रविवार, जुलाई 12

भय

भय 


भयभीत मन
 कंपता है पीपल के पत्ते की तरह 
हर आशंका के हल्के से झोंके पर 
डोल जाती है उसकी आस्था भी 
भय हर लेता है 
सारी स्थिरता और सौंदर्य अंतर का 
एक सूक्ष्म विषाणु से डरी हुई है आज मानवता
जो प्राणघातक न भी होता 
पर भयाक्रांत मन 
रोक देता है ऊर्जा का प्रवाह अपने ही भीतर
उसकी मति जकड़ जाती है ज्यों 
सद्विचार का प्रवाह रुक जाता है 
बस एक ही विचार 
खोल बना लेता है चारों ओर
भय ही नाश करता है कुछ लोगों का 
विषाणु नहीं 
सम्भवतः वे खो जाते है बेहोशी या तन्द्रा में 
भय से बचने के लिए 
जैसे शुतुरमुर्ग गड़ा लेता है 
अपनी गर्दन रेत में 
महामारी कुछ को लेने आती है 
पर उसका भय अनेकों को ले जाता है ! 

गुरुवार, जुलाई 9

इक अनंत आकाश छुपा है

इक अनंत आकाश छुपा है 

इक अनंत आकाश छुपा है 
ऋतु बासन्ती बाट जोहती, 
अंतर की गहराई में ही 
छिपा सिंधु का अनुपम मोती !

दिल तक जाना है दिमाग से 
भाव जगे, छूटें उलझन से, 
कुशल-क्षेम का राग मिटे अब 
मुक्ति पा लें सभी अभाव से !

मिटे नहीं जब खुद से दूरी
दिखे आवरण, उलझा आशय,
उस अनाम में अटल प्रीत हो 
कदम-कदम पर मिले आश्रय ! 



मंगलवार, जुलाई 7

जिंदगी खुद राज अपने

जिंदगी खुद राज अपने 

व्यर्थ जो भी छूट जाये 
सार्थक हृदय को लुभाये, 
जिंदगी खुद राज अपने 
खोल मंजिल पर बिठाये !

बस यही इक प्रार्थना हो
मौन गीतों में गुजाएँ, 
चाह का हर बीज जलकर 
रिक्त हो मन गुनगुनाये !

जो तुम्हारी कामना हो 
हाथ से वह कर्म हो अब, 
जो नचाता था अभी तक 
हुक्म मन तेरा बजाए !

विमल गंगा बन बहा है 
ज्ञान गीता का कहा है, 
धर्म तुझसे पल रहा है 
सत्य का यह ध्वज बताये !

सोमवार, जुलाई 6

बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही

बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही 

हर कदम पर कौन हमसे पूछता है 
श्रेय का या प्रेय का तुम मार्ग लोगे, 
बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही 
प्रेय के पथ पर कदम रखते रहे हैं !

चन्द कदमों तक हैं राहें अति कोमल 
फूल खिलते और निर्झर भी बिखरते, 
किन्तु आगे राह टेढ़ी है कँटीली 
दिल हुए आहत जहाँ रोते रहे हैं !

फिर कहीं से इक जरा आवाज आती 
प्रेय का तज श्रेय का हम मार्ग लेते, 
झेलते दुश्वारियां थोड़ी शुरू  में 
चैन की फिर नींद हम सोते रहे हैं !

सत्य का पथ, प्रेम का पथ श्रेय का है 
आज दिल पर हाथ रखकर यह शपथ लें, 
प्रेय जो लगता नयन को छल निकलता 
पथ वही शुभ श्रेय ही जिसमें छुपा है !

रविवार, जुलाई 5

गुरू प्राकट्य सूर्य समान

गुरू  प्राकट्य सूर्य समान

गुरु की गाथा कही न जाये
शब्दों में सामर्थ्य कहाँ है,
पावन ज्योति, विमल चांदनी 
बिखरी उसके चरण जहाँ हैं !

गुरू  प्राकट्य सूर्य समान
अंधकार अंतर का मिटाए,
मनहर चाँद पूर्णिमा का है 
सौम्य भाव हृदय में जगाए !

सिर पर हाथ धरे जिसके वह
जन्मों का फल पल में पाता,
एक वचन भी अपना ले जो
जीने का सम्बल पा जाता  !

महिमा उसकी अति अपार है
बिन पूछे ही उत्तर देता,
सारे प्रश्न कहीं खो जाते
अन्तर्यामी सद्गुरु होता !

दूर रहें या निकट गुरू के
काल-देश से है अतीत वह,
क्षण भर में ही मिलन घट गया
गूंज रहा जो पुण्य गीत वह !

पावन हिम शिखरों सा लगता
शक्ति अटल आनंद स्रोत है,
नाद गूंजता या कण-कण में
सदा प्रदीप्त अखंड ज्योत है !

वही शब्द है अर्थ भी वही
भाव जगाए दूसरा कौन,
अपनी महिमा खुद ही जाने
वाणी हो जाती स्वयं मौन !

निर्झर कल-कल बहता है ज्यों
गुरू से सहज झरे है प्रीत,
डाली से सुवास ज्यों फैले
उससे उगता मधुर संगीत !

धरती सम वह धारे भीतर
ज्ञान मोती प्रेम भंडारे,
बहे अनिल सा कोने-कोने
सारे जग को पल में तारे  !

