मंगलवार, मार्च 18

कौन है वह


कौन है वह



दिल की गहराई जो जाने
उसके सम्मुख ही दिल खोलें

जन्मों का जो मीत पुराना
मन की बात उसे ही बोलें

दूर तलक जो साथ चलेगा
पथ में उसके संग ही डोलें

काँटों को जो फूल बना दे
संग उसके ही स्वप्न पिरो लें

अंतर वीणा को जो गा दे
उसके ही नयनों को तोलें  

सम्भव सब है इस चोले में
मानव हो हर दुःख को धो लें

जो भी इर्द - गिर्द फैला है
उत्सव बनकर उसमें खो लें




13 टिप्‍पणियां:

  1. दिल की गहराई जो जाने
    उसके सम्मुख ही दिल खोलें
    NOT ONLY THIS IS RIGHT BUT ALSO THIS IS MUST .

    उत्तर देंहटाएं
  2. जो भी इर्द - गिर्द फैला है
    उत्सव बनकर उसमें खो लें
    ....वाह! खुश रहने का यही मंत्र है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सहजता और गहनता का अद्भुत मिश्रण है ये रचना ....!!बहुत सुंदर ....!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह....बहुत सुंदर....खुशी अपने आस-पास ही डोला करती है बस उसे खोज सके वो नजर चाहिए ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. कस्तूरी कुण्डल बसै मृग ढूँढे वन माहि...। गहरे भाव हैं कविता में ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - आराधना पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  7. 'जो भी इर्द - गिर्द फैला है
    उत्सव बनकर उसमें खो लें'
    - वाह,क्या बात है !

    उत्तर देंहटाएं
  8. शालिनी जी, अनुपमा जी, प्रतिभा जी, रश्मि जी, अदिति जी, दिगम्बर जी, तुषार जी, गिरिजा जी, अनिल जी, देवेन्द्र जी आप सभी का स्वागत व आभार !

    उत्तर देंहटाएं