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शुक्रवार, अप्रैल 23

दीप आरती का जब जगमग

दीप आरती का जब जगमग

छायाओं के पीछे भागे 

जब सच से ही मुख मोड़ लिया, 

जीवन का जो सहज स्रोत था  

शुभ नाता उससे तोड़ लिया !


अर्ध्य चढ़ाते थे रवि को जब  

जुड़ जाते थे परम स्रोत से, 

तुलसी, कदली को कर सिंचित 

वृंदावन भीतर उगते थे !


कर परिक्रमा शिव मंदिर की 

खुद को भी तो पाया होगा,

दीप आरती का जब जगमग 

आत्म ज्योति को ध्याया होगा !


किन्तु बनाया साधन उनको

जो स्वयं में हैं अनुपम साध्य, 

नित्यकर्म का सौदा करके 

कहते भजा तुझको आराध्य !


यह तो जीवन का उत्सव  था 

ना यह  कला मांगने की थी ,

शुभ सुमिरन से मान मिलेगा 

ऐसी लघु बुद्धि तो नहीं थी !


जग छाया है कहाँ मिलेगी 

जबकि मन उजियार से प्रकटा, 

अंधकार के पाहन ने ही 

मार्ग सहज उजास का रोका !


 

बुधवार, अगस्त 26

ज्योतिर्मय वह स्रोत ज्योति का

ज्योतिर्मय वह स्रोत ज्योति का

 

रवि सौर मंडल की आत्मा  

आदित्य से हर रूप सजता,

सर्वप्रेरक, विश्व प्रकाशक 

सप्तवर्णी, नेत्र शंकर का !

 

सूर्य देव हैं स्रोत अग्नि के 

जीवन दाता वसुंधरा के, 

द्युलोक में गमनशील हैं 

नयनों में बसते प्राणी के !

 

अंधकार की काली छाया 

छँट जाती सविता प्रकाश में, 

पल भर में जो दृश्य बदल दे 

दिवसेश्वर नित आकाश के !

 

अग्नि देह को जीवित रखती 

वसुधा को भी गतिमय रखती, 

बड़वानल सागर में रहकर 

वैश्वानर जीव में बसती !

 

महाभूत है महादेव का 

ज्योतिर्मय वह स्रोत ज्योति का, 

तपस से ऋषिगण सृष्टि करते 

प्रलय तीव्र ज्वाल से घटता !

 

अग्नि शिखा नित ऊपर बढ़ती 

मार्ग प्रशस्त करे मानव का, 

पावक परम पावन शक्ति है

नष्ट करे हर दोष सभी का ! 

शनिवार, फ़रवरी 9

सरहद पर बर्फीले पर्वत



सरहद पर बर्फीले पर्वत



कण-कण में भारत धरती के
बहता एक शाश्वत सँजीवन,
दूर पूर्वी अंचल में जब
उगती नभ में अरुणाभ, नमन !

सरहद पर बर्फीले पर्वत
कहीं सिंधु, रेतीले निर्जन
रक्षित करने को तत्पर है
सेनानी का तन मन अर्पण !

जयहिन्द मधुर नाद गूँजता
अंतर में हिलोर इक उठती,
नदिया, पर्वत, कानन, अम्बर
हर कोने को छू विहंसती !

पुण्य भूमि यह पुण्य शील है
राम, कृष्ण, बुद्धों की आभा,
गंगा, कावेरी, सतलज से
सिंचित है जन-जन की आशा !

आज नवल रवि दस्तक देता
कोटि-कोटि भाारतवासी को,
 पुरुषार्थ कर इसे संवारें
अवसर मिलता सौभागी को !



शनिवार, दिसंबर 19

कैसे यह बात घटी


कैसे यह बात घटी


सबको घर जाना है
आज नहीं कल यहाँ
 उतार वस्त्र देह का
हो जाना रवाना है !

भुला दिया जीत में
कभी जगत रीत में
मीत सभी हैं यहाँ
कोई न बेगाना है

सबको घर जाना है !

कैसे यह बात घटी
लक्ष्य से नजर हटी
स्वयं को ही खो दिया
मिला न ठिकाना है !

भेद जो भी दीखते
ऊपर ही सोहते
एक रवि की किरण
बुने ताना-बाना है !

मंगलवार, सितंबर 22

जीवन ! कितना पावन !

जीवन ! कितना पावन !

