सोमवार, जनवरी 31

हँसना मना है !

मुकरियाँ

हर बंधन को बुरा बतावे
अपनी मर्जी ही चलवावे
सांसत में सब आये पालक
क्यों सखी साजन, न सखी बालक !

ठूंस-ठूंस कर चारा खाए
अपनी खिदमत खूब कराए
भूल के भी डकार न लेता
क्यों सखी भैंसा, न सखी नेता !

सारे जग से पूजा जाता
सबके दिल पर धाक जमाता
पड़ें पैर सब दादा- मैया
क्यों सखी देव, नहीं रुपैया !

गली गली में उसके चर्चे
जैसे सबको देने पर्चे
दीवाने नौकर या सेठ
क्यों सखी हीरो, नहीं क्रिकेट !

शैम्पू, साबुन बेचे तेल
माल बेचना समझे खेल
मनमानी कीमत है लेता
क्यों सखी बनिया, न अभिनेता !

अनिता निहालानी
३१ जनवरी २०११
  

रविवार, जनवरी 30

बापू के नाम

बापू के नाम

तुम
एक दिव्य चेतना
जो तन मन को सचेत कर गयी है
जैसे एक चिंगारी भड़की हो
 अनुप्राणित कर दिया हो जिसने  
तुम्हारा अनूठा व्यक्तित्व, अनोखे बोल
प्राणोत्सर्ग और वह सब
जिसके लिये तुम लड़े...
 खुद से जुड़ा मालूम होता है,
तुम्हारी आँखों में छिपा दर्द
और निर्भयता की चादर
सत्य के प्रति प्रेम
आज पुकारते हैं
जब देश खड़ा है दोराहे पर,
सच है  
तुमने जो दिया जलाया था
 कहीं खो गया
करोड़ों हाथ जिसके रक्षक थे
बुझ कर जाने कैसे  
असत्य बो गया ?
लेकिन आज भी तुम
धड़कते हो हजारों दिलों में
मशालें आज भी जलती हैं
तुम्हारे नाम की  
आज भी रस्ता दिखाते
नमन तुम्हें, हे बापू !

अनिता निहालानी
३० जनवरी २०११

शुक्रवार, जनवरी 28

जब से तुमसा खुद को जाना !



जब से तुमसा खुद को जाना !


धरा वही है, वही गगन है
वही सूर्य, चन्द्रमा, तारे
किन्तु हुई है मधुमय, रसमय
मिले हैं जब से नयन हमारे !

यूँ ही नहीं हूँ मनु का वंशज
हुआ सार्थक जग में आना,
अर्थ मिला है इक-इक क्षण को
जब से तुमसा खुद को जाना !

सृजन ऊर्जा, प्राण ऊर्जा
है अनंत, असीम हो बांटे,
मुक्तिबोध प्रबल है इतना
सम है पथ पर पुष्प व कांटे !

लक्ष्य एक ही उस अनंत का
कण कण में जो रहा समोए,
निर्मल अंतर घट घट में जा
प्रेम सिंधु में सहज डुबोए !

अनिता निहालानी
२८ जनवरी २०११  




गुरुवार, जनवरी 27

मैं किशुंक का फूल नहीं हूँ

मैं किशुंक का फूल नहीं हूँ

बहुत वर्षों पहले मेरे फुफेरे भाई ने, जो अब इस दुनिया में नहीं है, यह कविता मुझे भेजी थी, उसने स्वयं लिखी थी या उसने कहीं से नकल की थी मैं जान नहीं पायी. मेरी डायरी में यह अनेक वर्षों से पड़ी हुई थी, आज मैं उसी भाई की स्मृति में आप सबके सम्मुख इसे प्रस्तुत कर रही हूँ यदि किसी को इसके रचनाकार का नाम ज्ञात हो तो कृपया अवश्य बतायें.

कांटे तो रखता हूँ, लेकिन छाया रहित शूल नहीं हूँ
मैं किशुंक का फूल नहीं हूँ !

प्रेम घृणा दोनों से मैंने
अपलक निर्भय आँख मिलायी
पर मेरी निष्कपट धृष्टता
भीरु जगत को रास न आयी,
कायरता के छल से करना
नहीं कभी समझौता सीखा
इसीलिए अमृत-पूजा का
फल भी मिला गरल सा तीखा !

लघु-लघु लहरें काट गिरा दें, ऐसा पोला कूल नहीं हूँ
मैं किशुंक का फूल नहीं हूँ !

विश्वासी मन ने चाहा
विश्वास सदा ही भोलाभाला
किन्तु घात करने वालों को
केवल प्रतिघातों से टाला
निश्छल उर के चरणों पर तो
रख दी मन की ममता सारी
पर ठोकर वाला पग चूमूं
ऐसा नहीं विनम्र पुजारी

दम्भ नहीं कुछ होने का, पर निरी शून्य की भूल नहीं हूँ
मैं किशुंक का फूल नहीं हूँ



  
  

मंगलवार, जनवरी 25

गणतन्त्र दिवस की शुभकामनायें

गणतन्त्र दिवस

तिरंगा सुनाता है अपनी कहानी
 राजा है इसमें न ही कोई रानी,
शहीदों के खूं से लिखी यह गयी है
हजारों की इसमें छुपी क़ुरबानी !