शनिवार, जुलाई 4

खेल कोई चल रहा ज्यों

खेल कोई चल रहा ज्यों 

विवश होकर आज मानव 
कैद घर में पूछता यह, 
कब कटेगी रात काली 
कब उजाला पायेगा वह ? 

उच्च शिखरों पर चढ़ी थी 
धूल धुसरित आज आशा, 
खेल कोई चल रहा ज्यों 
साँप-सीढ़ी की सी भाषा !

रज्जु को यदि सर्प माना
भय की दीवारें चुन ली, 
किन्तु ऐसा भी चलन है 
सर्प से ही आड़ बुन ली !

आज ऐसा ही समय है 
व्यर्थ सारा श्रम हुआ है, 
जहाँ पनपी आस्था थी 
भान होता भ्रम हुआ है !

सत्य को यदि ढूँढ पाए 
भूल से वह नहीं छिटके, 
राह अपनी जो चुनें फिर  
कदम ना उस डगर ठिठके !

शुक्रवार, जुलाई 3

द्रष्टा

द्रष्टा 

कवि द्रष्टा है 
उसने सत्य देखे हैं 
भुला देने दो सारे शास्त्र 
वह स्वयं शास्त्र है 
भुला देने तो सारा अतीत 
वह नया इतिहास रचेगा 
उससे झरते हैं शब्दों के झरने 
जहां से बनती है सृष्टि 
उसने चुना है वह 
जो कोई अन्य नहीं चुनता !
राही है वह अनजान राहों का 
अनसुलझे रहस्यों का 
बिना चढ़े ही नापी हैं उसने हिमालय की चोटियां 
रोया है उसका मन 
उस कृषक के साथ 
सुख गए हैं जिसके खेत 
वह मुस्काया है वर्षा की पहली बून्द पर 
उस तरह जैसे मुस्काये न कोई 
कोहिनूर मिलने पर !


गुरुवार, जुलाई 2

अस्तित्त्व और हम

अस्तित्त्व और हम 

सुकून झरता है 
उसी तरह...  जैसे जल 
हम उपेक्षा का छाता लगाए 
बच निकलते हैं 
काश ! अस्तित्व के साथ यूँ होता मिलन
जैसे टकराते हैं दो पात्र निकट आकर सहजता से 
और फ़ैल जाती है संगीत की स्वर लहरी !

मिलन तो निरन्तर घटेगा 
उसी से उपजे हैं 
उसी में रहेंगे.... 
इस मिलन से बह सकता है 
मधुर गीत 
या फूट सकती हैं ज्वालायें !

उसके साथ यदि टकराई  लहर 
जो सागर अनंत है 
तो खो जाएगी...
 चाहे तो लहराए उसके विशाल प्रांगण में 
संगीत गुंजाए.... नाचे 
सूर्य की किरणों में 
सतरँगी आभा बिखराये !

कभी निकल पड़े आकाश की यात्रा पर 
फिर बदली संग बरस जाए
मानसरोवर  या हिमालय शिखर पर
प्रकृति के साथ संघर्ष हुआ 
तो रोना ही होगा 
न जाना यह भेद तो 
हर युग में मानव को को-रोना ही होगा !

बुधवार, जुलाई 1

सूरज और चाँद

सूरज और चाँद 

‘वह’ सूरज है... 
भरी दोपहरी का 
 तपता  सूरज !
हमें चाँद की शीतल उजास ही सुहाती है  
 मुख फेर लेते हैं हम
उजाले से 
या हमारी आँखें मुंद जाती हैं !

तज प्रखर ज्योति  
 तज विस्तीर्ण गगन  
घूमता रहता मन अपनी ही गलियों में
मद्धिम ज्योत्स्ना 
ही मन को लुभाती है !

वहाँ कोई दूसरा नहीं 
यहाँ पूरा जगत है, 
वहाँ निस्तब्धता है 
यहाँ कोलाहल है !

कोई-कोई ही ‘उसका’
चाहने वाला 
मन का तो हर कोई रखवाला 
‘उसकी’ ही रौशनी प्रतिबिंबित करता  
फिर भी ‘उसके’ निकट जाने से डरता  
सूरज के उगते ही छिप जाता चाँद 
खो जाते  तारिकाओं के समूह 
वह एकक्षत्र स्वामी है नभ का 
नींद में छिप जाता है लेकिन 
 मन स्वप्न तो बुनता ही रहता  
‘उसका’ बल वहाँ नहीं चलता ! 



मंगलवार, जून 30

लिखे जो खत तुझे

लिखे जो खत तुझे 

हाथ से लिखे शब्द 
मात्र शब्द नहीं होते 
उनमें हृदय की संवेदना भी छिपी होती है 
मस्तिष्क की सूक्ष्म तंत्रिकाओं का कम्पन भी 
गहरा हो जाता है कभी कोई शब्द
कभी कोई हल्का 
कभी व्यक्त हो जाती है उनमें 
लिखने वाले की ख़ुशी 
कभी दर्द 
जो एक बूंद बन छलक जाये  
क्यों न हम फिर से लिख भेजें संदेश
स्वयं के गढ़े शब्दों से 
चाहे वे कितने ही अनगढ़ क्यों न हों 
न हो उनमें कोई दार्शनिकता या कोई सीख 
बस वे हमारे अपने हों 
क्यों न पुनः पत्र लिखें
 अपने हाथों से 
चाहे चन्द पंक्तियाँ ही
 कोरी, खालिस अपने मन से उपजी 
शुद्ध मोती की तरह पावन !