सदा अछूता ! कोमल शतदल
सरवर में ज्यों खिला कमल हो,
राजहंस या तिरता कोई
दूर गगन तक उड़ सकता हो !

नन्ही बूंद ओस की जैसे
इन्द्रधनुष या पंख मयूर
कोमलतम या प्रीत हृदय की
बाल रवि का अरुणिम नूर !

निर्मल नभ की शुभ्र नीलिमा
मंद पवन वासन्ती या फिर,
रुनझुन हल्की सी पत्तों में
कलकल मद्धिम धारा का स्वर !

तुलसी दल की गंध सुहानी
श्वेत मालती की ज्यों माला,
मन्दिर में जलता दीपक या
मोती से जो बहे उजाला !



शुक्रवार, अगस्त 21

कैसा है वह


कैसा है वह


एक रेशमी अहसास
कोई रहस्य बुना हुआ सा
प्राचीनतम मन्दिर के खंडहरों सा
सागर की अतल गहराई में छिपे
असंख्य मोतियों की चमक सा
अन्तरिक्ष की अनंतता..और अभेद मौन सा
शब्दों के पार भाव से परे
जैसे नीरव एकांत रात्रि में
कमल ताल पर ज्योत्सना झरे
भोर की पहली किरन सा
जब गगन में चमकते हों तारे भी
पूरब से उगा भी न हो रवि अभी
या सूनी दोपहरिया में जब
भिड़े हों सारे कपाट
सूनी गली में
सांय-सांय करती हो अकेली पवन
दूर पर्वतों पर बने छोटे से मन्दिर में
जब हो चुकी हो दिन की अंतिम पूजा
तब उस सन्नाटे सा
भीतर कोई रहता है..

रविवार, जनवरी 25

आया वसंत

आया वसंत

महुआ टपके रसधार बहे
गेंदा गमके मधुहार उगे ,
महके सरसों गुंजार उठे
घट घट में सोया प्यार जगे !

ऋतू मदमाती आई पावन
झंकृत होता हर अंतर मन,
रंगों ने बिखराई सरगम
संगीत बहा उपवन उपवन !

जागे पनघट जल भी चंचल
हुई पवन नशीली हँसा कमल,
भू लुटा रही अनमोल कोष
रवि ने पाया फिर खोया बल !

जीवन निखरा नव रूप धरा
किरणों ने नूतन रंग भरा,
सूने मन का हर ताप गया,
हो मिलन, उठा अवगुंठ जरा !


बुधवार, जुलाई 16

रंगमंच


रंगमंच



जल धाराओं के सिंचन से
तृप्त हुई माँ
उलीचती हरियाली
निज अंतर में कुछ न रखती
सभी यहाँ लौटा देती है
गंध, स्वाद, रंग बन मिलती
धरती कई रूप में खिलती !
पुरवाई भी हुई शीतला
जल संस्पर्श हर गया तप्तता
झूमें वृक्ष, डालियाँ थिरकें
विहग विहँसते.. परस पवन का !
अन्तरिक्ष प्रफ्फुलित उर में
मूक, मौन हो सबको धारे
रवि मयूख धेनु बना कर
नील गगन का रूप संवारे !
सृष्टि रंग मंच पर नित ही
खेल नये नित खेले जाते
उसी चेतना के हित हैं ये
उससे ही हैं भेजे जाते !

रविवार, मई 8

कहाँ गया घनघोर घटा स्वर


कहाँ गया घनघोर घटा स्वर

चमचम चमक रहा अम्बर पर
छोड़े अविरत अस्त्र किरण शर,
 क्रोधित रवि प्रचंड वेश धर
जला रहा मल ले अशुद्धि हर !  

गृह में छुपे सभी नारी-नर
तपे ताप से पशु ढूँढें घर,
सूखे नाले, नदिया, सरवर
प्यासे पत्ते, झुलसे तरुवर !

जली रेत मरुथल सी माटी
छिपे बिलों में मूषक, फणधर,
मुरझाये पुष्प से शिशु भी
लौट रहे जो ले बस्ते घर !

जल पाकर भी तृषित रहे उर
तप्त हुआ जल, बहता सीकर,
उपवन सींचे प्रातः माली
शाम पुनः फैलाता है कर !

भिगो-भिगो धरे वस्त्र शाक पर
छींटे डाल करे भिंडी तर, 
भेजो बादल कोकिल गाये
कहाँ गया घनघोर घटा स्वर ?

अनिता निहालानी
८ मई २०११