मन का शावक थिर हो जाता
भर श्रद्धा-विश्वास ह्रदय में
भीतर कदम बढ़ाना होगा,
पूर्ण समर्पण उस अनाम में
प्रेम विशुद्ध जगाना होगा !
वह भी भीतर राह देखता
बाधाएँ कभी पथ न रोकें,
जीवन का कोई भी अनुभव
अंतर की यह प्यास न सोखे !
श्वासें ही रस्ता दिखलायें
जब भी कोई भीतर जाता,
भीतर की गुंजन को सुनकर
मन का शावक थिर हो जाता !
हर भ्रम एक द्वार बन जाता
हर दुविधा आगे ले जाती,
दुख भी यहाँ सहायक होते
सुख चाहत ऊर्जा दे जाती !
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 19 जुलाई 2026 को लिंक की गयी है....
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