शुक्रवार, अगस्त 17

भारत रत्न अटल जी



 भारत रत्न अटल जी

बड़े दिवस पर जन्म लिया था
अति विशाल कवि मानस पाया, 
अंतर समर्पित राष्ट्र हित हो
जूझ आंधियों में मुस्काया !

तेरह मास, पांच वर्षों  का
सफर बड़ा ही कठिन गुजारा,
किन्तु नहीं आया फिर से वह
गौरवशाली समय दुबारा !

जनसंघ के संस्थापक बने
बीजेपी को भी जन्म दिया,
स्वयं सेवक बनकर संघ के
पांचजन्य का नाद भी किया !

चौबीस दलों को साथ मिला
एक नई सरकार बनाई,
इक्यासी मंत्री थे जिसमें
भारत को नई कीर्ति दिलाई !

भारत परमाणु सम्पन्न हो
पड़ोसी से संबंध सुधाार,
समर कारगिल का भी जीता
कवि हृदय भरी करुणा अपार !

भारत के चारों कोने जुड़ 
अटल मार्ग से आज मिले हैं,
पटु वक्ता ओजस्वी नेता
पाकर भारत भाग्य खिले हैं !

मंगलवार, अगस्त 14

तिरंगा


तिरंगा

नीलगगन में लहराते तिरंगे को देख
याद आते हैं वे अनाम चेहरे
इतिहास में जिनका कोई वर्णन नहीं
इस अमर स्वतन्त्रता के वाहक जो बने !

आज आजाद हैं हम
खुली हवा में श्वास लेने,
 दिल का हाल कहने सुनने को !

चैन की नींद सो सकते हैं
उगा सकते हैं धरा में अपनी पसंद की फसलें
भारत माँ को आराधना करते हुए
उगते सूरज को अर्घ्य चढ़ा सकते हैं !

लहरा जब जब तिरंगा शान से
हर भारतीय का हृदय भरा है आनबान से !

होश रखते हुए दिल में जोश जगाना है
इस तरह कुछ तिरंगा लहराना है
राम और कृष्ण की पावन भूमि का
महान गौरव सारे विश्व में बढ़ाना है !

शनिवार, अगस्त 11

अभी समर्थ हैं हाथ



अभी समर्थ हैं हाथ



अभी देख सकती हैं आँखें
चलो झाँके किन्हीं नयनों में
उड़ेल दें भीतर की शीतलता
और नेह पगी नरमाई
सहला दें कोई चुभता जख्म
कर दें आश्वस्त कुछ पलों के लिए ही सही
बहने दें किसी अदृश्य चाहत को
वरदान बनकर !

अभी सुन सकते हैं कान
चलो सुनें बारिश की धुन
और पूर दें
किसी झोंपड़ी का टूटा छप्पर
अनसुना न रह जाये रुदन
किसी बच्चे का
 न ही किसी पीड़ित की पुकार !

अभी समर्थ हैं हाथ
समेट लें सारे दुखों को झोली में
और बहा दें
तरोताजा होकर संवारें किसी के उलझे बाल
उदास मुखड़े और उड़े चेहरे से पूछें दिल का हाल !

अभी श्वासें बची हैं
जिसने दी हैं उसका कुछ कर्ज उतार दें
थोड़ा सा ही सही
उसकी दुनिया को प्यार दें !

बुधवार, अगस्त 8

खुले आकाश सा




खुले आकाश सा



सवाल बन के जगाये कई रातों को
 जवाब बनकर एक दिन वही सुलाता है
 ढूँढने में जिसे बरसों गुजारे
वही हर रोज तब आकर जगाता है
जिसकी चाहत में भुला दिया जग को
 जग की हर बात में नजर आता है
छुपा हुआ है जो हजार पर्दों में
खुले आकाश सा दिपदिपाता है
मांगते फिरते हैं जिससे सुखों की दौलत
बेहिसाब वह रहमतें बरसाता है !  



सोमवार, अगस्त 6

राखी के कोमल धागे





राखी के कोमल धागे




आया अगस्त
अब दूर नहीं श्रावणी पूनम
उत्सव एक अनोखा, जिस दिन
मधुर प्रीत की लहर बहेगी
हृदय जुड़ेंगे, बांध रेशमी तार
उरों में नव उमंग, तरंग जगेगी
और सजेंगे घर-घर में, दीपक-रोली के थाल
देकर कुछ उपहार हथेली में, बहना की
मुस्काएगा भाई, गुंजित होंगी सभी दिशाएं
बार-बार उत्सव यह आये !  

किन्तु दूर हैं जो भी प्रियजन
भेज राखियाँ, मधुर संदेशे
मना ही लेंगे रक्षा बंधन !
तिलक लगा मस्तक पर अपने
बाँध लीजिये राखी कर में
संग बंधी है शुभ कामना
पगी प्रीत में मधुर भावना
जीवन का हर पल सुखमय हो
हर इक उत्सव मंगलमय हो !

शुक्रवार, अगस्त 3

मोहन की हर अदा निराली




मोहन की हर अदा निराली


माधव केशव कृष्ण मुरारी
अनगिन नाम धरे हैं तूने,
ज्योति जलाई परम प्रेम की
अंतर घट थे जितने सूने !

दिया सहज प्रेम आश्वासन
युग-युग में कान्हा प्रकटेगा ,
सुप्त चेतना दबी तमस में
हर बंधन से मुक्त करेगा !

सच की आभा सुहृद बिखेरे
अनुपम प्रतिमा सुन्दरता की,
हर उर में रसधार उड़ेले
  हर अदा निराली मोहन की !

