मंगलवार, मई 5

छा गयी जब बदलियाँ

छा गयी जब बदलियाँ


हवा की सरगोशियाँ
पर झुलाती तितलियाँ,
डोलते से शाख-पत्ते
झूमती सी कहकशां !

एक चादर सी बिछी हो
या धरा पर चुनरियाँ ,
पुष्प जिस पर सज रहे हैं
मस्त यूँ नाचे फिजां !

आ गये मौसम सुहाने
छा गयी जब बदलियाँ,
धार अम्बर से गिरी ज्यों
रहमतें बरसें जवां !

गा रहे पंछी मगन हो
छा रही मदहोशियाँ,
हैं कहीं नजदीक ही वह
कह रही खामोशियाँ !

5 टिप्‍पणियां:

  1. ठंडी फुहारों सी मन को आनंदित करती बहुत सुन्दर और प्रभावी प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस गर्मी में ताजगी देती प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  3. कैलाश जी, सदा जी व रचना जी, स्वागत व् आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर अहसास लिए अच्छी रचना।

    उत्तर देंहटाएं