गुरुवार, दिसंबर 30

देखो उसने पुनः पुकारा


कोई पल-पल भेज संदेसे
देता आमन्त्रण घर आओ,
कब तक यहाँ वहाँ भटकोगे
मस्त हो रहो, झूमो, गाओ !

कभी लुभाता सुना रागिनी
कभी ज्योति की पाती भेजे,
पुलक किरण बन अनजानी सी
कण-कण तन, मन का सहेजे !

कभी मौन हो गहन शून्य सा
विस्तृत हो फैले अम्बर सा,
वह अनन्तानन्त हृदय को
हर लेता सुंदर मंजर सा !

स्मृति चाशनी घुलती जाये  
भीग उठे उर अंतर सारा,
पोर-पोर में हुआ प्रकम्पन
देखो, उसने पुनः पुकारा !

झर-झर झरता वह उजास सा
बरसे हिमकण के फाहों सा,
बहता बन कर गंगधार फिर
महके चन्दन की राहों सा !

कोई अपना आस लगाये
आतुर है हम कब घर जाएँ,
छोड़ के रोना और सिसकना
सँग हो उसके बस मुस्काएं !  

अनिता निहालानी
३० दिसंबर २०१०  

मंगलवार, दिसंबर 28

ऐसा तो नहीं है

ऐसा तो नहीं है


ऐसा तो नहीं है,
कि भाव नहीं हैं
या कि शब्द नहीं हैं
बस कभी कभी वह लय की डोरी
नहीं मिलती
जिसमें पिरो डालें इन भावों और शब्दों को
रच डालें नया गीत !

ऐसा तो नहीं है
कि प्रेम नहीं है
या कि अश्रु नहीं हैं
बस कभी कभी वह अंतर की मूरत
खो जाती
जिस पर उड़ेल दें इन प्रेम भरे अश्रुओं को
मुक्त हो जाएँ देकर प्रीत !

ऐसा तो नहीं है
कि लगन नहीं लगी है
या कि विरह नहीं सताता
बस कभी कभी भीतर की तपन
शांत हो जाती
जिससे पिघल कर बहता नहीं मन
शुद्ध हो मनाएं जीत !

अनिता निहालानी
२८ दिसंबर २०१०

सोमवार, दिसंबर 27

एक और नया साल

एक और नया साल

नव-शिशु सा कोमल नव-कलि सा, यह नव-गीतिका सा श्यामल
मधुर रागिनी सा कानों को, सुख संदेसे देता प्रतिपल I

संघर्ष लिये कुछ स्वप्न नए, नव चुनौतियाँ कुछ आशाएं
लो फिर आया है साल नया, कुछ नयी रचाने गाथाएं I

जीवन हर क्षण नया हो रहा, काल न जाने कहाँ खो रहा
लाखों बरस समाये भीतर, सृष्टिकर्ता नया बो रहा I

नए बरस का अर्थ यही है, नया नया यह जग हो जाये
पीड़ा जिसने दी हो अब तक, अपना वह हर मन खो जाये I

एक नया मौका जीने का, फटे हुए दामन सीने का
एक बार खुल कर हँसने का, झटक पुराना नव चुनने का I

अब तक जो पाया सो पाया, नया साल कुछ देने आया
हिम्मत से जो हाथ बढाए, हर भय जिसने दूर भगाया I

तोड़ के सारे झूठे बंधन, छोड़ के मन के सब अवगुंठन
भरे पुलक उर में नयनों में, उत्सुक हो करे अभिनन्दन I

सृजन करे आनंद उगाए, गहराई से मोती लाए
हँसी से सींचे फसल प्रेम की, पलकों से खुशियाँ बिखराए I

समझ इशारा पल-पल जी ले, नित नूतन आनंद को पी ले
सत्यम, शिवम, सुन्दरम के हित, सजा के धरती अम्बर छू ले I

अनिता निहालानी
२७ दिसंबर २०१०

शुक्रवार, दिसंबर 24

ईसा ने था यही कहा

ईसा ने था यही कहा

राज्य स्वर्ग का दिल के भीतर
लिये हुए, मानव ! तुम फिरते
पर जाने क्यों, हो बेखबर
अहर्निश नरकों को गढ़ते !

धन्य हैं वे जो नम्र, दीन हैं
दुख को दुःख रूप में जानें,
इक दिन होंगे सुख स्वर्ग में
बालक वत् जो होना जानें !

