शनिवार, अक्तूबर 30

हरसिंगार के फूल झरे

हरसिंगार के फूल झरे

हौले से उतरे शाखों से
बिछे धरा पर श्वेत केसरी
हरसिंगार के फूल अनूठे !

रूप-रंग, गंध की निधियां
लुटा रहे, मस्त, वैरागी
शेफाली के पुष्प नशीले !

प्रथम किरण ने छुआ भर था
शरमा गए, झर झर बरसे
सिउली के ये कुसुम निराले !

कोमल पुष्प बड़े शर्मीले
नयन खोलते अंधकार में
उगा रवि घर छोड़ चले !

नन्हीं सी केसरिया डंडी
पांच पंखुरी श्वेत वर्णीय
खिल तारों सँग होड़ करें !  

मदमाती खुशबू के तोहफे
बाँट रहे हैं मुक्त हृदय से
 मीलों तक फिजां महकाते !

अनिता निहालानी
३० अक्टूबर २०१०

13 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति को तो आपने सजीव कर दिया

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  2. आपने तो सुंदर वादियों को आखों की सामने ला दिया सुंदर रचना

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  3. पारिजात महका गया ...बहुत सुन्दर रचना .

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  4. फिरदौस जी, वर्मा जी, सुनील जी और संगीता जी, हमारे लान में खिला हरसिंगार आपके दिलों को महका गया, प्रकृति कितनी महान है ! पारिजात भी इसी का नाम है इस जानकारी के लिये भी आभार !

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  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 02-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

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  6. अनीता जी,

    आपकी पोस्ट पड़कर एक बारगी फिर बचपन में पहुँच गया...सुबह-सुबह स्कूल जाते वक़्त ये फूल रस्ते पे सड़क पे बिखरे हुए दिखते थे....और रात में वहां से गुज़रते वक़्त एक सुहानी खुशबू.......बहुत खूब

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  7. फूल हरसिंगार के ..... रात महकती रही और इस कविता ममें अपनी खुशबू रख गई

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  8. mujhe aapki rachna dard ki daastaa chahiye 'vatvriksh' ke liye parichay aur tasweer ke saath
    rasprabha@gmail.com per

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  9. खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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