सोमवार, जून 29

तकनीक और प्रकृति

तकनीक और प्रकृति 

 रिश्ता निभाने का साधन मान लिया है 
मोबाइल को, आज की पीढ़ी ने 
न कागज की छुअन 
न कलम से दिल का हाल लिखना 
जिसमें सच्चाई झलकती थी 
मन कागज पर उतर जाता था 
उन शब्दों के साथ 
जो केवल और केवल 
उस व्यक्ति विशेष के लिए होते थे 
आज वे ही संदेश जो हजारों पढ़ चुके हैं 
जिनमें कोई सच्चाई नहीं है 
वे भेज दिए जाते हैं 
खोखले शब्द... जो उधार के हैं 
क्षण भर के लिए होता होगा शायद 
जिनका असर
अगले ही पल व्यर्थ हो जाते हैं  
हाँ, खोखले हो गए हैं आज रिश्ते 
क्योंकि व्यक्ति खाली है भीतर 
भावों में डूबना ही भूल गया है 
एक आभासी दुनिया में ही जीता है 
पर्दे पर चलती तस्वीरों को ही सच मानता
वास्तविक स्पर्श से भी वंचित कर दिया गया है 
प्रकृति से उसे यह दंड ही तो मिला है 
सिकुड़ गया है हर कोई अपने खोल में 
छोटे से यन्त्र में डूबा है 
न जाने किस की कमी पूर्ण करता है यह 
जो थमा दिया है बच्चों के हाथों में 
अब शिक्षा का साधन बना है 
नहीं, मानव का भविष्य इसमें नहीं है 
इसे हटाना होगा 
असली संवाद को लाना होगा 
और व्यक्त करना होगा प्रेम 
तब नहीं मरेंगे असमय 
अकाल मृत्यु से युवा और किशोर 
जो सूखी जाती है 
नहीं टूटेगी जीवन की वह डोर !


शनिवार, जून 27

व्यक्त-अव्यक्त


व्यक्त-अव्यक्त 

जीवन !
कितना सार्वजनिक हो गया है आज 
कितना खुला-खुला  
पर उतना ही ढकना पड़ता है उसे 
छिपाना पड़ता है 
जब कम उघड़ा था  
तब भीतर कम छिपा था 
यह नियम है 
पेड़ जितना ऊपर जायेगा 
उसकी जड़ें उतनी गहरी होंगी 
आज हम व्यक्त कर देते हैं 
जितनी आसानी से 
आभासी दुनिया पर प्रेम 
उतना ही छुपा रहता है भीतर अप्रेम 
जब प्रेम भी अव्यक्त रहता था 
तब कुछ छुपाने को कहाँ थी जगह 
तब भरा रहता था दिल उसी भाव से 
अब छलका फिरता है सरे राह 
तो भीतर भरने को जो भी मिलेगा 
भर जायेगा 
क्यों कि यहां नहीं रहता कभी शून्य 
उसमें कुछ न कुछ झर जायेगा !

शुक्रवार, जून 26

प्रकाश और अंधकार

प्रकाश और अंधकार 

अंधकार  की एक लम्बी श्रृंखला... 
प्रकाश मिल मिलकर भी खो जाता है, 
युगों से इस जगत रूपी सुरंग में चलते हुए 
निकास द्वार कहीं नजर नहीं आता है !

खुला आकाश निमन्त्रण देता 
धरा से पाँव बंधे हैं 
मुक्ति का गीत मन गाए भी 
पर, बंद पिंजरे में ही 
पंख फड़फड़ाता है !

‘मैं’ का होना ही अँधेरा 
‘तू’ ही प्रकाश पुंज घनेरा 
तेरे प्रकाश की ही छाया है यह जग
तुझसे ही जीवन पाता है !

अँधेरा भी प्रकाश के बल पर इतराता 
लुप्त होता पल में 
उसके आने पर
मन यही भेद ही तो बेखुदी में 
अक्सर भूल जाता है !

गुरुवार, जून 25

पुकार

पुकार 

यूँ तो हजारों खड़े हैं कतारों में 
उसके द्वार वही जाता है 
जिसे वह बुलाता है !
लाख प्रमाण दिए प्रह्लाद ने 
नास्तिक पिता नकारे जाता है !
जल को अधरों से लगाते हम हैं 
पर अपनी प्यास तो वही जगाता है !
सुरीले गीतों को सुन झूम उठती है दुनिया 
गाते वही आ कण्ठ में जिनके सुर समाता है 
चढ़ते हैं दूर शिखरों पर आरोही वे ही 
पर्वत जिन्हें अपने पास बुलाता है !
हाँ, यह बात और है कि 
पर्वतों के आमन्त्रण को स्वीकार करे 
ऐसा जिगर कोई-कोई ही पाता है !
यानि मंजिल बुलाये तब भी 
कुछ कदम नहीं बढ़ते 
कोई उसकी पुकार पर दौड़ा चला जाता है !
एक लेन-देन अनोखा चल रहा 
झोली सिली है जिसकी 
वह मेहर को समेटे जाता है !

