सोमवार, जून 28

वर्षा थमी

वर्षा थमी

पंछी छोड़ आश्रय चहकें
मेह थमा निकले सब घर से
सूर्य छिपा जो देख घटाएँ
चमक रहा पुनः चमचम नभ में

जगह जगह बने चहबच्चे
फुद्कें पंछी छपकें बच्चे
गहराई हरीतिमा भू की
शीतलतर पवन के झोंके

पल भर पहले जो था काला
नभ कैसा नीला हो आया
धुला-धुला सब स्वच्छ नहाया
प्रकृति का मेला हो आया

इंद्रधनुष सतरंगी नभ में
सौंदर्य अपूर्व बिखराता
दो तत्वों का मेल गगन में
स्वप्निल इक रचना रच जाता

जहाँ जहाँ अटकीं जल बूंदें
रवि कर से टकराकर चमकें
जैसे नभ में टिमटिम तारे
पत्तों पर जलकण यूँ दमकें

जहाँ तहाँ कुछ नन्हें बादल
छितरे नभ में होकर निर्बल
आयी थी जो सेना डट के
रिक्त हो गयी बरस बरस के

पूरे तामझाम संग थी वह
काले घन ज्यों गज विशाल हो
गर्जन तर्जन शंख, रणभेरी
चमके विद्युत तिलक भाल हो

अनिता निहालानी
२८ जून २०१०

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