रविवार, अप्रैल 29


वह जो कोई भी है


कोई दूर रह कर भी
निकटतम हो सकता है !

दूरी प्रेम को बढ़ाती है
विरह की अनल में जल जाते हैं
उर के अवांछनीय तत्व,
जल ही जाते होंगे...
तभी तो विरह के आँसूओं का स्वाद
कुछ अलग होता है !


हो सकता है मुखरित कोई मौन होकर भी !

मौन भीतर के मौन को जगाता है
करता है परिचय अनंत से
शब्द की सीमा है, मौन असीम है
कोई चार शब्द कहे तो चार सौ की इच्छा होगी
पर मौन, एक पल का हो या एक पहर का
स्वाद दोनों का एक है !


कोई उदासीन होकर भी
रख सकता है ख्याल !

उदासीनता अंतर्मुखी कराती है
दूसरे का ध्यान मिले तो मन उसी पर जायेगा
अंतर्मुखता अपने आप से मिलाती है

अनंत उपकार हैं उसके
जो दूर है
मौन है
उदासीन है !


शुक्रवार, अप्रैल 27

नहीं, अब और नहीं


नहीं, अब और नहीं

अब त्रिशंकु नहीं रहेंगे हम
अधर में लटके
बीसवीं मंजिल पर.
बंद कमरों में कैद
हम जायेंगे जमीन पर
धरा की गोद में एक आशियाना बनाएंगे....

चाँदनी रातों को सोयेंगे
खुले गगन के नीचे
अमावस को ओढ़ेंगे तारों की चादर

नहीं, हमें नहीं खोलना डरते हुए द्वार
अतिथि के लिये
द्वार की आँख से झांक कर
हम घर के बाहर चबूतरे पर खुले में बतियाएंगे...

धूप को नहीं तरसेंगे
छोटी सी बालकनी में
अपने आंगन में धान सुखायेंगे

नींबू, अमरुद और बेर की झाडियों पर
जब पकेंगे फल, उनकी
मदमस्त गंध में डूबेंगे उतरायेंगे
गिलहरियों की आंखमिचौली देखते  
हमारे दिन संझियारे हो जायेंगे

नहीं हमें नहीं रहना
नकाब पहने, धूल और धुएं से घिरे
नहीं ठूंसना हमें अँगुलियों को कानों में
कर्णभेदी शोर को सुन के
हम तो कोयल के साथ आल्हा गुनगुनायेंगे

पालीथीन बैग में लाए नहीं
घर की फुलवारी से तोड़
चढ़ाएंगे मंदिर में फूल

डालेंगे पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर झूला
और सँग हवा के
आकाश तक हो आयेगे

कच्चे फर्श पर जब बरसात में
चला आयेगा कोई केंचुआ
सांप कहकर दादी को डराएंगे

नहीं खाना हमें डब्बा बंद खाना
हम रोज ताजा ही बनाएंगे

जमीन से आती खुशबू को समेटे
दिन दोपहरी चटाई पर ही सो जायेंगे
नहीं बनना हमें त्रिशंकु
हम धरती पर ही भले..  

गुरुवार, अप्रैल 26

दृश्य नहीं वह द्रष्टा है


दृश्य नहीं वह द्रष्टा है
  
वह कैद नहीं है मंदिर में
दृश्य नहीं वह द्रष्टा है,
 नाम-रूप में बंध न सके
सृष्टि नहीं वह सृष्टा है !

झांक रहा इन नयनों से
श्रवणों से शब्द वही धारे,
कोमलतम स्पर्श उसी से हैं
उससे ही भाव उठे सारे  !

वह बन विद्युत तन में दौड़े
मन-प्राण उसी के बल पर हैं,
वह सहज सदा रहता भीतर
दूरी न हमसे पल भर है !

उसमें विश्राम करे कोई
सँवर गया निज दर्पण में,
पल भर भी ध्यान धरे कोई
खो जाता दिल की धड़कन में !