बुधवार, जून 24

योगी

योगी 

प्रमाद की नींद पर 
कभी सुदिन खड़ा नहीं होता 
यह सही है, जब जाग जाए मन 
तभी उसके लिए सवेरा होता !

वे  विलग हैं,अनोखे हैं 
 स्वार्थ उन्हें नहीं चलाता
उनकी ऊर्जा का स्रोत अहंकार से नहीं 
परमात्मा से है आता !

भय से भाग खड़े हों
या क्रोध से करें सामना 
यह सामान्य जन करते होंगे 
विपदा आने पर, 
वे योगारूढ़ हो 
शांत मन से करते हैं मुकाबला 
भीतर ठहर कर !

न लाभ की चिंता है उन्हें 
लोभ नहीं डुलाता
निमित्त बने हैं किसी के, कर्ता वही है 
 उसका काम करना भाता !

ध्यान और समर्पण की गंगा 
जहाँ दिन-रात बहती है, 
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के पीछे 
तुरीया स्वतः ही रहस्य खोल देती है !
अँधेरे में जग जल रहा हो 
जब अज्ञान के हाथों 
ज्ञान की आँख ही उसको 
बचा सकती है !  

मंगलवार, जून 23

भाव और अभाव

भाव और अभाव
 
जो भी दुःख है...  अभाव से उपजा है 
जो भी इच्छा है...  उस अभाव को दूर करने की है 
जो भी कर्म है...  उस इच्छा को पूरा करने के लिए है 
समीकरण सीधा है 
अभाव का अनुभव ही कर्म में लगाता है 
 
सिर पर छत हो 
घर में दाने हों 
तन ढका हो 
तब तो गिर जायेगा अभाव ?
 
नहीं, मन एक नया अभाव उत्पन्न करेगा 
 
 सुंदर सन्तान हो 
 प्रिय का संग हो 
समाज में नाम हो 
तब तो मिट जायेगा न अभाव ?
 
नहीं, मन कुछ और अभाव जगा देगा 
 
बैंक में नामा हो 
तन भी स्वस्थ हो 
सुख का हर साधन हो 
तब ? 
 नहीं, अभाव उत्पन्न करना ही मन का स्वभाव है 
 
और जीवन के अंतिम क्षण तक 
उसे पूरा करते रहना मानव की विवशता 
जब तक वह यह जान न ले 
कि अधूरा मन नहीं वास्तव में 
वह पूर्ण है ! 
 
तब हर कर्म पूर्णता से उपजेगा 
वही होगा कृष्ण का निष्काम कर्म 
जो अभाव से नहीं भाव से होता है आयास
बाँधता नहीं बाँटता है जग में निज सुवास ! 

सोमवार, जून 22

घटे जागरण

घटे जागरण 

कंस ने द्वेष किया कृष्ण से 
फिर उसी को मन में बसाया 
जिस पर भी रोष किया मानव ने 
अंतर को उसी का घर बनाया !
जिस मन की गहराई में 
सारा ब्रह्मांड बसता है 
पादप, पंछी, पशु, गोलोक तक का विस्तार है 
चाहे यदि जो अनंत की 
उड़ान भर सकता है 
वह व्यर्थ ही क्या नहीं 
छोटा सा अहंकार लिए फिरता है !
एक सूक्ष्म विषाणु जिसका अस्त्र बना 
संहारक है जो बढ़ते हुए लोभ का 
जग को गहरी नींद से जगाया है 
प्रकृति पर होते अत्याचार 
के प्रति चेताया है 
गणेश को पूजने वाला समाज 
बना है हाथी का हत्यारा 
बेदखल कर पशुओं को 
उनके आश्रयों को हथिया लिया 
किया गया है विवश भीतर झाँकने को 
यदि जीवन ही न रहा तो 
क्या रह जायेगा उसे मांगने को !
सुख आशा और दुःख निराशा में 
कोई चुनाव नहीं है यहाँ 
एक के साथ दूजा बिन मांगे चला आता 
काश ! यह अटूट सत्य नजर आ जाता ! 


रविवार, जून 21

योग तभी घटता जीवन में


योग तभी घटता जीवन में 



टुकड़ा-टुकड़ा मन बिखरा जो 
जुड़ जाता जब हुआ समर्पित 
योग तभी घटता जीवन में 
सुख-दुःख दोनों होते अर्पित ! 

योगारुढ़ हो युद्ध करो तुम 
कहा कृष्ण ने था अर्जुन को, 
जीवन भी जब युद्ध बना हो 
योगी हर मानव क्यों ना हो ? 

योगी का मन एक शिला सा 
दुई में जीता है संसार, 
मंजिल एक, एक ही रस्ता 
लेकर जाए योग भव पार !

देह की हर वेदना जाने 
मन के स्पंदन को भी पढ़ता,
योगी कुशल कर्म में होकर 
हुआ साक्षी निज में रहता !

नित्य-अनित्य का संज्ञान है 
सुख के पीछे दुःख को लख ले, 
मैत्री, करुणा, मुदिता आदि  
अंतर के कण-कण में भर ले !




शनिवार, जून 20

हानि-लाभ

हानि-लाभ 

कदाचित हर इच्छा लोभ से उपजती है 
हर भय हानि की आशंका से 
सुख की आशा ही लोभ है 
दुःख का दंश ही भय है !

कुछ और मिल जाये 
कहीं कुछ खो न जाये 
इन दो तटों के मध्य ही 
बहती है जीवन सरिता !

