गुरुवार, जून 17

मीरा

मीरा

नृत्य समाया हर मुद्रा में
उर में वीणा की झंकार
कंठ उगाए गीत मधुरिमा
कहाँ छिपा था इतना प्यार ?

आधी रात उजाला बिखरा
नयनों में ज्यों भरी पुकार
जागे जागे स्वप्न हो गए
लेता रूप कोई आकार !

पुलक उठे है पोर-पोर में
धड़क रहा है यूहीं दिल
कोई खबर भोर की लाए
क्या करीब है अब मंजिल ?

इच्छा, ज्ञान, क्रिया शक्ति के
पार हुआ मन अब मुक्ति के
खुले पट सब स्पष्ट हो गया
पुष्प खिले हैं जब भक्ति के !

नर्तक कौन कौन कवि है
कौन सुनाये सुनता वीणा
कौन तलाश रहा मंजिल को
कोई भी नही वहाँ दीखता !

एक तत्व का खेल है सारा
वही प्रिय वही प्रियतम प्यारा
स्वयं ही गाये झूमे स्वयं ही
प्रेम गली में न दो का पसारा !

अनिता निहालानी
१७ जून २०१०

1 टिप्पणी:

  1. "कोमल अहसास लिये हुई कविता और सुन्दर शब्द भी..."

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