बुधवार, अगस्त 21

उसने कहा था


उसने कहा था 


एक ही पाप है
और कितना सही कहा था
उस एक पाप का दंड भोग रहा है हर कोई
बार-बार दोहराता है
उस एक पाप के बोझ तले दबकर
पिसता है, नींदें गंवाता है
खुद की अदालत में खड़ा होता है
वादी भी स्वयं है और प्रतिवादी भी
अपने ही विरुद्ध किया जाता है यूँ तो हर पाप
यह पाप भी खुद को ही हानि पहुंचाता है
इसका दंड भी निर्धारित करना है स्वयं ही
'असजगता' के इस पाप को नाम दें 'प्रमाद' का
अथवा तो स्वप्नलोक में विचरने का
जहाँ जरूरत थी... जिस घड़ी जरूरत थी...
वहाँ से नदारद हो जाने का
यूँही जैसे झाँकने लगे कोई बच्चा कक्षा से बाहर
जब सवालों के हल बताये जा रहे हों
या छोड़ दे कोई खिलाड़ी हाथ में आती हुई गेंद
उसका ध्यान बंट जाये
हर दुःख के पीछे एक ही कारण है
अस्तित्त्व को हर पल उपलब्ध होना ही निवारण है
वरना रोना ही पड़ेगा बार-बार
 सजगता ही खोलेगी सुख का द्वार !

17 टिप्‍पणियां:

  1. मन को सजग बनाने के लिये इस कविता को रोज़ पढ़ना होगा।

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 22.8.19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3435 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २३ अगस्त २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  4. अच्छा लगता है आपकी रचनाओं को पढ़ कर..आध्यात्म और सजगता का तानाबाना।

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  5. अपने अस्तित्व से निकल आना ... निर्लप्त हो जाना ... जय पराजय के भाव से बाहर आना ... बुद्दत्व हो जाना ... योगी राज हो जाना ... क्या उस कृष्ण की माया से इतर भी है कुछ ...

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  6. उसकी माया से इतर वह खुद है...स्वागत व आभार !

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