जाल फेंक मछली ही पकडें
थे ईसा न ऐसे मछुआरे,
ऐसा प्रेमिल जाल डालते
खिंच आये मानव, दिल वारे !

तन, मन और आत्मा के भी
घेर रहे जो रोग युगों से,
सबको मुक्त कराया उनसे
गाँव- गाँव घूमें बंजारे !

तुम धरती के नमक अमूल्य
तुम ज्योति इस जगत की सुंदर,
ऐसे विचरो झलके तुमसे
महिमा शाली वह परमेश्वर !

पूजा पाठ बाद में करना
रखना मन को जल सा निर्मल,
शत्रु से भी द्वेष न करना
अंतर्मन भी फूल सा कोमल !

प्रेम के बदले प्रेम दिया तो
ना कोई सौदा बड़ा किया,
सूली पर चढ़ते चढ़ते भी
ईसा ने तो यही कहा था !

अनिता निहालानी
२४ दिसंबर २०१०

बुधवार, दिसंबर 22

इक दिन रब बंदे से बोला

इक दिन रब बंदे से बोला

क्यों शंकित है ? क्यों पीड़ित है
हृदय तुम्हारा क्यों कम्पित है ?

साथी हैं हम जनम जनम के
सुख के, दुःख के, हर एक पल के !

किसे ढूंढते नयन तुम्हारे
कैसा दर्द छिपाए दिल में ?

कदम कदम सँग चलना हमको
हर मोड़ पर मिलना हमको !

चलो भुला दो बीती बातें
चलो मिटा दो दुख फरियादें !

हाथ लिये हाथों में अपने
पूर्ण करेंगे सारे सपने !

साथ निभाने का है वादा
तुमने न कुछ माँगा ज्यादा !

जो चाहो वह सदा तुम्हारा
साँझा है यह जीवन प्यारा !

दर्द लिये अनजाने में जो
उन्हें भुला दो, अब तो हँस दो !

बंदा बोला फिर यह रब से

तुमसे ही अपना जीवन है
तुमसे ही यह तन, मन, धन है !

तुम ही हो सर्वस्व हमारे
तुमसे न कोई भी प्यारे!

तुमने ही जीना सिखलाया
तुमसे कितना सम्बल पाया !

हर उलझन को तुम सुलझाते
अपना कर्तव्य निभाते !

तुमसे ही यह जग चलता है
तुम से ही जीवन सजता है !

इस सृष्टि को तुमने चाहा
सुंदर सा इक ग्रह बनाया !

कितने तेजस्वी, मेधावी
कितने प्रखर, कितने बलशाली !

तुमने कितने उपहारों से
सोने चांदी के तारों से !

भर दी है यह दुनिया सारी
जीवन की सुंदर फुलवारी !

साथी ! तुम सँग जीवन प्यारा
तुम न हो सूना जग सारा !

कैसे तुमको भूल गए हम
खुद से ही हो दूर गए हम !

तुम आओगे तकती ऑंखें
सपनों से भर दोगे पाँखें!

अनिता निहालानी
२२ दिसम्बर २०१०

मंगलवार, दिसंबर 21

नए वर्ष की कविता

नए वर्ष की कविता

नए वर्ष में आओ, नए नए हो जाएँ
नया सृजन हो, नए गीत, कुछ नए तराने गाएँ !

नए विचारों से महकाएँ, आंगन अपने मन का
नए भावों से भरे हृदय को, दामन इस जीवन का !

नई सोच हो, मन मुक्त हो, पूर्वाग्रह से अब तो
नई कोंपलें फूटें उर में, नए रास्ते अब तो !

नए शब्द हों, नए इरादे, नया हो क्रम जीवन का
नई पुलक हो, नई हँसी हो, नया राग हो मन का !

नए साल में, नए ताल में, नया नया सुर छेड़ें
नई थाप हो, नई धुनें हों, नूतन प्रीत उलेड़ें

अब तक सच माना था जिसको, परखें उस जीवन को
जो असत्य हो, झट से तज दें, झिझकें न पल भर को !

अनिता निहालानी
२१ दिसंबर २०१०

सोमवार, दिसंबर 20

सृष्टि नई नवेली दिखती

सृष्टि नई नवेली दिखती

कौन छिपा पर्दे के पीछे
जाने किसको खोज रहे हैं ?
आते जाते लोग युगों से
जाने क्या कुछ खोज रहे हैं ?