वृन्दावन भू रज पावन है
परम सखा बन रास रचाए,
विरह अनवरत मिलन बना है
नाता स्नेहिल सदा निभाए !

दिव्य जन्म शुभ कर्म अनेकों
हैंं अनंत गाथाएं तेरी,
सुन-सुन अश्रु बहे नयनों से
जाने कितनी छवि उकेरीं !



सोमवार, जुलाई 30

शब्दों से ले चले मौन में


शब्दों से ले चले मौन में


माटी का तन ज्योति परम है
सद्गुरु रब की याद दिलाता,
है अखंड वह परम निरंजन
तोषण का बादल बरसाता !

खुद को जिसने जान लिया है
गीत एक ही जो गाता है,
एक तत्व में स्थिति हर क्षण 
अंतर प्रेम जहाँ झरता है !

शब्दों से ले चले मौन में
परिधि से सदा केंद्र की ओर,
गति से निर्गति में ले जाए
मिले नहीं कभी जिसका छोर !

परम आत्म का स्मरण दिलाता
सहज मूल की ओर ले चले,
सच से जो पहचान कराए
भेंट करा दे उस प्रियतम से !

इक से जिसने नाता जोड़ा
एक हुआ उसका अंतर मन,
अपने लिए नहीं जीता वह
जग हित उसका पावन जीवन !

मिटे सभी भय मीत बना जग
खाली हुआ हृदय घट उसका,
बांट रहा दोनों हाथों से
घटता नहीं रंच भर जिसका !

सोमवार, जुलाई 23

पावन प्रीत पुलक सावन की



पावन प्रीत पुलक सावन की

कितने ही अहसास अनोखे
कितने बिसरे ख्वाब छिपे हैं,
खोल दराजें मन की देखें
अनगिन जहाँ सबाब छिपे हैं !

ऊपर-ऊपर उथला है जल
कदम-कदम पर फिसलन भी है,
नहीं मिला करते हैं मोती
इन परतों में दलदल भी है !

थोड़ा सा खंगालें उर को
जाल बिछाएं भीतर जाकर,
चलें खोजने सीप सुनहरे
नाव उतारें बचपन पाकर !

पावन प्रीत पुलक सावन की
या फिर कोई दीप जला हो,
गहराई में उगता जीवन
नीरव वन में पुहुप खिला हो !

अम्बर से जो नीर बरसता
गहरे जाकर ही उठता है,
कल का सूरज जो लायेगा
वही उजास आज झरता है !  




सोमवार, जुलाई 16

अस्तित्त्व और हम



अस्तित्त्व और हम

अस्तित्त्व खड़े करता है प्रश्न
खोजने होते हैं जिनके उत्तर हमें
आगे बढ़ने के लिए..
जरूरी है परीक्षाओं से गुजरना
अनसीखा मन लौटा दिया जाता है बार-बार
कच्चे घड़े की तरह अग्नि में !
जीवन कदम-कदम एक मौका है
खड़े रहें इस पार.. डूब जाएँ मंझधार में..
या उतर जाएँ उस पार !
हर दिन एक नई चुनौती लेकर आए
इसका भी प्रबंध हमें ही करना होगा...
अथवा
छोड़ ही दें सब कुछ अस्तित्त्व पर..
जब तक टूट नहीं जाता हर रक्षा कवच
परम रक्षक छिपा ही रहता है
जब तक बना रहता है ‘मैं’
सत्य ढका ही रहता है !

गुरुवार, जुलाई 12

नदिया सा हर क्षण बहना है



नदिया सा हर क्षण बहना है



ख्वाब देखकर सच करना है 
ऊपर ही ऊपर चढ़ना है,  
जीवन वृहत्त कैनवास है 
सुंदर सहज रंग भरना है !

साथ चल रहा कोई निशदिन 
हो अर्पित उसको कहना है,
इक विराट कुटुंब है दुनिया 
सबसे मिलजुल कर रहना है !

ताजी-खिली रहे मन कलिका
नदिया सा हर क्षण बहना है,
घाटी, पर्वत, घर या बीहड़ 
भीतर शिखरों पर रहना है !

वर्तुल में ही बहते-बहते 
मुक्ति का सम्मन पढ़ना है,
फेंक भूत का गठ्ठर सिर से 
हर पल का स्वागत करना है !

जुड़े ऊर्जा से नित रहकर 
अंतर घट में सुख भरना है,  
छलक-छलक जाएगा जब वह 
निर्मल निर्झर सा झरना है !

सोमवार, जुलाई 9

जन्मदिन पर




 माँ का उपहार 
पिता ने कहा कुछ दिन पहले
जन्मदिन आ रहा है तुम्हारा, क्या भेजें !
परमात्मा ने दिया है सब कुछ तुम्हें
सोचा, भेजते हैं थोड़ी सी दुआएं
दुआएं.. जो दूर तक साथ जाती हैं
जब घना हो अँधेरा तब उम्मीद का दीप जलाती हैं
इसी तरह खिला रहे मृदु मुस्कान से चेहरा तुम्हारा
हर कदम पर बनो एक-दूजे का सहारा
मित्रों संग खेलो-खिलखिलाओ
गमलों में कुछ और गुलाब उगाओ
इस शुभ दिन पर थोड़ा ध्यान भी करो
किसी जरूरत मंद को जाकर कुछ दान भी करो
सुबह उठकर शुक्रिया करना हर उस शख्स का
जिसकी वजह से आज तुम्हें यह मुकाम है मिला
पूर्वजों को याद करना, अपनों से आशीष लेना
मित्रों संग भोज कर, नव सृजन का स्वप्न देखना