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सोमवार, जून 2

भिगो गई है प्रीत की धारा


भिगो गई है प्रीत की धारा 


दिल की गहराई में बसता 

सत्य एक ही, प्रेम एक ही, 

दिया किसी ने, चखा किसी ने

सुख-समता का स्वाद एक ही !


जैसे जल नदिया का या फिर 

अंबर में बादल बन रहता, 

भाव प्रीत का हर इक दिल में 

कभी बह रहा, कभी बरसता !


उसी चेतना से आयी थी

उसी चेतना को कर पोषित, 

भिगो गई शुभ प्रीत की धारा 

मन-प्राण हुए सबके हर्षित !


शुभ भावना जगी जो भीतर 

प्रसून मैत्री के जो पुष्पित, 

अवसर पाकर मुखर हुए जब

करें ह्रदय को पुन: सुवासित !

गुरुवार, अप्रैल 30

मौसम

मौसम

आते हैं जाते हैं
वृक्ष पुनः पुनः बदला करते हैं रूप
हवा कभी बर्फीली हो चुभती है
कभी तपाती आग बरसाती सी..
शुष्क है धरा... फिर
भीग-भीग जाती है  
निरंतर प्रवाह से जल धार के
मन के भी मौसम होते हैं और तन के भी
बचपन भी एक मौसम है
और एक ऋतु तरुणाई की
जब फूटने लगती हैं कोंपलें मन के आंगन में
और यौवन में झरते हैं हरसिंगार
फिर मौसम बदलता है
कुम्हला जाता है तन
थिर हो जाता है मन
कैसा पावन हो जाता प्रौढ़ का मन
गंगा के विशाल पाट जैसा चौड़ा
समेट लेता है
छोटी बड़ी सब नौकाओं को अपने वक्ष पर
सिकुड़ जाता है तन वृद्धावस्था में
पर फ़ैल जाता है मन का कैनवास
सारा जीवन एक क्षण में उतर आता है
मृत्यु के मौसम में..

शनिवार, नवंबर 1

ऋतू आयी मृदु भावों वाली


ऋतु आयी मृदु भावों वाली


धूप, हवा संग एक हो सकें
नदिया, पिकनिक, फूलों वाली
ऋतु आयी मृदु भावों वाली !

हल्की-हल्की ठंड रेशमी
नहीं ताप अब रवि बरसाता,
बादल लौट गये निज धाम
नीला चंदोवा हर्षाता !

धरा तृप्त है वारिद पीकर
कलियों, तितली, भंवरों वाली
ऋतु आयी मृदु भावों वाली !

 मदिर गंध ले बही समीरा
सुरभि बिखरने को है आतुर,
जीवन अपना राज खोलता
चले भूमि में सोने दादुर !

थिर गम्भीर हुई जलवायु
कण कण को हर्षाने वाली  
ऋतु आयी मृदु भावों वाली !




सोमवार, अगस्त 6

तब आता है बसंत


पिछली पोस्ट से आगे 

तब आता है बसंत में मौसम और प्रेम एक दूसरे पर किस तरह आश्रित हैं, इसका परिचय मिलता है. प्रकृति में होते बदलाव जहाँ एक ओर ऋतु परिवर्तन का संदेश देते हैं, वहीं प्रिय से मिलने की प्रेरणा भी बन जाते हैं

सरसों सा बिखर जाता है
दिनकर का रंग
गूंजता है
दोपहर के सूने में
कोयल का स्वर पचंम
तब आता है बसंत

...

धूल में मिश्रत सा लगता है
जब इन्द्रधनुष के अबीर का सँग
तब आता है बसंत
....
कहता है मौसम
खत्-खत् नहीं..
होता है जब प्रत्यक्ष ही आमन्त्रण
तब आता है बसंत

....
जब लौटकर नहीं आते
प्रेषित प्रेम-पत्र बैरंग
तब आता है बसंत

अंतिम दो कवितायें कवि की उस अनवरत तलाश को बयान करती हैं, जो उसे निरंतर बेचैन किये है

एक निराकार, एक आकार सचित्र

सिर्फ तुम्हारी तस्वीरों तक ही
मैं कैसे रह सकता हूँ सीमित
तुम्हें तलाशते हुए
भटक रहा हूँ
जंगल जंगल, पर्वत पर्वत
रोक लेता है मुझे पर
यह क्षितिज
....
..
कभी कभी तो लगता है
मैं ही आइना हूँ
मैं ही हूँ बिम्ब और प्रतिबिम्ब
...
तुम्हारे स्पर्श से जान सकूं कि
हृदय की भावनाएँ सच्ची होती हैं
नहीं होती हैं अज्ञात दर्द से भरी हुई
मात्र टीस
सत्य के दोनों होते हैं रूप
एक निराकार, एक आकार सचित्र

मैं हूँ निर्दोष

मैं हूँ निर्दोष
यह तो इस मौसम का है दोष
इसलिए तुम्हें मेरी निगाहें रही हैं खोज
....
प्यास बुझी नहीं
कह रही कलियाँ
पीकर शबनम की बूंदें अनमोल
धूप कह रही
बादलों के बिना कितना
अकेला लग रहा है
यह नीलाम्बर
....
इंतजार में ही है आनंद
सुंदरता के पग में बंधी  
घुंघुरुओं का स्वर कर रहा
मुझे आत्मविभोर
...
..
किशोर कुमार जी कि कविताओं को पढ़ते हुए कभी-कभी मुझे गीतांजली की स्मृति हो आयी, हम सबके भीतर एक अमूर्त प्रेम सदा जागृत रहता है उस अनाम अस्तित्त्व के नाम...उसी की याद दिलाती हैं ये कवितायें आशा है आप सभी सुधी पाठक भी इनका रसास्वादन करेंगे.