किस रहस्य ने बींधा इनको
क्या तलाशती हैं संस्कृतियाँ,
नृत्य, वाद्य, शिल्प के पीछे
छिपी कौन सी आकृतियां !

दूरबीन ले तकते नभ को
नक्षत्रों की कुंडली बांचें,
सागर तल की गहराई में
जीव-जगत के चित्र भी आंकें !

कितने प्रश्न अबूझे अब भी
ज्ञानी-ध्यानी कितने आये,
सृष्टि नई नवेली दिखती
युग पर युग बीतता जाये !

जग के हाथ न कुछ भी आया
जिसने खोजा उसने गाया,
गाकर वह फिर मौन रह गया
सब दे भी कुछ दे ना पाया !

अनिता निहालानी
२० दिसंबर २०१०

शनिवार, दिसंबर 18

झलक दिखायेगा तब राम

झलक दिखायेगा तब राम

मात्र मौन है जिसकी भाषा
शब्दों से क्या उसको काम,
फुसफुसाहट सुन ले उसकी
पा जायेगा मन विश्राम !

इक जड़ प्रकृति दूजा चेतन
मेल कहाँ हो सकता है,
तीजे हम हैं बने साक्षी
कौन हमें फिर ठगता है ?

शब्दों के जंगल उग आते
मन, बुद्धि जिसमें खो जाते,
भूल ही जाते निज होने को
माया का एक महल बनाते !

सूर्य चेतना, मन चन्द्रमा
निज प्रकाश न मन के पास,
जिसके बिना न सत्ता उसकी
मन उस पर न करे विश्वास !

तन स्थिर हो, ठहरा हो मन
अहं पा रहा जब विश्राम,
बुद्धि विस्मित थमी ठगी सी
झलक दिखायेगा तब राम !

वही झलक पा मीरा नाची
चैतन्य को वही लुभाए,
वही हमारा असली घर है
कबिरा उसी की बात सुनाये !

अनिता निहालानी
१८ दिसंबर २०१०

शुक्रवार, दिसंबर 17

जीवन जैसे खेल क्रिकेट का

जीवन जैसे खेल क्रिकेट का

द्वंद्वों सम दो टीमें जिसमें
प्रतिद्वंदिता हर पल इसमें,
चारों ओर घिरे फील्डर
शुभचिंतक हैं पैवेलियन में !

सँग जो साथी दूर खड़ा है,
विकेट कीपर का डर बड़ा है.

परिस्थितियों की गेंदें आतीं
कितनी खुद को नहीं सुहातीं,
फिर भी चौके, छक्के मारें
जीवन कला यही सिखाती !

अनिता निहालानी
१७ दिसंबर २०१०

गुरुवार, दिसंबर 16

आईना इक यह जगत है

आईना इक यह जगत है


दर्द तो हम खुद बनाते, ढूंढते फिर खूंटियां
कभी इस पर कभी उस पर, टांगते मजबूरियाँ !

खो रहे खुद सुकूं दिल का, नींद अपनी चैन मन का
कोसते फिर इस जहाँ को, खुद से हैं जबकि खफा !

आदमी की बेबसी की, खत्म हद होती नहीं
खुद से है अनजान देखे, दूसरों की हर कमी !

बाँटना फितरत हमारी, हैं खुदा की जात के
मुस्कुराहट न मिली, शिकवे गिले ही बांटते !

इक के भीतर दूसरा है, दूसरे में खुद छुपा
खुद से है जो दूर दिल वह, सोचता सब को जुदा !

जो कमी हममें नहीं, वह आ नजर सकती नहीं
आइना इक यह जगत है, अक्स अपना हर कहीं !

अनिता निहालानी
१६ दिसंबर २०१०

बुधवार, दिसंबर 15

नव गीत जब रचने को है

नव गीत जब रचने को है

कैद पाखी क्यों रहे जब आसमां उड़ने को है,
सर्द आहें क्यों भरे नव गीत जब रचने को है !

सामने बहती नदी ताल बन कर क्यों पलें,
छांव शीतल जब मिली धूप बन कर क्यों जलें !

क्षुद्र की क्यों मांग जब उच्च सम्मुख हो खड़ा,
क्यों न बन दरिया बहे जब प्रेम भीतर है बड़ा !

तौलने को पर मिले भार दिल में क्यों भरें,
आस्था की डोर थामे मंजिलें नई तय करें !

