अबूझ है मन
मुँह लगे सेवक सा कब
हुकुम चलाने लगता है
पता ही नहीं चलता
कभी सपने दिखाता है मनमोहक
कि आँखें ही चौंधियाँ जाएँ
और कभी आश्वस्त करता है
पहुँचा ही देगा मंजिल पर
मन की मानें तो मुश्किल
मनवाएँ उससे यह उससे भी बड़ी
बुद्धि भी है थक-हार कर खड़ी
नींद में दुनिया की सैर कराता है
जागने पर माया के फेर में पड़वाता है
मासूम सा बना भजन भी गाता है
कभी पुरानी गलियों में लौटा ले जाता है
यह पिंजरे का पंछी
उड़ना ही भूल गया
इक आस की सींक पर बैठे-बैठे झूल गया
इसको तो बस देखते भर रहना है
न भागना इससे, न डराना
निरपेक्ष होना है
यह मन भी उसी की माया है
जिसने यहाँ सभी को जाया है !