योगक्षेम का ख्याल रखा जायेगा 
कृष्ण का यह आश्वासन भी काम नहीं आता 
वरना दुनिया में इतना संघर्ष बढ़ता नहीं जाता !

कुछ लोग उतरे हैं सड़कों पर कुछ पाने को 
रत हैं कुछ दूसरों के भय को भुनाने को !

कोरोना की सुरसा सी बढ़ती भूख को 
समझदारी ही शांत कर सकती है 
जीवन यदि प्रिय है तो 
 परिवर्तन की धारा ही जिला सकती है 
चिकित्सक भी उतना ही मानव है 
जीवन दे नहीं दे सकता 
अपने ही हाथों में है भविष्य 
ऐसे मोड़ पर खड़ी है सभ्यता !

शुक्रवार, जून 19

सच की तलाश


सच की तलाश 

सच है खाली आकाश सा... 
शून्य !
तभी उसे भरा जा सकता है झूठ अथवा मिथ्या से 
जैसे नींद में जब सब खो जाता है मन से 
तो स्वप्न उसे भर देते हैं 
जो मिथ्या होते हुए भी 
देते हैं सच का आभास !

सच कोरे कागज सा है 
जिस पर शब्दों को अंकित करें तो 
पढ़ना होता है खाली जगह में 
दो शब्दों के मध्य सच को !

संगीत के स्वरों में जो अंतराल है 
जिसका कोई उत्तर नहीं 
सच ऐसा सवाल है !

 बिखरा है चहुँ ओर
पर उसे महसूस करना हो तो 
मिथ्या का साधन चाहिए 
जहाँ से तीर चलाती है माया 
उस इच्छा का कारण भी !

 दीवारें उठ गयी हों 
कितनी ही ऊँची 
सच को बाँध नहीं पातीं 
झांकता रहता है हर दरार से सच 
बस उस ओर नजर नहीं जाती ! 


गुरुवार, जून 18

तू और मैं

तू और मैं 


जैसे कड़ी से कड़ी जुड़ी है इस तरह 
कि कोई जोड़ नजर नहीं आता 
‘तू’ जुड़ा है’मैं’ से उसे भेद जरा नहीं भाता 
‘मैं’ को यह ज्ञात नहीं 
 निज संसार बसाता है
सृष्टि के अहर्निश गूँजते संगीत में 
अपनी ढपली अपना राग सुनाता है 
कभी सुर मिल जाते हैं संयोग से तो 
फूला नहीं समाता
जब बेसुरा लगता है संगीत तो 
अश्रु बहाता है 
  भुला जड़ें गगन में फूल खिलाता है 
 तज भाव तर्क में प्रवीण हुआ जाता है 
 हो सकती है पृथक सुरभि पुष्प से ?
तपन अगन से या किरण सूर्य से ?
पर ‘मैं’ असंभव को संभव कर दिखाना चाहता है !

मंगलवार, जून 16

अनगाया यदि रहा गीत

अनगाया यदि रहा गीत 


अनगाया यदि रहा गीत जो 
गाने आये थे हम भू पर, 
खिला नहीं यदि सरसिज उर में 
मिले नहीं उड़ने को दो पर !

मधुऋतु अगर न मन में उतरी 
फूटी नहीं हृदय की गागर, 
सूना रहा घाट उर सर का 
मन्दिर के द्वारे तक जाकर !

अंतर में यदि नहीं लालसा 
चाह नहीं यदि जगी मिलन की,
कैसे कारागार खुलेगा 
कैसे गूँजेंगे अनहद स्वर !

रविवार, जून 14

तेरा आना

तेरा आना 

तू देता है तो दिए ही चला जाता है 
बह जाते हैं सारे  द्वंद्व जिसमें 
खो जाते हैं भेद सभी 
गिर जाती हैं दीवारें 
तू बरसता है तो बरसे ही चला जाता है 
धुल जाती है धूल मन के दर्पण से 
स्वच्छ हो जाती है दृष्टि 
उग आते हैं कोमल अंकुर 
उगता है केवल देने का भाव 
मिट जाते हैं सारे अभाव 
तेरा आना किसी बदली की तरह नहीं होता 
आच्छादित हो जाता है सारा नभ क्षितिजों तक 
तेरा आना हवा के किसी झोंके की तरह नहीं होता 
छा जाती है मधुऋतु 
तेरा आना किसी महाआकाश के आंगन में उतर जाने सा है 
किसी सागर के दिल में समाने सा है 
तू सुहृद बनकर साथ चलता है 
तेरे साये में ही हर दिल का कमल खिलता है !

गुरुवार, जून 11

श्रद्धा सुमन

श्रद्धा सुमन 

एक ही शक्ति एक ही भक्ति 
एक ही मुक्ति एक ही युक्ति 
एक सिवा नहीं दूजा कोई 
एकै जाने परम सुख होई

तुझ एक से ही सब उपजा है 
यह जानकर हमें पहले तृप्त होना है भीतर 
फिर द्वैत के जगत में आ 
आँख भर जगत को देखना है 
हर घटना के पीछे तू ही है 
हर व्यक्ति के पीछे तेरी अभिव्यक्ति 
हर वस्तु की गहराई में तेरी ही सत्ता है 
यह जानकर झर जाती हैं 
कामनाएं हृदय वृक्ष से 
सूखे पत्तों की तरह 
और फूटने लगती हैं नव कोंपलें 
श्रद्धा का पुष्प खिलता है 
नेह का पराग झरता है 
अनुराग की सुवास उड़ती है 
जो जरूर पहुँचती होगी तुझ तक !