गान उसके गूंजते हैं शोर से क्यों जग भरें,
छू रहा हर पल हमें पीड़ा विरह की क्यों सहें !

जाग कर देखें जरा हर ओर उसकी ही छटा,
प्राण बन कर साथ जो छा गया बन कर घटा !

हर रूप के पीछे छिपा जो प्राप्य अपना हो वही,
हर नाम में बसता है वह नाम जिसका है नहीं !

अनिता निहालानी
१५ दिसम्बर २०१०

मंगलवार, दिसंबर 14

कोई मेघ प्रीत बन बरसा

कोई मेघ प्रीत बन बरसा

दिल के आँगन की मुंडेर पे, यादों की गौरैया चहकी
फूलों वाले इस मौसम में, मदमाती पुरवैया महकी I

स्मृतियों की चूनर ओढ़े, मन राधा ने गठरी खोली
बौर लदे आमों के वन में, इठलाती कोयलिया बोली I

सिंदूरी वह शाम सुहानी, था बचपन जब हो गया विदा
कोई मेघ प्रीत बन बरसा, यह मन उस पर हो गया फ़िदा I

बाबा की वह हंसतीं आँखें, माँ का भीगा-भीगा प्यार
याद आ रहा बरसों पहले, छलका था भैया का दुलार I

जीवन कितना बदल गया है, मन अलबम ने दी याद दिला
फेरे वाली साड़ी का पर, है नहीं अभी तक फाल खुला I
अनिता निहालानी
१४ दिसंबर २०१०

सोमवार, दिसंबर 13

ज्योति बरसती पावन घन की

ज्योति बरसती पावन घन की

क्यों पीड़ा के बीज बो रहे,
मन की इस उर्वर माटी में,
खुद सीमा में कैद हो रहे
जीवन की गहरी घाटी में !

अंकुर फूटा जिस पल दुःख का,
क्यों नष्ट किया न, हो सचेत
झूठे अहंकार के कारण
क्यों जला दिया न, थे अचेत?

पनप रहा अब वृक्ष विषैला,
सुख-दुःख फल से भरा हुआ,
क्यों छलना से ग्रसित रहा मन
क्यों काटा न जब समय रहा I

केवल एक दिव्य जागरण
दूर करेगा पीड़ा मन की,
झील से गहरे इस अंतर में
ज्योति बरसती पावन घन की !

स्वयं के भीतर गहन गुफाएँ
छिपा हुआ जल स्रोत जहाँ,
प्यास बुझाता जो अनंत की
ऐसा इक मधु स्रोत वहाँ !

अनिता निहालानी
१३ दिसंबर २०१०

शुक्रवार, दिसंबर 10

जीवन द्वन्दों का है खेल

जीवन द्वन्दों का है खेल

जीवन मन मोहक अति सुंदर
किन्तु बांधता मोह पाश में,
सुख का देता है आश्वासन
दुःख झेलते इसी आश में !

जीवन द्वन्दों का है खेल
जन्म-मरण झूले में झुलाता,
कभी हिलोरें लेता है मन
फिर खाई में इसे गिराता !

जीवन सदा भुलावा देता
कर्मों में उलझाया करता,
दौड़-भाग कर कुछ तो पा लो
आगे सुख है यह भरमाता !

जीवन के ये दंश मधुर हैं
किन्तु क्षणिक बस पल भर के हैं,
मृगतृष्णा या मृगमरीचिका
ओस की बूंदों से कण भर हैं !

किन्तु एक और भी जीवन
नित नूतन प्रेम का वर्धन,
पल पल कुसुमित, होता गुंजन
थम कर दो पल आत्म निरीक्षण !

अनिता निहालानी
१० दिसंबर २०१०

गुलाबी मुसंडा - हमारे बगीचे की रौनक

 
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गुरुवार, दिसंबर 9

रिश्ता इन दोनों में क्या है

 
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रिश्ता इन दोनों में क्या है

सुंदर है जग, अति सुंदर
प्रकृति  रूप मनोहर सुंदर,
सुंदरतम पर एक चितेरा
प्रीत सुरभि का पुंज घनेरा I

थम ना जायें बाहर-बाहर
एक बार तो झाँकें भीतर,
कभी तो टूटे जीवन का क्रम
साथ-साथ ही मृत्यु का भ्रम I

