मंगलवार, मई 12

गुरूजी के जन्मदिन पर

गुरूजी के जन्मदिन पर

मुक्तिबोध कराते पल में
करुणा सागर ज्ञान का दरिया,
ऐसे थामे रखते पल-पल  
प्रेम लुटाते ज्यों सांवरिया !

स्वीकारें हर परिस्थिति को
किन्तु डिगें न अपने पथ से,
वर्तमान में रहकर प्रतिक्षण
वरतें स्वयं सम सारे जग से !

नित नूतन कई ढंग से
बोध कराते निज स्वरूप का,
भाव भंगिमा अनुपम उनकी
छलकाते जाम मस्ती का !

सेवा, सत्संग और साधना
स्वाध्याय का दें संदेश,
जीवन धन्य बनेगा कैसे
सिखलाते हैं देश-विदेश !

सद्गुरु का होना सूर्य सम
अंधकार अंतर का मिटता,
चाँद पूर्णिमा का अथवा हो
सौम्य भाव इक उर में जगता !

शुभता और सत्यता बाँटें
हर लेते हर पीड़ा मन की,
सहज समाधि में ले जाते
अद्भुत है क्रीड़ा गुरू जन की !

दिवस अवतरण का पावन है
बरसों पूर्व धरा पर आये,
शुद्ध बुद्ध चेतना लेकर
भारत भूमि पर मुस्काए !

शिशु काल से ही भक्ति का
बीज अंकुरित था अंतर में,
लाखों जन की पीड़ा हर लूँ
यह अंकित था कोमल उर में !

की तपस्या बरसों इस हित
सहज ध्यान में बैठे रहते,
जग को क्या अनमोल भेंट दूँ
इस धुन में ही खोये रहते !

स्वयं कुछ पाना शेष नहीं था
तृप्त हुआ था कण-कण प्रभु से,
चिन्मय रूप गुरू का दमके
पोर पोर पगा था रस से !

क्रिया की कुंजी बांटी सबको
राज दिया भीतर जाने का,
छुपा हुआ जो प्रेम हृदय में
मार्ग दिया उसको पाने का !

सद्गुरु को शत शत प्रणाम हैं
कृपा बरसती है नयनों से,
शब्द अल्प हैं क्या कह सकते
तृप्ति झरती है बयनों से !

लाख जन्म लेकर भी शायद
नहीं उऋण हो सकता साधक,
गुरू की एक दृष्टि ही जिसको
करती पावन जैसे पावक !

एक समन्दर है शांति का
एक बगीचा ज्यों पुष्पों का,
एक अनंत गगन सम विस्तृत
मौन एक पसरा मीलों का !

गुरु की गाथा कही न जाये
शब्दों में सामर्थ्य कहाँ है,
स्वर्गिक ज्योति ज्यों ज्योत्स्ना
बिखरी उसके चरण जहाँ हैं !

सिर पर हाथ धरे जिसके वह
जन्मों का फल पल में पाता,
एक वचन भी अपना ले जो
जीने का सम्बल पा जाता  !

महिमा उसकी है अपार
बिन पूछे ही उत्तर देता,
प्रश्न कहीं सब खो जाते
अन्तर्यामी सद्गुरु होता !

दूर रहें या निकट गुरू के
काल-देश से है अतीत वह,
क्षण भर में ही मिलन घट गया
गूंज रहा जो पुण्य गीत वह !

पावन हिम शिखरों सा लगता
शक्ति अरूप आनंद स्रोत है,
नाद गूंजता या कण-कण में
सदा प्रज्वलित अखंड ज्योत है !

वही शब्द है अर्थ भी वही
भाव जगाता दूजा कौन,
उसकी महिमा खुद ही जाने
वाणी हो जाती है मौन !

सरिता कल-कल ज्यों बहती है
उससे सहज झरे है प्रीत,
डाली से सुवास ज्यों फैले
उससे उगता है संगीत !

धरती सम वह धारे भीतर
माणिक-मोती सम भंडारे,
बहे अनिल सा कोने कोने
सारे जग को पल पल तारे !


4 टिप्‍पणियां:

  1. गुरु चरणों में मेरा भी प्रणाम पहुंचे !!आह्लादित हुआ मन पढ़ कर !!बहुत सुंदर लिखा है अनीता जी !!

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  2. बहुत भावपूर्ण गुरु वंदना...विनम्र नमन

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  3. अनुपमा जी, कैलाश जी व माहेश्वरी जी, स्वागत व आभार !

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