ही आवृत रहता है 

देता है संबल

युगों से प्रतीक्षारत  

मौन ! दौड़ कभी तो अर्थहीन होगी 

डोलना कभी तो थमेगा  

गति के पीछे अगति में 

रूप के पीछे अरूप में 

शब्द के पीछे निशब्द में 

सम्भवतः सुख के पीछे आनंद में !

 

सोमवार, सितंबर 21

नीला अम्बर सदा वहीं था

 नीला अम्बर सदा वहीं था

संशय, भ्रम, भय, दुःख के बादल  

जग को हमने जैसा देखा, 

छिपा लिया था दृष्टि पथ ही 

मन पर पड़ी हुई थी रेखा !


कैसे दिखे विमल नभ अम्बर

आशाओं की ओट पड़ी हो,

कैसे कल-कल निर्मल सरिता 

भेदभाव की भीत गड़ी हो !


दुराग्रहों के मोटे पर्दे 

नयनों को करते हों धूमिल,

नीला अम्बर सदा वहीं था 

जहां छँटे ये काले बादल !


स्रोत खुले जो बंद पड़े थे 

जहाँ गिरी मन से हर बाधा,

बहते हुए प्रीत के दरिया

श्यामल जीवन में थी राधा !


अपनेपन की फसल उगी थी   

दृष्टि मिली यह राज बहा झर, 

जाना, आकर जाने कितने 

बन्द पड़े हैं मन के भीतर !


गुरुवार, अगस्त 27

आसमान निर्मल अविकारी

 आसमान निर्मल अविकारी 

 

अंबर, अधर, व्योम,  नीलाम्बर 

गगन, अनंत, अविचल, अकम्पन,

अरबों, खरबों नक्षत्रों  को

निज अवकाश किया है धारण ! 

 

शून्यवत न होता परिभाषित 

धरती को द्यौ व्याप रहा है, 

नित प्रकाश रंगों से सजता  

निज का  कोई रंग नहीं है !

 

एक विशाल चँदोवे जैसा 

तारों से मंडित यह अनुपम, 

एक तत्व है सूक्ष्म अनश्वर 

रचता है जिसे स्वयं ईश्वर !

 

सभी नाद अगास  में होते 

वायु संग आकाश मिले जब, 

भीतर तन के बाहर मन के 

ठहरे इसमें दोनों तन-मन !

 

कभी घने बादल ढक लेते 

जैसे मन को ढके कुहासा, 

आसमान निर्मल अविकारी 

 चमके तड़ित या हो गर्जना !

 


रविवार, अगस्त 23

महाभूत जो महादेव का

महाभूत जो महादेव का

 

कल-कल, छल-छल, सलिला का जल 

अविरल निर्मल  बहता रहता, 

जल जीवन को धारण करता 

भू को सिंचित करता बढ़ता !

 

दिनकर रश्मियों संग वाष्पित 

चंचल अनिल उड़ा ले जाता, 

जल धारा बना पुनः धरा पर 

नदियां नाले पोखर भरता !

 

बादल बन अम्बर में रहता 

पावन शीतल नीर बरसता,

पशु, पादप, कीट, विटज, मानव 

सर्व प्राण की तृषा बुझाता !

 

महाभूत जो महादेव का 

जल तत्व को सभी जन चाहें,

नहीं हो दूषित, व्यर्थ बहे न

जल के देव वरुण को ध्याएँ !

 

सरस बनाता, स्वाद जगाता 

अंगों को रखता कोमलतम, 

जल ना हो तो जल जाए जग  

जल है सत्यम शिवम सुंदरम !