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मंगलवार, जुलाई 22

सत्य और भ्रम

सत्य और भ्रम 


माना कदम-कदम पर बाधायें हैं 

मोटी-मोटी रस्सियों से अवरुद्ध है पथ

आसक्ति के जालों में क़ैद 

मन आदमी का 

न जाने कितने भयों से है ग्रस्त  

 जो प्रकट हो जाते हैं स्वप्नों में 

ज्ञान की तलवार से काटना होगा 

रस्सी कितनी भी मोटी हो 

एक भ्रम है 

सत्य सूर्य सा चमक रहा है 

समाधि के क्षणों में 

उसे मन में उतारना होगा 

हर भय से मुक्ति पाकर ?

नहीं, सत्य में जागकर 

स्वयं को पाना होगा !


गुरुवार, जून 26

अब कैसी दूरी अंतर में

अब कैसी दूरी अंतर में


जान लिया जब भेद हृदय का 

अब कैसी दूरी अंतर में, 

अंतरिक्ष में ग्रह घूमें ज्यों 

चंद्र-सूर्य अपने अंबर में !


उड़ना चाहें जितना उड़ लें 

भीतर बसा आकाश अनंत, 

 मिलते ही जिससे हो जाता 

हर पीड़ा हर रंज  का अंत !


जीवन इक उपहार अनोखा 

तन, मन, मेधा वाहक जिसके,

श्वास-श्वास में वही गा रहा 

वही छिपा है चेतनता में !


शुक्रवार, जनवरी 3

आत्म सूर्य

आत्म  सूर्य 


तप में लीन है सूर्य 

किसी तापस सा 

अथवा 

एक यज्ञ चल रहा है अनवरत 

सूर्य की सतह पर !


ऊर्जाएँ बन रही हैं  

बदल रही हैं 

सारे ग्रह, धरा और चन्द्र 

जो कभी उसके अंश थे 

अब एक परिवार की तरह 

उसके अनुयायी हैं !


शीतल हैं 

चाँद की किरणें 

धरा को पोषित करतीं 

 जगा जाते हैं सूर्य के हाथ

भूमि की संतानों को !

    उसी ज्योति का प्रसाद 

पंछियों का कलरव    

और जल का कलकल भी 

सारे तत्व उसी की देन हैं !


आत्मा सूर्य है 

मन चंद्रमा, धरती देह 

आत्मा पोषित करती है 

देह को अदृश्य हाथों से 

मन का द्वन्द्व 

वहीं से आया है !

 तप करके 

 ही कर सकती है 

आत्मा उस विश्व का निर्माण 

जो न्यायपूर्ण हो !


बुधवार, नवंबर 13

ऋण

ऋण 


पिता आकाश है, माँ धरा 

जो अपने अंश से 

पोषण करती है संतान का 

पिता सूरज है, माँ चंद्रमा 

जो शीतल किरणों से 

हर दर्द पर लेप लगाता है 

पिता पवन है, माँ अग्नि 

जो नेह की उष्मा से 

जीवन में रंग भरती है 

पिता सागर है, माँ नदिया 

जो मीठे जल से प्यास बुझाती है 

पिता है, तो माँ है 

आकाश के बिना धरा कहाँ होगी 

अंततः सूरज से ही उपजा है चाँद 

वाष्पित सागर ही नदी है 

दोनों पूरक हैं इकदूजे के 

और इस तरह हर कोई 

ऋणी है माँ-पिता का ! 


बुधवार, नवंबर 29

पथ दिखाता चाँद नभ में

पथ दिखाता चाँद नभ में 


एक ज़रिया है कलम यह

हाथ भी थामे इसे जो, 

कौन जो लिखवा रहा है 

लिख रहा जो कौन है वो !


भाव बनकर जो उमड़ता 

बादलों सा कभी उर में, 

लहलहाती है फसल फिर 

अक्षरों की तब मनस में !

 

कभी सूखा मरुथलों सा 

ज्यों शब्द भी गुम हो गये,

हाथ में अपने कहाँ कुछ 

थाम ली  जब डोर  उसने !


चाह फिर क्योंकर जगायें 

हो रहा जो वही शुभ है, 

पथ दिखाता चाँद नभ में 

सूर्य  उतरा धरा पर है !


सोमवार, अगस्त 21

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः

धरती हमें धरती है 

माँ की तरह 

पोषित करती है 

फल-फूल, अन्न,  शाक से 

क्षुधा हरती है 

वे पात्र जिनमें ग्रहण किया भोजन 

वे घर जो सुरक्षा दे रहे 

वे वस्त्र जो बचाते हैं 

सजाते हैं ग्रीष्म, शीत, वर्षा से 

सभी तो धरती माँ ने दिये 

अनेक जीवों, प्राणियों का आश्रय धरा 

उसने कौन सा दुख नहीं हरा 

अंतरिक्ष की उड़ान के लिए मानव ने 

ईंधन कहाँ से पाया 

आलीशान पोत बनाये 

समान कहाँ से आया 

धरा से लिया है सदा हमने 

कृतज्ञ होकर पुकारा है कभी माँ ! 

विशाल है धरा 

जलाशयों, सागरों 

और पर्वतों का आश्रय स्थल 

भीतर ज्वाला की लपटें 

तन पर हिमाच्छादित शिखर 

रेतीले मैदान और ऊँचे पठार 

वह सभी कुछ धारती है 

निरंतर घूमती हुई 

अपनी धुरी पर 

सूर्य की परिक्रमा करती है 

हरेक का जीवन संवारती है 

उसका दिल इतना कोमल है कि 

एक पुकार पर पसीज जाता है 

धरती को अपना नहीं अपने बच्चों का 

ख़्याल घुमाता है !