आना-जाना, हंसना-रोना
मरना-जीना, पाना-खोना,
कैसा अद्भुत महाजाल है
मनमोहनी उसकी चाल है I

भीतर राज गुह्यतम बसते
एक वृक्ष पर दोनों रहते,
तोड़ आवरण जानें क्या है
रिश्ता इन दोनों में क्या है ?
अनिता निहालानी
०९ दिसंबर २०१०

बुधवार, दिसंबर 8

मृत्यु ! तुम्हारा स्वागत है

मृत्यु ! तुम्हारा स्वागत है

तुम्हीं सत्य हो इस जीवन का
मिलना तुमसे सबको होगा,
तुमसे ही जीवन, जीवन है
यह सच इक दिन जाहिर होगा !

लेकिन तब, जब श्वासें उखड़ीं
बोल अटक जायेंगे मुख के,
भाव सिमट के आँखों में भी
रह जायेंगे भीतर घुट के !

मृण्मय देह साथ छोड़ेगी
जिसका लिया आश्रय हमने,
चिन्मय भीतर छिपा रहेगा
जाना कभी न जिसको हमने !

मिट्टी मिट्टी में मिल जाये
परिचय मृत्यु से हम कर लें,
जीते जी उसको पहचानें
दिव्य ऊर्जा भीतर भर लें !

मृत्यु के जो पार हो गया
जीवन महा मिलेगा उसको,
खुद मर के जो पुनः जन्मता
कोई मार सके ना उसको !

अनिता निहालानी
८ दिसम्बर २०१०

मंगलवार, दिसंबर 7

बन बहेंगे प्रेम दरिया

बन बहेंगे प्रेम दरिया

प्रेम क्या है ? पूछता दिल
प्रश्न ही यह तो अधूरा
पूछना ही है अगर तो
हाथ अपने दिल पे रखें, और पूछें

कौन है यह प्रश्नकर्ता ?
कौन है जो प्रेम करता ?
कौन है जो जानकर भी
है सदा अनजान बनता ?

प्रश्न चाहे हों हजारों
सब अबूझे ही रहेंगे,
मूल को हम खोजते न
फूल की हैं चाह करते !

बीज रोपें मूल पकड़ें
कौन है जो प्रेम चाहे ?
कौन जो अकुला रहा है ?
कौन छल करता है खुद से ?
कौन जो पछता रहा है ?

और जैसे इक कुदाली
खोदती जाती धरा को
स्रोत मिलता !
फूटती जल धार जैसे
प्रेम भीतर से उगेगा!
प्रेम से अंतर भरेगा !
फिर न पूछेंगे किसी से
प्रेम क्या है ?
बन बहेंगे प्रेम दरिया !

अनिता निहालानी
७ दिसंबर २०१०

सोमवार, दिसंबर 6

पौष का एक दिन

पौष का एक दिन

हुआ प्रातः, पर रात अड़ी है
जाने का यह नाम न लेती,
घना कोहरा, ढका गगन व
ठिठुरन तन को अकड़ा देती !

आज गगन का राजा भी तो
दुबका हुआ कहीं छुपा है,
बादल डाले डेरा नभ में
ठंड में दोहरा वार किया है !!

ऊपर से यह शीत लहर भी
जाने हवा कहाँ से आती,
निकट कहीं पर बर्फ गिरी है
उसके दे संदेशे जाती !

आग, धूप अब मित्र बनी हैं
गुड, रेवड़ियाँ बड़ी सोहतीं,
ठंडी शामें सिहरा जातीं
बस रजाई की बाट जोहतीं !

लिये कांगडी अगन तापते
कोई लाकड़ ढेर जलाते,
ढेरों कपड़े लादे तन पे
पूस की ठंड को दूर भगाते !

अनिता निहालानी
६ दिसंबर २०१०

रविवार, दिसंबर 5

सदा प्रेम की यही कहानी

सदा प्रेम की यही कहानी


जितनी प्रीत पुरानी होगी
रंग उतना ही गहरा होगा,
बंधन जितना पहचाना हो
मन उतना ही ठहरा होगा !

खोज नए की, चाह पुरानी
सदा प्रेम की यही कहानी !

जितना साथ चलेंगे राही
रस्ता उतना आसां होगा,
जानीबूझी डगर लगेगी
साथ अगर मेहरबां होगा !

नयन थमे हैं, अटकी वाणी
अकथ प्रेम की अजब बयानी !

