मंगलवार, सितंबर 15

शब्द ऊर्जा झरे जहाँ से

शब्द ऊर्जा झरे जहाँ से 


ज्ञान यहाँ बंधन बन जाता 

भोला मन यह समझ न पाता,

तर्कजाल में उलझाऊँ जग 

सोच यही, स्वयं फंस जाता !


शब्द ऊर्जा झरे जहाँ से  

गहन मौन का सागर वह है 

किन्तु न जाना भेद किसी ने 

रंग डाला निज ही रंग में !


भावों का ही सर्जन सारा 

जिन पर शब्द कुसुम खिलेंगे, 

वाणी से जो भी प्रकटेगा

भाग्य का वह लेख बनेंगे !


महिमा मौन की मुनि गा रहा 

अच्छा बुरा न कोई बंधन,

उसके पथ में चिर वसन्त है 

शब्दों के जो पार गया मन !


एक बार यदि भेद खुला यह  

शब्द सुधा तारक बन मिलती 

प्रखर ज्योति मेधा की उनमें

उहापोह की मारक बनती ! 


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