सेवक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सेवक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, दिसंबर 28

अबूझ है मन

अबूझ है मन 

मुँह लगे सेवक सा कब 
हुकुम चलाने लगता है 
पता ही नहीं चलता 

कभी सपने दिखाता है मनमोहक 

कि आँखें ही चौंधियाँ जाएँ

और कभी आश्वस्त करता है 

पहुँचा ही देगा मंजिल पर 

मन की मानें तो मुश्किल 

मनवाएँ उससे यह उससे भी बड़ी 

बुद्धि भी है थक-हार कर खड़ी 

नींद में दुनिया की सैर कराता है 

जागने पर माया के फेर में पड़वाता है 

मासूम सा बना भजन भी गाता है 

कभी पुरानी गलियों में लौटा ले जाता है 

यह पिंजरे का पंछी 

उड़ना ही भूल गया 

इक आस की सींक पर बैठे-बैठे झूल गया

इसको तो बस देखते भर रहना है 

न भागना इससे, न डराना 

निरपेक्ष होना है 

यह मन भी उसी की माया है 

जिसने यहाँ सभी को जाया  है ! 

सोमवार, जुलाई 25

बोले मियां लाल बुझक्कड़


बोले मियां लाल बुझक्कड़

अपना हाल बुरा है यारों अपना हाल बुरा
लूट लिया है जग वालों ने दिल का हाल बुरा !

छोटे थे तो घरवालों की खूब धुनाई खाई
विद्यालय में मास्टर जी ने लम्बी छड़ी दिखाई !

इश्क ने मारा भरी जवानी हुई बड़ी रुसवाई
बात बनी जब बनते-बनते घोड़ी थी अकड़ाई !

तब से हम हैं मुफ्त के सेवक धरी रही चतुराई
एक मधुर मुस्कान के हित सारी तनख्वाह लुटाई !

आधा जीवन बीत चुका दुनियादारी न आयी
कटते-कटते कट जायेगी बाकी भी अधियाई !