अनुराग बहे भीतर
जड़ता से मुक्त हृदय
आओ नव सृजन करें,
बिखरा दें श्रम सीकर
सुमनों से धरा भरें !
संतोषी अंतर मन
पुलकित हो गात सदा,
जीवन को खेल समझ
बढ़ती हो बात सदा !
विराग ना राग रहे
अनुराग बहे भीतर,
उन्माद पिघल जाये
बस जाग रहे भीतर !
भावों के दीप जलें
विवाद ना शुष्क करें
उर सदा कृतज्ञ रहे
जन्मों का दर्द हरें !
अग्निमयी बुद्धि जले
भीतर आनंद पले,
युग-युग से मुरझाया
जीवन का पुष्प खिले !
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