शुक्रवार, जनवरी 28

एक सूर्य उग आए ऐसा

एक सूर्य उग आए ऐसा


​​
दीप जले अंतर में ऐसा 

ज्योति कभी ना ढके तमस से, 

जगमग कर दे राहें सारी 

कोई विकार छिपे न मन से !


अंत:लोक में जाग उठें हम 

एक सूर्य उग आए ऐसा, 

युगों युगों की नींदें टूटें 

स्वप्न कभी मत घेरे मन को !


अब भी बादल छाते नभ पर 

तूफां भीषण तेज हवाएँ, 

किंतु अमर यह ज्योति अनुपम 

बाल न बाँका ज़रा कर पाएँ !


जो भी जगता इस प्रकाश में 

उसे न अंधकार का भय है, 

मिथ्या जैसे स्वप्न लोक है 

वैसे ही यह जगत लुप्त है  !


मंगलवार, जनवरी 11

हो तुम जन्मों के चिर-परिचित



हो तुम जन्मों के चिर-परिचित



तुमसे मिलकर मिटी दूरियाँ

हो गए अपने सब पराये,

अनजाने जाने से लगते

परिचय तुमने दिये कराए !


हो तुम जन्मों के चिर-परिचित

जीवन में तुम ! तुम्हीं मरण में,

दूरस्थ निकट तुम ला देते

खुद प्रतिपल साथ रहे मेरे !


पंछी, बादल, पुष्प रंगीले

है रंग भरा यह जग भाता, 

रंग हमें आनन्दित करते 

जल में सूर्य रंग बरसाता !


शिशु-बालक हो मुग्ध खेलते  

निरख-निरख तुम हर्षित होते !

विमल लहर सुर स्वर बिखराती

सर-सर-सर वट गीत सुनाते,


पत्ते वन-वन डोला करते

जैसे लोरी शिशु हों सुनते 

हवा सिहरती क्या कुछ कहती 

नयन मुँदे से रहें ऊनींदे  !


( गीतांजलि से प्रेरित पंक्तियाँ )


बुधवार, नवंबर 17

मन उपवन

मन उपवन 

शब्दों के जंगल उग आते हैं 

घने और बियाबान 

तो सूर्य का प्रकाश 

नहीं पहुँच पाता भूमि तक 

मन पर सीलन और काई 

की परतें जम जाती हैं 

जिसमें गिरते हैं नए-नए बीज

और दरख्त पहले से भी ऊँचे 

प्रकाश की किरणें ऊपर-ऊपर 

ही रह जाती हैं 

मन की माटी में दबे हैं 

जाने कितने शब्द 

स्मृतियों के घटनाओं 

और पुराने जन्मों के 

उपवन उगाना है तो 

काटना होगा इस जंगल को 

सूर्य की तपती धूप 

झेलनी होगी ताकि 

सोख ले सारी नमी व काई मिट्टी की 

खुदाई कर निकाल फेंकनी होंगी 

पुरानी जड़ें 

व्यर्थ के खर-पतवार 

फिर समतल कर माटी को 

सूर्य की साक्षी में 

नए बीज पूरे होश में बोने होंगे  

तब फूल खिलेंगे श्रद्धा और विश्वास के 

आत्मा का परस जिन्हें हर पल सुलभ होगा ! 


गुरुवार, मार्च 11

होगा ही कोई हाथ

होगा ही कोई हाथ


सूर्य नहीं कहता वह सूर्य है 

उसकी किरणें ही बताती हैं 

चाँद अपना नाम नहीं लिखता आसमान पर 

चाँदनी बयान करती है उसका हाल 

परमात्मा फिर क्यों कहे वह भगवान है 

हवाएं देती हैं उसका पैगाम 

दिल में उमड़ता हुआ प्रेम 

ही खबर देता है 

उसके होने की 

ऐसे ही अज्ञान नहीं लेता अपना नाम खुद 

क्रोध और ईर्ष्या की आग ही बताती है 

अभी ज्ञान सोया है मन में 

जगत है तो जगतपति की खबर मिल ही जाती है 

जैसे नौका तैरती आती हो दूर से सागर में 

तो नाविक होगा ही 

उड़ती हो आकाश में कोई पतंग 

तो होगा ही कोई हाथ 

थामे हुए डोर को 

फिर क्यों नहीं देख पाते हम उसे 

जो छुपा है जर्रे-जर्रे में !

देवत्व महान स्वतंत्रता है 

नहीं है उसे कोई बंधन 

हजार-हजार रूपों में प्रकट होता है 

वह संकल्प मात्र से 

धैर्य, सहिष्णुता और प्रेम की मूरत 

वह सिखाता है मानव को सच की राह 

दिखाता है सदा 

दिलों में अपनेपन की भावना जगाकर 

समाज को एक उद्देश्य में बांधता है 

पतित को पावन बनाता है 

अपवित्र और पवित्र के भेद को बताने वाला 

संबंधों के जाल से निकाल 

पंछी को उन्मुक्त आकाश में

उड़ने की शक्ति भरने वाला

अनंत  हर घड़ी निमंत्रण देता है

वह सर्व समर्थ शक्ति का स्वामी है !