मंगलवार, जून 9

का मना ?

का मना ?

क्या है मन में 
दो ही तो हैं यहाँ
एक ‘मैं’ दूजा ‘तू’
 ‘मैं’ है, तो यही कामना है  
अर्थात बंधन
 यदि ‘तू’ है तो मुक्ति !

‘मैं’  किसी का बचता नहीं 
‘तू’ कभी मिटता नहीं 
‘मैं’ लहर है ‘तू’ सागर है 
‘मैं’ किरण है ‘तू’ दिनकर है 
‘मैं’ युक्त है तुझसे पर जानता नहीं 
‘मैं’ कुछ नहीं ‘तू’ के बिना पर मानता नहीं 
‘मैं’ अँधेरा है ‘तू’ ज्योति है 
‘मैं’ दुई है ‘तू’ एकता है 
‘मैं’ मरे तो ‘तू’ हो जाता है 
‘तू’ रहे तो ‘मैं’ खो जाता है 

दो ही तो हैं वहाँ 
एक माया दूजा हरि 
माया ‘मैं’ को नचाती है 
हरि माया को छवाते हैं 
माया को हटा दो तो 
हरि सम्मुख आते हैं 
भक्त यह राज समझ जाते हैं 
उन्हें एक ही नजर आता है 
ज्ञानी यह भेद खोल देते हैं 
हरि उनका ‘मैं’ ही बन जाता है 

दो ही तो हैं जीवन में 
एक उत्सव दूजा संघर्ष 
जीवन एक उत्सव है जब ‘तू’ बड़ा है 
संघर्ष है जब ‘मैं’ खड़ा है 
जीवन एक लीला है 
जब माया की धुंध छंट जाती है 
एक पहेली है जब तक कामना सताती है 
कामना से अमना होने की यात्रा है साधना 
भावना से निरन्तर सुख पाना ही भक्ति ! 

सोमवार, जून 8

चमत्कार

चमत्कार 


कृष्ण की कथा चमत्कारों से भरी है !
पर हमारी कथा भी उनसे रिक्त है कहाँ ?
कौन करता रहा
सदा विपदाओं में सुरक्षा 
किसने संयोग रचे, जो मन के मीत मिले 
किसके इशारे पर, अंतर कमल खिले !

कौन खुद की राह पर लिए जाता है 
यह जीवन भी चमत्कार से कम नहीं 
जहाँ कोई ठान ले खुश रहना तो 
उसके लिए कोई गम नहीं रह जाता है !

यहाँ बाहर जल गंगा.. भीतर वाक् गंगा
 अनवरत रहती है 
कभी चुप हो जाता मन तो जान लेता 
भीतर प्रेम धारा बहती है
जिसकी मधुर ध्वनि को बाद में वाणी 
अनुवादित करती  
प्रकृति एक नियम से चलती 
यह सृष्टि अनादि काल से 
ऐसे ही बनती-बिगड़ती है !


शनिवार, जून 6

वाणी

वाणी 


वाणी का वरदान मिला है 
मानव को !
पर अभिशाप बना लेता है 
व्यर्थ, असत्य, कटु वचनों से 
निज खाते पाप लिखा लेता है 
लहजे में यदि  छिपी शिकायत 
स्वयं की कमजोरी ही झलके  
या तेजी हो शब्दों में तो 
मन की अस्थिरता ज्यों ढलके 
रोषपूर्ण यदि वचन निकलते 
अहंकार का खेल चल रहा 
घुमा-फिरा कर बात कही तो 
मन अनजाना खुद को छल रहा 
स्वयं की राय थोपने जाता 
मन खुद उसमें धँसता जाता 
जब तक दर्पण नहीं बनेगा 
जग जैसा है उसमें आखिर 
कैसे वैसा ही झलकेगा ? 

शुक्रवार, जून 5

मन और दुनिया

मन और दुनिया 

दुनिया वही है 
पर हर पल नयी है 
मन वही है 
पर चेतना नयी है 
क्षण-क्षण कुछ बढ़ती हुई 
मन अहंकार पर पलता है 
कंस और रावण की तरह आज भी जलता है 
दुनिया आज भी अन्याय, अशिक्षा, 
भय और गरीबी से जूझ रही है 
साथ ही हर पल पुराना कुछ झरता 
और नवीन उभर आता है 
जो जानता है वह द्रष्टा 
कभी पुराना नहीं होता 
वह कुछ भी नहीं है 
जो हो तो घटे या बढ़े 
मन हिसाब लगाता है
आत्मा आप्तकाम है 
वह भी ‘न होना’ जानती है 
सो सदा सन्तुष्ट है 
दुनिया आनी-जानी है  
पर बड़ी मानी है 
जो कहीं जाये न आये 
वह अनामी है ! 

