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गुरुवार, जुलाई 19

बस चंद पल और यहाँ


बस चंद पल और यहाँ


बस चंद पल और यहाँ
फिर डेरा डंडा
समेटना होगा
फूल जो उगा है मस्ती में
शाम होते ही उसे
झर जाना होगा
कीमती हैं ये चंद पल
भीतर जो भी
लुटाएं जी भर
सुमन बिखेर देता
 सुरभि ज्यों
दिलों में बस जाएँ जाकर..
न जाने किस देश में
फिर जाना होगा
लोग बेगाने
रास्ता अनजाना होगा
जब तक तेल दीपक में है
रौशनी लुटानी है
जब वक्त आयेगा चुपचाप
बत्ती बढ़ानी है
बन पड़े जितना
चेहरा इस जग एक और  
साफ हो जाये
एक एक बीज से ही
नया उपवन खिल जाये..