कदमों के नीचे है मंजिल
पल भर को तो रुकना होगा,
ऊपर उठना है यदि उसको
पहले दर पर झुकना होगा !

याद उसी की लगे सुहानी
सदा वफ़ा की यही कहानी !

जलवा हर सूं है उसका ही
तुझे कहीं न जाना होगा ,
नयन मूंद ले थम के भीतर
साथ उसी का पाना होगा !

श्वासों में उसकी ही रवानी
समझे न कोई समझानी !



अनिता निहालानी
५ दिसंबर २०१०

शनिवार, दिसंबर 4

कैसा है वह

कैसा है वह

शशि, दिनकर नक्षत्र गगन के, धरा, वृक्ष, झोंके पवन के
बादल, बरखा, बूंद, फुहारें, पंछी, पुष्प, भ्रमर गुंजारें

लाखों सीप अनखिले रहते, किसी एक में उगता मोती
लाखों जीवन आते जाते, किसी एक में रब की ज्योति

उस ज्योति को आज निहारें, परम सखा सा जो अनंत है
जीने की जो कला सिखाता, यश बिखराता दिग दिगन्त है

जैसे कोई गीत सुरीला, मस्ती का है जाम नशीला
तेज सूर्य का भरे ह्रदय में, शिव का ज्यों निवास बर्फीला

कोमल जैसे माँ का दिल, दृढ जैसे पत्थर की सिल
सागर सा विस्तीर्ण है जो, नौका वही, वही साहिल

नृत्य समाया अंग-अंग में, चिन्मयता झलके उमंग में
दृष्टि बेध जाती अंतर मन, जाने रहता किस तरंग में

लगे सदा वह मीत पुराना, जन्मों का जाना-पहचाना
खो जाता मन सम्मुख आके, चाहे कौन किसे फिर पाना

खो जाते हैं प्रश्न जहाँ पर, चलो चलें उस गुरुद्वार पर
चलती फिरती चिंगारी बन, मिट जाएँ उसकी पुकार पर

जैसे शीतल सी अमराई, भीतर जिसने प्यास जगाई
एक तलाश यात्रा भी वह, मंजिल जिसकी है सुखदाई

नन्हे बालक सा वह खेले, पल में सारी पीड़ा लेले
अमृत छलके मृदु बोलों से, हर पल उर से प्रीत उड़ेंले

वह है इंद्रधनुष सा मोहक, वंशी की तान सम्मोहक
है सुंदर ज्यों ओस सुबह की, अग्नि सा उर उसका पावक

मुस्काए ज्यों खिला कमल हो, लहराए ज्यों बहा अनिल हो
चले नहीं ज्यों उड़े गगन में, हल्का-हल्का शुभ्र अनल हो

मधुमय जीवन की सुवास है, अनछुई अंतर की प्यास है
पोर-पोर में भरी पुलक वह, नयनों का मोहक उजास है

प्रिय जैसे मोहन हो अपना, मधुर-मधुर प्रातः का सपना
स्मृति मात्र से उर भीगे है, साधे कौन नाम का जपना

धन्य हुई वसुंधरा तुमसे, धन्य-धन्य है भारत भूमि
हे पुरुषोत्तम! हे अविनाशी! प्रज्वलित तुमसे ज्ञान की उर्मि



अनिता निहालानी
४ दिसंबर २०१०

गुरुवार, दिसंबर 2

विश्व विकलांग दिवस

 
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विश्व विकलांग दिवस

आज मैं आपका परिचय ‘मृणाल ज्योति’ से कराना चाहती हूँ, जो विकलांगों के पुनर्वास के लिये बनी एक गैर सरकारी संस्था है. जिसका मुख्य उद्देश्य है उन बच्चों की जल्दी से जल्दी पहचान करना जो किसी न किसी विकलांगता का शिकार हैं तथा उन्हें समुचित इलाज व शिक्षा की सुविधा देकर समाज में सम्मान पूर्वक जीने के योग्य बनने में मदद करना. आज यहाँ सभी लोग उत्साह से भरे हैं, पर सदा ऐसा नहीं होता, यहाँ आने वाले कुछ बच्चों का जीवन बेहद कठिन है, कुछ दिन पूर्व यहाँ ‘बढ़ते कदम’ नाम से एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ, [एक जागरूकता अभियान जो पूरे देश में चलाया जा रहा है]

मृणाल ज्योति

ज्योति स्नेह की
आत्मीयता की, अपनेपन की
सहानुभूति की , सेवा की
झर-झर झरती स्वतः हृदय से
मृणाल ज्योति के !