ज्यों बालक माँ से विमुख हुआ
बस खेल खिलौनों से खेले,
जीवन की उथल-पुथल कैसी
वह देख रहा कुछ न बोले !

वह देखे ही जायेगा, गर
हम रुक कर उसको न चीन्हें
है धैर्य, बड़ी करुणा उसमें
निजता को तिल भर न छीने !  

बुधवार, अप्रैल 25

एक अनोखा खेल चल रहा बड़े प्रेम से कोई छल रहा


एक अनोखा खेल चल रहा
बड़े प्रेम से कोई छल रहा


खोजने व्यर्थ को जब दौड़ते फिरे हम
 सार्थक घर आने को बेताब ही था

राह तकते जिसकी बिछाए रहे पलकें
आने वाला वह आया ही हुआ था

हजारों खत न जिसे भेजे होंगे
परदेश वह कभी गया ही नहीं था

याद कर करके जिसे थकते नहीं
दिल ने उसे भुलाया ही कब था

मांगी मनौतियां विनतियाँ भेजीं
हाले दिल उससे छिपा ही न था

 पुकारें किसे राह निहारें किसकी
वहाँ कभी कोई दूसरा नहीं था



सोमवार, अप्रैल 23

बनारसी दावत


यात्रा के दौरान बनारस में हम एक परिवार से मिलने गए जिनके यहाँ पान का व्यवसाय होता है, पुराने टाईप का बड़ा सा घर था और शेष पढ़िये इस कविता में....

बनारसी दावत

एक स्कूटर, एक बाइक
एक किया आटोरिक्शा,
चले सभी मिल एक साथ
लक्ष्य था घर उनका !

भीड़ भरा हर चौराहा था
चौकाघाट से चली सवारी,
लहुराबीर से सिगरा होके
औरंगाबाद की आयी बारी !

नीचे था पान गोदाम
पान सहेजे गिने जा रहे,
घर के लोग भी सँग औरों के
हरे पान को छांट रहे

अम्मा की तस्वीर पुरानी
याद दिलाती दिवस पुराने !
झुक-झुक बच्चे पैर छू रहे
ऊपर मिले सभी सयाने !

घर में इक मंदिर सजा था
देवी पूजा का आयोजन,
एक दीप अखंड जल रहा
सुबह-शाम जहाँ होता वन्दन !

सभी बैठ मिल बातें करते
तभी नाश्ते सम्मुख आये,
बर्फी, लड्डू, और समोसे
काजू और मखाने लाए !


गाजर का हलवा स्वादिष्ट
आलू के कटलेट भी आये,
खट्टी, मीठी चटनी के सँग
एक-एक को थे सब भाए !

साबूदाने की फिर खिचड़ी
मठरी, भुजिया कुरमुरी थी,
अंत में मिली चाय बनारसी
ऐसी अद्भुत आवभगत की !

तीसी, खसखस के लड्डू थे
शुद्ध घी में डूबे पूरे,
इससे भी बढ़कर थे दिल वे
बच्चों, बड़ों सभी के प्यारे !



रविवार, अप्रैल 22

कुछ पल बगीचे में...


कुछ पल बगीचे में...

हवा सांय-सांय की आवाज लगाती
बहती जाती है
पेड़ों के झुरमुटों से
सुनहली धूप में चमक रहा होता है
जब घास का एक एक तिनका
किसी तितली के इंतजार में फूल
आँखें बिछाए तो नहीं
बैठा होता डाली के सिरे पर..

सूनी सड़क पर एकाएक
गुजर जाती है कोई साईकिल
और ठीक तभी दूर से
आवाज देती है गाड़ी
स्टेशन छोड़ दिया होगा किसी ट्रेन ने
हाथ हिल रहे होंगे, प्लेटफार्म और
ट्रेन के कूपों से बाहर हवा में
जाने किस किस के....  

