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गुरुवार, जुलाई 26

एक बातचीत


एक बातचीत

न आये थे अपनी मर्जी से
न ही जायेंगे...
तू ही लाया..ले भी जाना जब चाहे
हम न आड़े आएँगे
तेरी हवा से धौंकनी चलती है
श्वासों की
तेरी गिजा से देह..
मिला मौका सजदा करने का
तेरी जमीं पर
गुनगुनाने का
तेरे आसमां तले
क्या हम काबिल थे इसके..
तेरी जन्नत को दोजख बनाने के सिवा
क्या आता है हमें...
तेरी रहमत को देखकर भी
सिवा आँखें चुराने के
क्या किया है हमने
तेरी मुहब्बत की परवाह न करें
तुझसे बस शिकवा किया करें
(तेरे बन्दों से शिकवा तुझसे ही हुआ न )
ओ खुदा...बस यही एक बात है
जब तब आ जाता है
तेरा नाम जुबां पर
तेरा ख्याल जहन में
और वही पल होता है
जब सुकून मिलता है
भीतर तेरी याद कौंध जाती है
तू अपना है तभी न अपना सा लगता है
जगत यह दिखता हुआ भी सपना लगता है
छिपा है तू सात पर्दों के पीछे
फिर भी झलक दिख जाती है
झाँकू जब किसी बच्चे की आँखों में
तेरी ही सूरत नजर जाती है...