गुलामी का दर्द भयानक बड़ा था
घुट घुट के जीते थे शासन कड़ा था,  
आजादी की शमा जब जली लहराती  
तिरंगा गगन में ऊँचा खड़ा था !

बापू ने इसमें भरे रंग प्यारे
चरखा बना चक्र, संदेश धारे,
बढ़ते चलें तोड़ बाधायें पथ की
मंजिल सदा दे, आशा पुकारे !

केसरिया सुनाये साहस की गाथा  
हरियाला भारत स्वप्न सजाता,  
सच्चाई, शांति का संदेशा देकर   
तिरंगा दिलों में आकांक्षा जगाता !

अनिता निहालानी
२५ जनवरी २०११


   

सोमवार, जनवरी 24

जयहिंद

जयहिंद

‘जयहिंद’ का नारा गूंजा जाग उठे भारतवासी
नहीं सहेंगे पराधीनता लगने दो चाहे फांसी !

तुम भारत के पुत्र अनोखे फौलादी दिल को ढाले
खून के बदले ही आजादी मिल सकती कहने वाले !

बापू के थे निकट खड़े फिर भी उनके साथ लड़े
दिल झुकता था कदमों पर कर्तव्य पर कहीं बड़े !  

कैसे अद्भुत सेनानी साम्राज्य से भिड़ने निकले
दिल्ली चलो का नारा दे सँग सेना लड़ने निकले !

भारत गौरवान्वित तुमसे आजाद हिंद फ़ौज निर्माता
कभी कभी ही किसी हृदय में इतना साहस भर पाता !

तुम्हें याद करता भारत अचरज भरी निगाहों से
जिस माटी में तुम खेले ध्वनि आती उन राहों से !

जय हिंद की इक पुकार पर हर भारतीय डोल उठे
 देशभक्ति जो सोयी भीतर ले अंगडाई बोल उठे !

अनिता निहालानी
२४ जनवरी २०११        

शुक्रवार, जनवरी 21

बिखरा दें, फिर मुस्का लें

बिखरा दें, फिर मुस्का लें

खाली कर दें अपना दामन
जग को सब कुछ दे डालें,  
प्रीत ह्रदय की, गीत प्रणय के
बिखरा दें, फिर मुस्का लें !

तन की दीवारों के पीछे
मन मंदिर की गहन गुफा से,
जगमग दीप उजाला जग में
फैला दें, फिर मुस्का लें !

अंतर्मन की गहराई में
अनुपम नाद सदा गूंजता,
चुन चुन कर मधु गुंजन जग में
गुंजा दें, फिर मुस्का लें !

भीतर बहते अमृत घट जो 
प्याले भर भर उर पाता,
अमिसरिस रस धार जगत में
लहरा दें, फिर मुस्का लें !

हुआ सुवासित तन-मन जिससे
भीतर जिसके भरे खजाने,
सुरभि सुगन्धित पावन सुखमय
छितरा दें, फिर मुस्का लें !

अनिता निहालानी
२१ जनवरी २०११ 

बुधवार, जनवरी 19

सच की दुनिया कोमल कितनी !


सच की दुनिया कोमल कितनी !

छा जाये जब सघन अँधेरा
हाथ  हाथ को भी ना सूझे,
राह नजर ना आये कोई
हाले दिल कोई ना बूझे !

भीतर कान लगाये सुनते
बिना रुके ना ही घबराये, 
 यानि अंतर्मन की गुनते
हिम्मत से बस बढ़ते जायें ! 

अभी तो हैं गुम अपने आगे
खुद से भी अनजाने हैं हम,
इसीलिए तो अंधकार है
इस जग से  बेगाने हैं हम !

तिमिर घना यह हो कितना ही
ओढ़ाया गया है हम पर
है असत्य यह एक छलावा
 अनावरण में लगेगा पल भर !

सच तो पिघला पिघला सा है
बहता जाता गति में अपनी,
नहीं आग्रह, नहीं धारणा
सच की दुनिया कोमल कितनी !

अनिता निहालानी
१९ जनवरी २०११   



 

सोमवार, जनवरी 17

अट्टाहस बन गूंजे

अट्टाहस बन गूंजे
गुनगुनी सी साधना छोड़ें आज धधकने दें ज्वाला,
प्यास कुनकुनी प्यास ही नहीं आज छलकने दें प्याला !

भीतर छिपी अनंत शक्तियाँ प्रभु का अकूत खजाना
जितना चाहें उसे उलीचें खत्म न होगा आना !