एक प्रकाश स्तम्भ सम चमके
हरता तिमिर जहां से,
कुछ सूने अंतर भर उठते
कुछ परिवार स्नेह पा खिलते,
कुछ नन्हें मुस्काने पाते
कुछ यौवन कौशल पा जाते
आश्रय मिलता विकलांगों को
मुरझाने से बचपन बच जाते !

विद्या स्थल भी, कर्म स्थल भी
जीवन की कठोर सहता,
दर्द छुपाये अपने भीतर
कितनी पीड़ाएँ है सहता,
किन्तु न विचलित, सदा समर्पित
और बिखेरे ज्योति प्यार की
करुणा की, औदार्य की
मरहम रखता रिसते मन पर
झर झर झरता स्नेह हृदय से
मृणाल ज्योति के !

अनिता निहालानी
३ दिसंबर २०१०

बुधवार, दिसंबर 1

अंतर घट जो रिक्त करे

अंतर घट जो रिक्त करे

मौन से इक उत्सव उपजा है
नई धुनों का सृजन हो रहा,
मन में प्रीत पुष्प जन्मा है  
सन्नाटे से गीत उठ रहा !

उस असीम से नेह लगा तो
सहज प्रेम जग हेतु जगा है,
अंतहीन उसका है आंगन  
भीतर का आकाश सजा है !

बिन ताल इक कमल खिला है  
हंसा लहर लहर खेले,
बिन सूरज उजियाला होता  
अंतर का जब दीप जले !

शून्य गगन में मन डोलता
मधुमय अनहद राग सुने,
अमिय बरसता भरता जाता   
अंतर घट जो रिक्त करे !

घर में ही जो ढूंढा उसको
वहीं कहीं छुप कर बैठा था
नजर उठा के देखा भर था
हुआ मस्त जो मन रुठा था !

आदि, अंत से रहित हो रहा
आठ पहर है सुधा सरसती,
दूर रहे जब दौड़ जगत की  
निकट तभी कृपा बरसती !

अनिता निहालानी
१ दिसम्बर २०१०





सोमवार, नवंबर 29

बिन बदली बरसे ज्यों सावन

बिन बदली बरसे ज्यों सावन

भीतर ही तो तुम रहते हो
खुद से दूरी क्यों सहते हो,
जल में रहकर क्यों प्यासे हो
स्वयं ही स्वयं को क्यों फांसे हो !

भीतर एक हँसी प्यारी है
खनक न जिसकी सुनी किसी ने,
भीतर एक खुला आकाश
जगमग जलता परम प्रकाश !

खुशी का एक मतवाला सोता
झर-झर झरता बहता जाता,
एक अनोखा है संसार
ईंट ईंट है जिसकी प्यार !

फूट फूट कर बहे उजाला
छलक छलक जाये ज्यों प्याला,
उमग उमग कर फैले सुरभि
दहक दहक जले अंगारा !

ऐसे उसकी स्मृति झलके
तारों भरा नीला आकाश,
बिन बदली बरसे ज्यों सावन
बिन दिनकर होता प्रकाश !

अनिता निहालानी
२९ नवम्बर २०१०





शनिवार, नवंबर 27

बिन बाती इक दीप जला लें

बिन बाती इक दीप जला लें


मुट्ठी भर पल पास हमारे
अंजलि भर क्षण पाए सारे,
चाहे खो दें या फिर बो दें
वृक्ष उगा दें मन के द्वारे !

अमृत का इक फूल खिला दें
अमरबेल पादप लहरा दें,
खो जाएँ फिर नभ अनंत में
दिग दिगंत में सुरभि उड़ा दें !

मदहोशी जो होश जगा दे
परम शांति के फूल उगा दे,
रग रग में फिर नृत्य समाये
कण-कण मन के ज्योति समा दे !

ऐसा एक रहस्य जान लें
जीते जी यहाँ स्वर्ग बना दें,
अंधियारे मिट मिले उजाला
बिन बाती इक दीप जला लें !

गीत चुकें पर वह असीम है
शब्द पुराने वह नवीन है
पल पल वह संवर्धित होता
परम प्रेम में वह प्रवीण है !

