सोमवार, मार्च 9

शांति कमल कैसे खिल जाते

शांति कमल कैसे खिल जाते  

सजग रहेगा सदा जगत में 

जगा हुआ मन अपने भीतर, 

बाहर जागा कब सो जाये 

 रहती उसको यह कहाँ खबर ! 


भान नहीं अपने होने का 

तंद्रा, निद्रा में खोया है, 

सपनों में ही हर्ष मनाता 

हर दुख सपनों में बोया है !  


छवियाँ गढ़ लीं थीं अनजाने 

जिनको सत्य मानकर जीता, 

अमृत समझ के विष की बूँदें 

कितने अरमानों से पीता ! 


रण के बादल घिर आये फिर 

इसकी ही तैयारी की थी, 

 शांति कमल कैसे खिल जाते  

पीड़ा से ही यारी की थी !