सोमवार, अक्तूबर 31

निजता में उसको पा जाये


निजता में उसको पा जाये

धन कमाता चैन गंवा कर
चैन कमाता धन गंवाकर,
कैसा अद्भुत प्राणी मानव
रह जाते दोनों खाली कर !

श्वास श्वास में भर सकता था
बड़े परिश्रम से वह पाता,
सहज ही था जो मिला हुआ
दुगना श्रम कर उसे मिटाता !

खेल समझ के जीवन कोई
मोल कौडियों बेच रहा है,
मुँह लटकाए बोझ उठाये
दूजा पीड़ा झेल रहा है !

कहीं हो रही भूल है भारी
निज पैरों पर चले है आरी
तज हीरे कंकर घर लाते
करें अँधेरे की तैयारी !

भीतर जो चल रहा युद्ध है
भाग रहा है उससे मानव,
धन, यश एक बहाना ही है
बचने का भीतर जो दानव !  

खुले आँख तो भ्रम मिट जाये
उत्सव जीवन में छा जाये,
ढूँढ रहा जो मानव जग में
निजता में उसको पा जाये !


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शुक्रवार, अक्तूबर 28

कहाँ मिलेंगे कोमल रिश्ते


कहाँ मिलेंगे कोमल रिश्ते  

दीवाली अभी गयी नहीं है
भाई दूज  है याद दिलाता,
बहना के अंतर में निर्मल
स्नेह की पावन धार बहाता !

पुलक जगी कैसी भीतर जब
फोन की घंटी थी खनकाई,
कानों में भाई-भाभी की
प्रीत भरी जब ध्वनि सुनाई !

हफ्तों पहले भेज दिया था
बहुत सहेज के अक्षत-केसर,
मुहं मीठा करने को बांधा
छोटी सी पुडिया में शक्कर !

सदा सुखी हो प्रियजनों सँग 
यही दुआ मन आज दे रहा,
सहज हृदय की गहराई से
सबके हेतु यही कह रहा !

स्नेह ही है जीवन की थाती
दिल में इसे समाये रहते,
जग में सब कुछ मिल सकता है
कहाँ मिलेंगे कोमल रिश्ते !
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गुरुवार, अक्तूबर 27

समुन्दर...नाव...बदली..


समुन्दर...नाव...बदली...

पूछोगे नहीं
क्यों मौन रुचा
क्यों न फूटे बोल, न तुमसे बोली
नहीं चाहती बनना नाव, न ही बदली
मेरा वही समुन्दर दे दो
मै लहराती, गाती नदिया
मैं चलती-चलती ही जाती
तुम बने समुन्दर,  मुझको लेकर
मैं एक भावना, पूर्ण याचना
स्वप्नों के पंख लगाये
गाती भावलोक में सुंदर
तुम कहते फिर
स्वप्न असत्य
आँखें आँसू, आँसू आँखें
फिर कैसे मैं तुमसे बोलूं
तोड़ा तुमने घर माटी का
बादल बन भिगो दिया मन
 गात भी मेरा
फिर क्यों ऐसी नींद सुलाया
बहा ले गए गाँव सारा एक रात्रि में
उसी गाँव को.....उस गोकुल को...
स्वप्न बसा जिसका आँखों में...


 

मंगलवार, अक्तूबर 25

शुभ दीपावली


जब अंतरदीप नहीं बाले 

  
पूर्ण हुआ वनवास राम का, सँग सीता के लौट रहे हैं
अचरज हुआ लक्ष्मण को लख, द्वार अवध के नहीं खुले हैं !

अब क्योंकर उत्सव यह हो, दीपमालिका नृत्य करे,
रात अमावस की दमके, मंगल बन्दनवार सजे ! 

हमने भी तो द्वार दिलों के, कर दिये बंद ताले डाले
राम हमारे निर्वासित हैं, जब अंतरदीप नहीं बाले !

राम विवेक, प्रीत सीता है, दोनों का तो मोल नहीं
शोर, धुआँ ही नहीं दीवाली, जब सच का कोई बोल नहीं !

धूम-धड़ाका, जुआ, तमाशा, उत्सव का न करें सम्मान
पीड़ित, दूषित वातावरण है,  देव संस्कृति का अपमान !

