शांति कमल कैसे खिल जाते
सजग रहेगा सदा जगत में
जगा हुआ मन अपने भीतर,
बाहर जागा कब सो जाये
रहती उसको यह कहाँ खबर !
भान नहीं अपने होने का
तंद्रा, निद्रा में खोया है,
सपनों में ही हर्ष मनाता
हर दुख सपनों में बोया है !
छवियाँ गढ़ लीं थीं अनजाने
जिनको सत्य मानकर जीता,
अमृत समझ के विष की बूँदें
कितने अरमानों से पीता !
रण के बादल घिर आये फिर
इसकी ही तैयारी की थी,
शांति कमल कैसे खिल जाते
पीड़ा से ही यारी की थी !