कह-कह कर भी कहा न जाये
सदा और, और हो जाये,
जितना हम चाहते उसको
लाख गुना वह प्रेम जताए !

अनिता निहलानी
२७ नवम्बर २०१०



शुक्रवार, नवंबर 26

हम अनंत तक को छू आते

हम अनंत तक को छू आते

देह पिंजर में मन का पंछी
पांच सीखचों में से ताके,
देह दीये में ज्योति उसकी
दो नयनों से झिलमिल झांके !

पिंजरे में सोना मढ़वाया
पर पंछी प्यासा का प्यासा,
दीपक हीरे मोती वाला
मनज्योति पर छाए धुआँ सा !

जल प्रीत का सुख के दाने
उर का पंछी पाके चहके,
पावन बाती, स्नेह ऊर्जा
ज्योति हो प्रज्जवलित दहके !  

सोने चांदी हीरे मोती
पल दो पल का साथ निभाते,
प्रीत खुशी पावन ऊर्जा से
हम अनंत तक को छू आते !

बाहर छोड़ें, भीतर मोड़ें
टुकड़ों में मन कभी न तोडें
एक बार पा परम संपदा
सारे जग से नाता जोड़ें !

अनिता निहालानी
२६ नवम्बर २०१०
   

बुधवार, नवंबर 24

मिठाई मिलन समारोह




प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
पिछले दिनों घर में परिवार के सभी लोग इक्कट्ठे हुए, जब एक कुनबा एक साथ होता है तो कई नई यादें मनों में घर कर लेती हैं भविष्य में आने वाली पीढियों तक वह यादें किसी न किसी तरह पहुँच जाती हैं. कुछ यादें मैंने इस कविता में उतारी हैं, इसे पढ़कर शायद आपको भी अपने परिवार के मिलन की कोई  स्मृति हो आये...
मिठाई मिलन समारोह

कई बरसों के बाद मिले थे
दिल सभी के बहुत खिले थे,
इक छत के नीचे वे चौदह
और बातों के सिलसिले थे !

दिन सुहाने, माह नवम्बर
न गर्मी न सर्दी का डर,
कारण पापा की बीमारी
लेकिन खुश वे, थे बेहतर !

वाराणसी से डिब्रूगढ़ का
राजधानी में सफर चला,
मुम्बई से उड़े गगन में
फिर असम का दर्श मिला I

सँग लाए वे भेटें अनुपम
मिठाईयों का पूरा भंडार,
दीवाली के बाद मिले थे
मीठा मीठा था व्यवहार !

मलाई गिलौरी, गोंद के लड्डू
बूंदी चूर, बरफियाँ अनगिन
मेवों, सेव से बने व्यंजन
खाए मिलजुल सबने हरदिन !

वजन बढ़ा या घटा औंस भर
नापा करते बारी बारी,
अभी नाश्ता खत्म हुआ न
 दोपहरी की हो तैयारी I

फिर बारी भ्रमण की आती
दो कारों में सभी समाते
रोज नापते असम की धरती
चाय बागानों में जाते I

नदी किनारे, पुल के ऊपर
पार्क के झूले मन मोहते
पंछी, धूप, हवा, पानी सँग
हरी घास पर सभी झूमते !

ओ सी एस में एक अजूबा
पानी में थी आग लगी,
देख सभी रह गए अचम्भित
साँसें  थीं रह गयी रुकीं !

बच्चों ने भी लीं तस्वीरें
मन में यादें भरीं सुनहरी
दो सौ तेरह में सोये सब
दो सौ सात में कटी दुपहरी I

मिल उनो व कैरम खेला
झूले में भी पींग बढाई
पौधों को नहलाया जल से
ग्रुप में फोटो खूब खिचाई I

मोनोपली के राउंड चले
फेसबुक पर सभी गए,
एक जगत जो यह दिखता
दूजा है स्क्रीन के पीछे I

मेलजोल से हर दिन बीता
खुशियाँ जैसे झलक रहीं थीं,
योग, प्राणायाम के बल पे
सेहत सबकी ठीक रही थी I

ऐसा एक मिलन था अद्भुत
कविता में जो व्यक्त हुआ,
और दिलों में जो अंकित है
बड़े प्रेम से खुदा हुआ !

इसी तरह का प्यार सदा ही
सबके मन में बसा रहे
पापा मा की मिलें दुआएं
जीवन सुंदर सदा रहे !!

अनिता निहालानी
२४ नवम्बर २०१०