जलें दीप जगमग हर मग हो, अव्यक्त ईश का भान रहे
मधुर भोज, पकवान परोसें, मनअंतर में रसधार बहे !
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रविवार, अक्तूबर 23

आखिर क्यों


आखिर क्यों

चहकते पंछी की तरह हम आकाश को
अपनी बाँहों में चाहते भरना
हवा के तेज झोंके से ढह गए
रेत के घरौंदे की मानिंद
टूट जाते ऊंचाई के परिमाण
जाते साथ छोड़ आस्था के आयाम
होता नहीं विश्वास ताश का महल
न ही पुल कच्चे धागे का
किन्तु चाहे जो होना स्वयं विश्वास...
चाहे जो आकाश... चाहे जो सागर ...

उगते सूरज को देख देख मुस्काते हम
क्यों रह जाते हैं एकाकी
लख फूलों को टहनियों से झूलते
हजार आँखों से देखते दुनिया
हरि घास की मखमली चादर पर
साथ छोड़ देती क्यों मुस्कान अचानक
दिशाएं क्यों पूछती सी लगती सवाल
हम नासमझ बच्चे से चुपचाप
खड़े रह जाते...
सहने कोई तीखा दंश अध्यापक का, ज्यों बालक

देख नीलवर्णी निर्मल वितान को 
चुप हो जाते गाँव के गाँव
टेरते चुप आवाजों में वे गायों को
चुप हो जाता मन भी किसे टेरता
शीतल माटी पर पांव टिकाए
खड़े रहना क्यों भला लगता मन को...
चहकते पंछी की तरह चाहते हम आकाश को....



शुक्रवार, अक्तूबर 21

दादी ! प्यारी दादी


दादी ! प्यारी दादी

मेरे बचपन की मधुर यादों में एक याद यह भी है, मेरे द्वारा अपनी दादीजी को रामायण (रामचरितमानस) पढ़कर सुनाना. भगवान राम पर उनकी पूरी आस्था थी. पहले दीदी से फिर मुझसे रामायण सुनती थीं. हमारे जाने के बाद छोटी भाभी से सुना करती थीं. आज सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है, मैं उस समय कितना सत्य मानती थी इस कथा को और दादीजी वह तो पूरी डूब जातीं थीं. पर उनके लिये शायद सत्य-असत्य का प्रश्न ही नहीं था, वह समर्पित थीं इस भावना को कि भगवान की कथा को सुनने से बढ़कर कोई पुण्य नहीं. मैं पढ़ती जाती थी, पढ़ती जाती थी और कई बार तो जब काफ़ी छोटी थी तो पढ़ा हुआ एक भी शब्द समझ में नहीं आता था. फिर मैं पेज गिनती और दादी जी कहतीं, बस.. अब तुम थक गयी होगी.

दशहरे के दिन या उससे कुछ दिन पूर्व हम लंका कांड पढ़ना शुरू करते. दशहरे के दिन रावण की मृत्यु का वर्णन सुनाती तो उनकी आँखों में, नहीं उनकी आँखों में विश्वास नहीं दिखाई देता था बस वह संतुष्ट लगती थीं. उनकी एक आँख तो बचपन में ही चेचक के कारण जाती रही थी, दूसरी की रोशनी भी घटती जा रही थी. सहारनपुर के निकट  चमारीखेडा आंखों के अस्पताल में, जहाँ मैं अपने पिता के साथ साईकिल पर बैठकर उन्हें देखने गयी थी, २२ किमी० की वह यात्रा और जीवन में पहली और अंतिम बार गाँव में एक रात बिताने का अवसर आज तक याद है. सुबह-सुबह रहट पर जाकर हाथ मुँह धोया था. बाद में भवानी अस्पताल में  तथा सीतापुर में भी उनकी आँखों का इलाज कराने की कोशिश तो की गई थी पर सफलता नही मिली.

मै जब कॉलेज में पहुँच गयी तो लगता था कि अब रामायण पढ़कर सुनाऊं तो पहले जैसी बात नहीं रहेगी, जबकि तब मैं पहले से कहीं अच्छी तरह समझ सकती थी या समझा सकती थी. पर एक तो तब समय नहीं मिलता, कभी उनसे मिलने भी जाती तो यह याद ही नहीं रहता और दादीजी भी कभी नहीं कहती थीं. फिर विवाह के बाद तो उनसे मिलना साल में या दो साल में एक बार होता था. वह जैसे जैसे वृद्ध होती जा रही थीं आँखें बिल्कुल ही नहीं देख पाती थीं, उनकी मृत्यु भी इसी कारण हुई, आज उनकी बहुत सी यादें स्मृति पटल पर दस्तक दे रही हैं. कल रात बरसों बाद उन्हें स्वप्न में देखा. हम जिन पूर्वजों के कारण इस दुनिया में आते हैं उन्हें ही भूल जाते हैं, हमारी स्मृति बहुत अल्प है.
दादीजी हमें बताती थीं कि जब उनकी शादी हुई तो उनकी सासूजी उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हें कोई भी एक काम में लगाने के बाद जल्दी ही दूसरा काम बता देतीं थी, जैसे कि वह आटा गूँथ रही हैं तो उन्हें कहती जा एक गिलास पानी ले आ. वह आटा गूँथना छोड़ कर फौरन पानी देने पहुंच जाती. उनका कहना था कि वह कभी किसी काम के लिए न नही करतीं थीं, उनकी सासूजी का पूरा नियंत्रण था उन पर.

