दीप आरती का जब जगमग
छायाओं के पीछे भागे
जब सच से ही मुख मोड़ लिया,
जीवन का जो सहज स्रोत था
शुभ नाता उससे तोड़ लिया !
अर्ध्य चढ़ाते थे रवि को जब
जुड़ जाते थे परम स्रोत से,
तुलसी, कदली को कर सिंचित
वृंदावन भीतर उगते थे !
कर परिक्रमा शिव मंदिर की
खुद को भी तो पाया होगा,
दीप आरती का जब जगमग
आत्म ज्योति को ध्याया होगा !
किन्तु बनाया साधन उनको
जो स्वयं में हैं अनुपम साध्य,
नित्यकर्म का सौदा करके
कहते भजा तुझको आराध्य !
यह तो जीवन का उत्सव था
ना यह कला मांगने की थी ,
शुभ सुमिरन से मान मिलेगा
ऐसी लघु बुद्धि तो नहीं थी !
जग छाया है कहाँ मिलेगी
जबकि मन उजियार से प्रकटा,
अंधकार के पाहन ने ही
मार्ग सहज उजास का रोका !







.jpg)