आकाश नीला है
और श्वेत बगुलों से बादल
इधर-उधर डोल रहे हैं
एक पेड़ न जाने किस धुन में बढ़ता चला गया है
बादल की सफेद पृष्ठभूमि में
खिल रहा है उसका हरा रंग
जैस सफेद चादर पर हरे बूटे...

रह रह के हवा झूला जाती है झूला
जिस पर बैठ कर लिखी जा रही है कविता
परमात्मा इतना करीब है इस पल कि
नासिका में भर रही है उसकी खुशबू
और कानों में गूंज रही है बादलों की गड़गड़ाहट
धूप की तेजी को कम करती
रह-रह कर सहला जाती है
हवा की शीतलता
मैं हूँ यह है सौभाग्य मेरा
एक श्वेत तितली
कहती हुई गुजर जाती है सामने से..
हवा सांय-सांय की आवाज लगाती
बहती जाती है बगीचे में...




गुरुवार, अप्रैल 19

पिता


पिता

मिलते ही धर देते हैं
हाथ पर कुछ नोटों की सौगात
जैसे हो हमारी अमानत उनके पास
सौंप कर जिसे निश्चिन्त होना चाहते हों...

आठ दशकों से देखे होंगें
उतार-चढ़ाव न जाने कितने
पर आँखें नव शिशु सी स्वच्छ हैं..
झाड़ दिये हैं शायद उदास पंख
और उड़ते हैं बेपंख ही
भीतर के आकाश में...

माँ के बिना भी पूर्ण नजर आने लगे हैं पिता
माँ जैसे उनके भीतर समा गयी हैं
पिलाते अपने हाथों से बनाकर चाय
बिस्तर लगाते
सिखाते छोटी-छोटी बातें..
थमाते घर गृहस्थी की छोटी छोटी वस्तुएँ
पिता सजग हैं और संतुष्ट भी !

बुधवार, अप्रैल 18

पता है


पता है




पता है

 वही श्वास ले रहा है
हमारे, तुम्हारे, सबके शरीरों द्वारा
वही धड़क रहा है...

अस्तित्त्व भर लेता है खुद को  
जब हम छोड़ते हैं श्वास
और रिक्त होता है हमारे भरने पर...

पता है ?

यह सारा ब्रह्मांड उसकी देह है
वह जीवित है अनंत प्राणियों की देहों से
वही झांकता है कण-कण से
वही जो रेश-रेशे में भीगा है जीवन रस से !

हर कोशिका परमात्मा रूपी स्वर्ण पर जड़ा हीरा है
जिस पर वक्त की परतें जम गयी हैं
वह हरेक को देता है अवसर
जब वह हमारे द्वारा श्वास लेता है ! 








मंगलवार, अप्रैल 17

चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा



चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा


मानस की घाटी में श्रद्धा का बीज गिरा
प्रज्ञा की डाली पर शांति का पुष्प उगा,
अंतर की सुरभि से जीवन बाहर महका
रिस रिस कर प्रेम बहा अधरों से हास पगा !

कण-कण में आस जगी नैनों में उजास भरा
हुलसा तन का पोर पोर भीतर था गीत जगा,
बाहर इक लय बिखरी जीवन संगीत बहा
कदमों में थिरकन भर अंतर में नृत्य जगा !

मुस्काई हर धड़कन लहराया जब यौवन
अपने ही आंगन में प्रियतम का द्वार खुला,
लहरों सी बन पुलकन उसकी ही बात कहे
बिन बोले सब कह दे अद्भुत यह राग उठा !

हँसता है हर पल वह सूरज की किरणों में
चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा,
पल-पल वह सँग अपने सुंदर यह भाग जगा
देखो यह मस्ती का भीतर है फाग जगा !

युग युग से प्यासी थी धरती का भाग उगा
सरसी बगिया मन की जीवन में तोष जगा,
वह है वह अपना है रह रह यह कोई कहे
सोया था जो कब से अंतर वह आज जगा !