दादीजी हमें कहानियाँ भी सुनाती थीं, दया करने वाली चिड़ियों और एहसान फरामोश चुहियों की कहानी. एक राजा और और उसकी सात रानियों की कहानी. एक अनार सौ बीमार वाली कहानी भी सुनाती थीं, हर मंगलवार को  हनुमान चालीसा भी मुझसे सुनती थीं.

यह भी उनके बारे में सुना था कि उन्हें बाहर जाने के लिए कपड़े बदलने में जरा भी आलस्य नहीं आता था, भले ही दिन में तीन चार बार कपड़े क्यों न बदलने पड़ें. और बिना ढंग के कपड़े पहने वह कभी बाहर नही निकलती थीं. आटे के बिस्किट, गली की खुली बेकरी से अपने सामने बनवा के लाती  थीं. उन बिस्कुटों का स्वाद अभी तक किसी ब्रांड के बिस्किट्स में नही आया.

दीदी ने बताया कि बचपन में मथूरो चाचीजी की बेटी लक्ष्मी के घर श्राद्ध का खाना हम बच्चे लेकर नुमाइश कैम्प स्थित उनके घर जाते थे. हलवा, पूड़ी, खीर एक बड़े से टिफिन में भर कर, एक बार हम नुमाइश कैम्प से आते समय थोड़ा दूसरे रास्तों से घूमते हुए घर देर से वापिस आये तो दादीजी ने समझाया कि लडकियां ऐसे इधर उधर नही भटकतीं, सीधे रस्ते से घर आना चाहिए.

मन की आँखो के सामने उनकी तस्वीर चूल्हे में लकडियाँ जलाने के लिए फूंकते हुए आती है या फिर राख से बर्तन साफ़ करते हुए या रामायण सुनते हुए. मुझे उनका अहोई के त्यौहार के दिन बच्चों को एक जगह छिपने को कहकर फिर आवाज देकर बुलाना भी याद है, जिसके बाद हमें प्रसाद मिलता था. पंडित जी घर पर आकर सभी के हाथों में लाल सूत्र बांध जाते थे. अब न वह त्योहार रहे न ही आज बच्चों के पास इतना समय रह गया है.

दादीजी में यह विशेषता भी थी कि कहीं भी उन्हें कोई चित्र बना हुआ दिख जाये तो वह उसे अपनी याददाश्त से कसीदकारी(कढ़ाई)में उतार देती थीं.पर जल्दी ही आँखे खराब हो जाने से यह गुण छुपा ही रह गया. आज उनको याद करते हुए शत शत नमन करने के सिवाय और कुछ भी नहीं कर सकती... हाँ यह कामना जरूर कर सकती हूँ कि वे जहाँ भी हों अपने नए रूप में... खुश रहें और अपने आस-पास खुशियाँ बिखराती रहें.

गुरुवार, अक्तूबर 20

अनचाही कन्या


अभी-अभी दैनिक जागरण में यह खबर पढ़ी, ऐसा पहली बार तो नहीं हुआ पर आज दिल में एक तीखा दर्द उठा उस अनजान शिशु कन्या के लिये, जिसे अब उचित देख-रेख मिल रही है और भविष्य में एक घर भी मिल जायेगा. कुछ पंक्तियां खुदबखुद उतर आयीं.

अनचाही कन्या

उसकी माँ बनना जिसका सौभाग्य नहीं था
ऐसी एक निर्मोही औरत
नवजात कन्या शिशु को रख आयी झाडियों में
नौ महीने कोख में रखे...
क्या वह इसी दिन की करती रही होगी प्रतीक्षा...?
कितना ही कठोर सही
पर रोया नहीं होगा उसका दिल....
शायद कहीं छिप कर देख रही हो
कोई तो ले जायेगा इस दुधमुंही को...
कितने सवाल न उठे होंगे उसके मन में
पाप और पुण्य के...
या रही होगी कोई पागल
विक्षिप्त मना...
किया अपराध किसीने
किसे मिल रही है सजा...?
बेटी-बेटे में भेद करता यह समाज
 मुँह नहीं मोड़ सकता अपनी जिम्मेदारी से....