गुरुवार, जून 4

सार सार को गहि रहे

सार सार को गहि रहे 


‘साधना’ में छुपी है धन की परिभाषा 
धन वही है जो पार लगाए 
वह नहीं जो रखा रह जाये 
जो सारयुक्त है 
वही धन है 
उसे ही साधना है 
हंस की तरह जो विवेक धरे 
उस मन में जगती भावना है 
भावना जो भर देती है शांति और प्रेम से 
जो आनंद की लहर उठाती है 
व्यर्थ जब हट जाता है प्रस्तर से 
तो सुंदर मूरत उभर आती है 
क्यों हम व्यर्थ ही दुःख के भागी बनें 
कंकड़ों-पत्थरों के रागी बनें 
जब एक हीरा सामने जगमगाता है 
तब क्यों सूना दिल कसमसाता है 
मुद्दे की बात ‘एक’ ही है
जिसका जिक्र किताबों में है 
शेष सब तो उसी की व्याख्या है 
इस ‘एक’ का जो ध्यान लगाता है दिल में 
जाग जाती उसकी प्रज्ञा है ! 

मंगलवार, जून 2

आह्वान

आह्वान 


चलो सँवारें गाँव देश को 
सूखे पत्ते जरा बुहारें
भूलों के जो बने खंडहर
उन्हें गिराकर
या भावी की आशंकाएँ 
जो घास-फूस सी उग आयी हैं 
उन्हें हटाकर 
सूरज को फिर दे आमन्त्रण 
वर्तमान के इस शुभ पल में  
फूल खिला दें 
ग्राम्य देवता धीरे से आ 
कर कमलों से उन्हें हिला दें 
सुखद स्मृति कोई पावन 
बहे यहाँ फिर शुभ यमुना बन 
तट पर जिसके बजे बाँसुरी
हँसे कन्हैया का वृंदावन 
चलो पुकारें, दे आमन्त्रण 
हर शुभता को 
उगे हुए झंखाड़ उखाड़ें 
आशंका की यदि बदलियां 
छायीं मन पर 
बह जाने दें झरते जल को 
भीग उठे श्यामल धरती का 
हर इक रज कण !

सोमवार, जून 1

एक जागरण ऐसा भी हो


एक जागरण ऐसा भी हो 

संसार के होने का यही ढंग है 
यहाँ कहीं विषाद कहीं उमंग है 
चिताएँ जलती हैं जहाँ 
निकट ही उत्सव मनता है 
देखे इस दुनिया के विचित्र रंग हैं 
यहाँ चढ़ते सूरज को ही 
सब प्रणाम करते हैं 
कन्धों पर बिठा विजयी की ही 
यहाँ जय जयकार होती 
जिसे खड़ा होने को चाहिए सहारा 
उस पराजित को सब अस्वीकार करते हैं 
समर्थ खड़े होते हैं समर्थों के साथ 
केवल एक वही कहलाते हैं दीनों के नाथ 
पर उन तक पहुँच कहाँ है असमर्थों की 
वे अपने ही अभावों में डूब  रहे हैं दिन-रात !
परमात्मा के होने का ढंग ही निराला है 
संकल्प मात्र से उसने 
यह सारा आयोजन रच डाला है 
उसकी रीत देने की है वह यही सिखाता है 
उसका सान्निध्य पाकर मीरा नाचती 
कोई कबीर गाता है 
वह हमें देता है, उसके बन्दों के बहाने 
हम उसे लौटाते हैं 
प्रीत का खेल लेन-देन का खेल है 
यहाँ एक्य अनुभव करना  
दो का ही मेल है 
वहाँ बटोरने की चाह है 
यह लुटाने की राह है 
वहाँ ज्ञानी बनने में सुख है 
यहाँ अबोधता न होना ही दुःख है 


रविवार, मई 31

हर अनुभव का इक फूल बना लें !


हर अनुभव का इक फूल बना लें !

जीवन में जो भी घटता है 
हर अनुभव का इक फूल बना लें !
छोटे-छोटे इन फूलों को 
गूँथ सत्य की 
इक वैजयंती माल बना लें !
घटना बाहर-बाहर रहती 
अनुभूति अंतर में होती 
रोज-रोज नए सत्यों से 
करें सामना 
मन के भीतर इन सत्यों को ढाल बना लें !
गिर जाये हर मूढ़ मान्यता 
हो भीतर का हर कोना जगमग
जो जगीं अचानक उद्धघाटन से 
किसी सत्य के 
उन मुस्कानों का हार बना लें !
सुख जो बरबस बरस रहा 
उस महाकोष  से 
उसके आने में जो बाधा
है असत्य की, उसे गिरा दें 
बहे निरन्तर अनुपम सच वह 
गंगा की इक धार बना लें !
चट्टानों में अहंकार की 
दबा हुआ जो 
प्रकट हो सके 
कल- कल, छल-छल 
इक धारा में 
सच वह कोमल 
कितना निर्मल 
नीलकमल की पाँखुरियों सा 
सुंदर इक उपहार बना लें !



