शनिवार, जुलाई 18

मन का शावक थिर हो जाता

मन का शावक थिर हो जाता


भर श्रद्धा-विश्वास ह्रदय में 

भीतर कदम बढ़ाना होगा, 

पूर्ण समर्पण उस अनाम में 

प्रेम विशुद्ध जगाना होगा !


वह भी भीतर राह देखता 

बाधाएँ कभी पथ न रोकें, 

जीवन का कोई भी अनुभव 

अंतर की यह प्यास न सोखे ! 


श्वासें ही रस्ता दिखलायें 

जब भी कोई भीतर जाता, 

भीतर की गुंजन को सुनकर 

मन का शावक थिर हो जाता !


हर भ्रम एक द्वार बन जाता 

हर दुविधा आगे ले जाती, 

दुख भी यहाँ सहायक होते 

सुख चाहत ऊर्जा दे जाती !

 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 19 जुलाई 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


    !

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