तीन गुणों में डोल रहे हम जन्मों से दीवाने
कभी ज्ञान के पुतले बनते कभी बने अनजाने !

ऊपर उठ के खुद में आयें जीवन को खिलने दें
जन्म उसे दें जो भीतर है खुद से खुद मिलने दें !

आज उठें, छलांग लगाएं बहुत हुआ है इंतजार अब
आस पास की हवा बदल दें जागेगा जन-जन कब !

गूंज उठे कण-कण तन-मन का ऊर्जा की गुंजार उठे
कोष-कोष में सोया जो अब जागेगा पुकार उठे !

पुलक बने, कभी हास्य अनोखा, अट्टाहस बन गूंजे
शक्ति अपार भरी जो भीतर मधुर हास बन गूंजे !

कर्मठता के बीज उगायें श्रम के जल से सींचें
हाथ बढ़ें, गिरतों को उठायें, न रहें मुट्ठियाँ भींचे !

देवत्व जगे, है सोया जो जाने कब से भीतर
लिये गर्भ में उसे ढो रहे भार बना जो अंतर !

बिखरे, बहे, फ़ैल जाये वह सृष्टि के कण-कण में
आज चेतना की चिंगारी फूट पड़े जन जन में !

अब बातों का समय नहीं काम करें हम डटकर
वही बचेगा इस युग में जो न बैठा थक कर !

और नहीं तो उतरें-चढ़ें सीढियाँ ही जीने की
फूल उगायें, पतंग उड़ायें वजह तो हो जीने की !

अनिता निहालानी
१७ जनवरी २०११  


शनिवार, जनवरी 15

विप्लव आज अवश्यम्भावी


विप्लव आज अवश्यम्भावी

 घंटनाद मंदिरों के अब बन जाने दो सिहंनाद,
आज वही युग आया जब युद्ध में हो संवाद !

जाग उठे अब जन जन ऐसी रणभेरी बजने दो,
क्रांति बिगुल बजाए ऐसा हर मस्तक सजने दो !

विप्लव आज अवश्यम्भावी युग बीते हम सोये
कैद हुए निज पीड़ा में पाया क्या बस रोये ?

भुला दिये मूल्यों का सम्मान पुनः करना है,
लेकिन पहले जाग के भीतर स्वयं अभय भरना है !

भीतर पाकर परम उजाला जग में उसे लुटाएं,
उसी शांति से उपजे कलरव क्रांति गीत बन जाएँ !

कोना कोना गूंज उठे फिर ऐसा रोर मचे,
उखड़ें सड़ी गली रीतियाँ जमके शोर मचे !

हाथ उठा आज धरा को अम्बर से मिलने दो
  चिन्मय को मृण्मय का संदेसा पा खिलने दो !

अनिता निहालानी
१५ जनवरी २०११ 

गुरुवार, जनवरी 13

आप सभी को मकर संक्रांति के पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ !

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मकर संक्रांति पर कुछ दोहे

मकर राशि में सूर्य का हो रहा प्रवेश
संक्रांति काल लेकर आया पर्व विशेष !

उत्तर में खिचड़ी कहें दक्षिण में है पोंगल
लोहड़ी जो पंजाब में असम में बीहू मंगल !

लकड़ी का एक ढेर हो शीत मिटाए आग
बैर कलुष जल खाक हों पर्व मनायें जाग !

मीठे गुड में तिल मिले नभ में उड़ी पतंग
लोहड़ी की इस आग ने दिल में भरी उमंग !

दाने भुने मकई के भर रेवड़ियाँ थाल
अंतर में उल्लास हो चमकें सबके भाल !

अनिता निहालानी
१३ जनवरी २०११   

बुधवार, जनवरी 12

गति वैसी होनी जानी है !

गति वैसी होनी जानी है !

कर्मों की गति अटल बड़ी है
लेकिन सीधी, सरल, सही है,
जैसा भाव, कर्म, वाणी है
गति वैसी होनी जानी है !

शुभ कर्मों से पुण्य कमाते
पाप बांधते दुष्कर्मों से,
पुण्य सदा सुखकारी जग में
दुःख लाए पाप जीवन में !

इसी तरह तो क्रम सुख-दुःख का
जारी रहता जन्म-जन्म में,
हर्षित कभी, कभी पीड़ित हो
झेला करते पड़े भरम में !

टूटे कैसे चक्रव्यूह यह
मुक्त गगन में विहरें कैसे,
एक मार्ग पर चलते चलते
मंजिल को हम पालें कैसे !

कर दें सारे कर्म समर्पित
खाली खाली सा यह मन हो,
स्वयं को साक्षी भाव में रखें
फिर हो जाये जो होना हो !

हल्का मन उड़ान भरेगा
कर्म नहीं हमको बांधेगें,
नहीं बेड़ियाँ रोकेंगी फिर
मुक्त सदा विचरेंगे जग में !

अनिता निहालानी
जनवरी २०११