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सोमवार, मई 12

सरल और तरल

सरल और तरल 


चीजें जैसी हैं, वैसी हैं 

हम उन्हें खींच कर

 बनाना चाहते हैं 

जैसी हम उन्हें देखना चाहते हैं 

यही खिंचाव तो तनाव है 

तनाव भर देता है मन को

 उलझन से 

कर देता है जटिल 

छा जाती है आत्मग्लानि व्यर्थ ही 

चीजें जैसी हैं सुंदर हैं 

मान लें यदि

 कोई मापदंड न बनायें 

कोई निर्णय न दें 

पक्ष या विपक्ष में 

स्वयं को सदा 

सही सिद्ध करने की 

ज़िद छोड़ दें 

तो सारा तनाव घुल जाता है 

मन सरल और तरल होता जाता है 

और आत्मा 

अपने सहज स्वरूप में 

खिली रहती है !

अनायास ही सहज प्रेम  

जो चारों ओर बिखरा है 

हवा और धूप की तरह 

प्रतिबिंबित होने लगता है भीतर से !


बुधवार, जनवरी 29

जीवन का गीत

जीवन का गीत

हर तरफ है शोर
 भीड़ और दुःख का साम्राज्य...
बहते हुए अश्रु, सिसकियाँ और अर्थहीन आवाजें
जीवन जैसे एक खोल में सिमट आया हो
उड़ने के लिए गगन तो है मगर भरा है धुँए से
त्राण यदि पाना है तो भीतर ही जाना है
बाहर का सब कुछ कितना बेगाना है
शब्द हैं, चेहरे हैं, बातें हैं खोखली
पर इन अर्थहीन बातों में ही जीवन को पाना है
सरल दृष्टि सरल  उर सब पर लुटाना है
नहीं कहीं मुक्ति और, नहीं कोई स्वर्ग और
कला की ऊंचाइयों को
ओस की बूंदों में पिरोये हुए पाना है
शब्दों के जंगल से पार हुआ मन कहे
जीवन का गीत अब मौन में ही गाना है
कमी कुछ नहीं कहीं, हर घड़ी पूर्ण है
नहीं है अभाव कोई, नहीं कहीं जाना है !