मंगलवार, फ़रवरी 3

अनुराग बहे भीतर

अनुराग बहे भीतर 

जड़ता से मुक्त हृदय 
आओ नव सृजन करें, 
बिखरा दें श्रम सीकर  
सुमनों से धरा भरें ! 

संतोषी अंतर मन 
पुलकित हो गात सदा, 
जीवन को खेल समझ 
बढ़ती हो बात सदा ! 

विराग ना राग रहे 
अनुराग बहे भीतर, 
उन्माद पिघल जाये 
बस जाग रहे भीतर ! 

भावों के दीप जलें 
विवाद ना शुष्क करें 
उर सदा कृतज्ञ रहे 
जन्मों का दर्द हरें ! 

अग्निमयी  बुद्धि  जले 
भीतर आनंद पले,  
युग-युग से मुरझाया 
जीवन का पुष्प खिले !