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बुधवार, अक्तूबर 19

इस जग में तू कहाँ नहीं था


इस जग में तू कहाँ नहीं था

जहाँ गयी यह दृष्टि मेरी
तू पहले मौजूद वहीं था,
नादानी कैसी थी अद्भुत
इस जग में तू कहाँ नहीं था !

कुदरत के जर्रे-जर्रे से
झांक रही हैं तेरी आँखें,
नयन मूंद बैठे हम पागल
जहाँ निहारा तू ही झांकें !

बादल से जो बरस रहा था
वह तेरा था मधुर संदेसा.
पछुआ बन के जो सहलाता
तेरे आने का अंदेसा !

हरी दूब की तू हरीतिमा
रवि बन तेज गगन फैलाये,
भेज रजत सी शीतल रातें
वनस्पतियों में स्वयं मुस्काए !

जब भी ढूँढा तुझको जग में
तत्क्षण तूने किया इशारा,
दिल से जो भी तुझे पुकारे
झट तूने भी उसे निहारा !
 





सोमवार, अक्तूबर 17

मृत्यु



मृत्यु

(१)
भय से नहीं भाव से देखें
मृत्यु एक अनोखा उत्सव,
जिसने मरना सीख लिया है
जीवन उसका है दीपोत्सव !

दीप जल रहा यदि हो कोई
पाया इक पावन जीवन है,
जलते-जलते नष्ट हो रहा
मृत्यु का यह वरण भी है !

सूना-सूना जीवन लगता
फिर भी हम जीते जाते हैं,
खोया-खोया सा मन लगता
फिर भी इसे जलाते ही हैं !

मृत्यु रूप में वही मिलेगा
यदि उसको ही हम चाहते,
अमृत का फिर द्वार खुलेगा
सत्य, ज्योति हम सभी माँगते !

(२)
जीवन मृत्यु दोनों प्रिय हों
दोनों को ही चखना होगा,
जीवित रहते मरना सीखें
मर कर ही नव जीवन होगा !

जग तो एक बहाना ही है
उस रब से ही मिलना होगा,
बड़े चैन से जीना है तो
मृत्युंजय ही बनना होगा !

मौन में ही जो घट जाती है  
उस घटना से गुजरना होगा,
रास आयेगी यदि मौत तो
जीवन भी यह सोना होगा !

थोड़ा थोड़ा सा परिचय है
दिल में भी उतरना होगा,
गहराई का अंत नहीं है
कहीं तो हमको थमना होगा !  


    

शनिवार, अक्तूबर 15

लौटती रहती लहर वह


लौटती रहती लहर वह

इक लहर सागर की ज्यों हो
ऊर्जा ले तट पे आये,
सौंप कर सारा खजाना
लौट खाली हाथ जाये !

पुनः नूतन वेश धरकर
पुनः भीतर जोश भरकर,
लौटती रहती लहर वह
खो चुकी वह होश पागल !

या चमकती दामिनी हो
तड़ित पल भर को चमकती,
शोर करती लुप्त होती
‘मैं’ भी हूँ यह गीत गाती !

पुष्प कोई अधखिला सा
जन्म जिसका हो रहा है,
कब खिला कब मृत हुआ है
कौन गिनती कर सका है !

हम भी इस सृष्टि पटल पर
कुछ पलों का चित्र ही हैं,
कब उठेगी तूलिका वह
कब हमारे वश में है !




शुक्रवार, अक्तूबर 14

बूंद जैसे ओस की हो


बूंद जैसे ओस की हो

जल रही है ज्योति भीतर
तिमिर पर घनघोर छाया,
स्रोत है अमृत का सुखकर
किन्तु मन तृप्ति न पाया !

औषधि के घट भरे हैं
वृक्ष सारे जो हरे हैं,
किन्तु रोगी तन हुए हैं
क्षुधा को हरना न आया !

एक मीठी प्यास जागे
उस अलख की आस जागे,
बस यही कर्त्तव्य भूला
जग तू सारा छान आया !

चाँद पर पहुँचा है मानव
किन्तु पृथ्वी को उजाड़ा,
रौंद डाले हरे जंगल
मानवों ने कहर ढ़ाया !

जहाँ धन ही देवता हो
कौन खोजे आत्मा को,
जहाँ मन ही बना राजा
ठगे क्यों न वहाँ माया !

माना थोड़ा सुख मिला है
बूंद जैसे ओस की हो,
कब टिका है भ्रम किसी का
तोड़ने ही काल आया !