शनिवार, मई 30

जन्मदिन की कविता

जन्मदिन की कविता 


हे अनाम ! तुझे प्रणाम 
जाने किस युग में आरम्भ हुई होगी यह यात्रा 
या अनादि है यह भी तेरी तरह 
कभी पत्थर, पौधा, जलचर, नभचर या थलचर बनते-बनते 
 मिला होगा अन्ततः यह मानव तन 
फिर इस तन की यात्रा में भी 
कभी राजा, कभी रंक 
कभी स्त्री कभी पुरुष 
कभी अशिक्षित कभी विद्वान् 
अनेक धर्मों, आश्रमों, वर्णों 
में लिए होंगे जन्म 
गढ़ते-गढ़ते इतने काल से 
इतने दीर्घ कालखण्ड में 
आज जो बन गया है मन  
वह जानता है कि
अब मंजिल निकट है 
देख लिए सारे खेल 
देख ली तेरी माया 
यकीनन इसने बहुत लुभाया 
नाजुक रिश्तों के मजबूत बन्धनों में बाँधा 
सुख-दुःख के हाथों से बहुत राँधा
अहंकार की भट्टी में तपाया 
कल्पनाओं के झूले में झुलाया 
पर अब जाकर तेरा मर्म कुछ-कुछ समझ में आने लगा है 
अब खत्म हुई यह दौड़ 
अब घर याद आने लगा है 
जन्म-मृत्यु के इस चक्र से जब कोई छूट जाता है 
फिर जब मौज होगी तो फिर आता है 
पर तब कैदी नहीं होता प्रारब्ध का 
तेरी तरह बस
 मुस्कानें बिखेरता और गीत गाता है !

शुक्रवार, मई 29

चाह -अचाह

चाह -अचाह 

‘वह’ क्या चाहता है 
‘वह’ चाहता भी है क्या ?
जब तक चाह शेष है भीतर 
तब तक ‘वह’ है नहीं 
‘वह’ सन्तुष्ट है अपने होने मात्र से 
जैसे कोई फूल क्या चाहता है 
वह बस होता है 
शेष सब घटता है उसके आसपास 
न भी घटे तो होता नहीं उसकी तरफ से 
थोड़ा सा भी प्रयास 
लोग ठिठकते हैं पल भर को उसे निहार 
भँवरे गीत सुनाते हैं
तितलियाँ तृप्त होती हैं पराग से 
वह किसी घड़ी चुपचाप झर जाता है !

गुरुवार, मई 28

शिशु भाव में कोई मानव

शिशु भाव में कोई मानव


नन्हा शिशु निःशंक हो जाता 
माँ के आँचल में आते ही ! 

जब से उसने आँखें खोलीं 
सम्मुख उसे खड़ा ही पाया,
साधन बनी मिलन का जग से
सब से परिचय था करवाया !

बालक यदि सदा शिशुभाव में 
माँ का आश्रय लेकर रहता, 
व्यर्थ अनेकों उपद्रवों से
खुद को सदा बचाये रखता !

किन्तु उसका यह अबोध मन 
माँ से भी विद्रोह करेगा, 
जिसने उसको जन्माया है 
उस जननी पर क्रोध करेगा !

जिसने सदा ही सुहित चाहा  
उसकी आज्ञा ठुकरायेगा, 
निश्च्छल निर्मल प्रेम को उसके 
समझ देर से ही पायेगा !

चाहे कितनी देर हुई हो 
माँ का दिल प्रतीक्षा करता,
परमात्मा का प्रेम वहीं तो 
सहज विशुद्ध रूप में बसता !

शिशु भाव में कोई मानव 
जब मन्दिर के द्वारे जाता 
सदा भवधरण की बाँहों का 
खुला निमंत्रण वह पा जाता !



बुधवार, मई 27

लहरों से थपकी देता है

लहरों से थपकी देता है 


कोई सुख का सागर बनकर 
लहरों से थपकी देता है, 
हौले-हौले से नौका को 
मंजिल की झलकी देता है !

बरसे जाता दिवस रात्रि वह 
मेघा लेकिन नजर न आये, 
टप टप टिप टिप के मद्धिम स्वर 
मानो दूर कहीं गुंजाये !

कोई ओढ़ा देता कोमल 
प्रज्ज्वलित आभा का आवरण, 
सुमिरन अपना आप दिलाता 
पलकों में भर दे सुजागरण !

सूक्ष्म पवन से और गगन से 
नहीं पकड़ में समाता भाव, 
होकर भी ज्यों नहीं हुआ है 
हरे लेता है सभी अभाव !

जाने कैसी कला जानता
भावों से मन माटी भीगे, 
धड़कन उर की राग सुनाये 
भरे श्वास में सुरभि कहीं से !

मंगलवार, मई 26

जब

जब
जब चुक जाती हैं संवेदनाएं सिकुड़ जाती है आत्मा आत्मकेंद्रित हो जाता है प्रेम दुःख का असली क्षण वही होता है ! होता है ये सब भी किसी पीड़ा के कारण पर वह पीड़ा किसी निजी दुःख की परिणति है अपने-अपने अंधेरों से घिरे हम अपने खोलों में सिमट जाते हैं ! जब आशा की उम्मीद लगाए जगत हमारी ओर तकता है हम अपने ही दुखों के बोझ तले दबे रहते हैं ! जगत जब फेर लेता हैं आँखें तो हमें ज्ञात होता है निज पीड़ा में कर्त्तव्यों को भुलाना हम अपना अधिकार समझते हैं तब किसी की जरा सी भी अपेक्षा को दिल पर भार समझते हैं किन्तु सीमित हो जाती चेतना के रूप में एक अभिशाप भी ढोते हैं प्रेम जो वरदान के रूप में मिला है उसे ही खोते हैं ! बिन बंटा पदार्थ शेष रह जाता होगा पर बिन बंटी ऊर्जा बिखर ही जाती है प्रेम न बन सकी तो उदासी बन कर दूर अंतरिक्ष में खो जाती है !