रविवार, अप्रैल 15

यदि हम गए होते सारनाथ



जब हम बनारस में थे एक बार सारनाथ जाने का कार्यक्रम बना पर किसी कारण वश सफल नहीं हो पाया तब मैंने यह कविता लिखी थी.

यदि हम गए होते सारनाथ

झड़ गया होता
मन का हल्का सा भी तनाव
हरे पेड़ों की छाँव में,

वह नीला गगन
याद दिलाता अनंत की
और कुलांचे भरते हिरण
कैसी पुलक न भर देते मन प्राणों में

वे ऊँचे स्तूप बने है जिसकी याद में
उसकी सौम्य मूर्ति
भीतर तक एक शांति और ठहराव को जन्म देती
कतारें दीपकों की
अंतर को सुवासित करतीं

यदि हम गए होते सारनाथ....

भूल जाते कुछ पल के लिये
ओढ़ी हुई उपाधियाँ
प्रकृति के सान्निध्य में
बच्चे न बन जाते....

शुक्रवार, अप्रैल 13

दिल्ली की एक सुबह


दो दिनों के लिये हम दिल्ली में थे, कैंटोनमेंट एरिया में आर्मी कैंटीन के पास स्थित मेरे भाई के सरकारी आवास में ठहरे थे. सुबह बालकनी में बैठकर मैं प्राणायाम कर रही थी आँख खोली तो सामने वाले घर की छत पर पानी की टंकी से पानी पीता हुआ एक मोर दिखा, थोड़ी देर में नीचे से मोरनी की आवाजें भी सुनाई दी, वह मोर नीचे उतर कर मस्त चाल में चलता हुआ पंखों को फैलाकर नृत्य करने लगा, ऐसे लग रहा था मनो कोई स्टेज शो चल रहा हो, हमने वीडियो बनाया, उसने इत्मीनान से पंख समेटे, विस्मय और खुशी से हमारे मन मयूर भी नाच उठे, अगले दिन हम जल्दी उठकर मोर लीला देखने के लिये तैयार हुए, फिर वह पानी पीने आया, आज उसका साथी भी था, नीचे बगीचे में जाकर कई मोर-मोरनियाँ दिखे, उन्हें कोई भय नहीं था, लोग आसपास थे पर वे संशकित नहीं थे. एक तो कार के बोनट पर चढ़ गया, और भीतर झाँकने लगा. हमने कई चित्र लिये एक यहाँ प्रस्तुत है. यह कविता उसी दिन सहज ही लिखी गयी.

दिल्ली की एक सुबह

चिरपिर चिड़ियों की मधुरिम सुन
गुटरम्–पुटरम् कबूतरों की,
केंया मोर-मोरनी छेड़ें
सुबह सुहानी है दिल्ली की !

वृक्षों के झुरमुट घर मोहक
फुदक गिलहरी मौज मनाये,
सुरभि अनोखी छन पत्तों से
फूलों की खबर दे जाये !

बालकनी में गृह तिनकों का
श्वेत लघु दो अंड हैं जिसमें,
झांक-झांक कर उड़ जाते हैं
सुंदर दो कबूतर पल में !

ग्रीवा हरि गुलाबी जिनकी
जरा न डरते, निकट आ बैठे,
ओम ओम की धुन वे छेड़ें
गर्दन फूला फूला कर ऐंठे !  

पानी की टंकी पर देखा
मोर सजीला चोंच डुबोए,
तृषा बुझी जब तृप्त हुआ वह
मग्न हुआ सा नृत्य दिखाए !

संगी सब दाना चुगते थे
उसने खोले पर चमकीले,
गोल-गोल चक्कर वह काटे
अद्भुत थे वे रंग रंगीले !

मोर मुकुट से शोभित होता  
कान्हा की स्मृति छा गयी,
महादेवी के मोर मोरनी
राष्ट्रीयता भी याद आ गयी !