शुक्रवार, जून 11

सदगुरु

सदगुरु

तू शमा है प्यार की
जल रही दिन रात जो
तू सदा दुलार की
सुन रही हर बात जो I

तू हमें रस्ता दिखाए
लिये हाथों में मशाल
भटक जाएँ हम न पथ
रहे न मन में मलाल I

तू सदा है साथ अपने
क्यों खले दूरी विरह की
दिल में बैठा हँस रहा तू
खोल कर पीड़ा गिरह की I

मौन भीतर का जगाए
खनखनाती हँसी भी तू
सुबह का उगता उजाला
रात्रि की विश्रांति भी तू I

प्रेम से यह जग बना है
प्रेम से ही हर तपन
प्रेम ही कारण घृणा का
प्रेम से ही है जलन I

सदगुरु

एक ऐसा प्रेम है तू
मुक्त है जो हर व्यथा से
नित्य नूतन नित्य बढ़ता
विलग रहता हर प्रथा से I

भक्ति बन के जो निखरता
मांगता न सदा देता
तृप्त होता मन जो भीतर
तभी ऐसा प्रेम घटता I

एक ऐसी भी खुशी है
एक रस आकाश सी जो
मधुर ऐसी तृप्ति भी है
शांत रस प्रकाश सी जो I

उस अलख से झर रही है
अनवरत अविरत सहज ही
चेतना की मदिर अग्नि
जल रही भीतर सहज ही I

है अटल  नीले गगन सा
हर दिशा में व्याप्त है तू
जुड़ गया तू हर किसी से
एकता से प्राप्त है तू I

द्वैत न तेरी नजर में
एक का है खेल सारा
मिट गए फिर भेद सारे
दो का है टूटा पसारा I

चाँद, सूरज दो नयन में
सृष्टि का एकत्व झलके
प्रेम झलके शांति झलके
परम एक आनंद झलके I

अनिता निहालानी
११ जून २०१०

1 टिप्पणी:

  1. आप बहुत सुंदर लिखती हैं. भाव मन से उपजे मगर ये खूबसूरत बिम्ब सिर्फ आपके खजाने में ही हैं

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