मंगलवार, अक्तूबर 15

दिल को ही अम्बर कर लें

दिल को ही अम्बर कर लें 


शब्दों में वह नहीं समाये
दिल को ही अम्बर कर लें,
कैसे जग को उसे दिखाएँ
रोम-रोम में जो भर लें !

गाए रुन-झुन, रिन-झिन, निशदिन
हँसता हिम शिखरों के जैसा,
रत्ती भर भी जगह न छोड़े
बसता पुष्प में सौरभ जैसा !

रग-रग रेशा-रेशा पुलकित
कण-कण गीत उसी के गए,
रिसता मधु सागर के जैसा
श्वास-श्वास में वही समाये !



14 टिप्‍पणियां:

  1. मन का नीरव कोना ,जिसमें गूँजे तेरा मौन
    तहखानों में धूप बिखेरे मेरा अपना कौन ...
    कुछ ऐसे ही ,बहुत ही गहरे भाव सुन्दर कविता ।

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    1. वाह ! गिरिजा जी, बहुत सुंदर पंक्तियाँ..पूरी कविता लिखें,पढना चाहूंगी

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  2. कल 17/10/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  3. शब्दों में वह नहीं समाये, दिल को अम्बर कर लें...वाह!

    चाँद-सितारे, धरती, सूरज, सबको अन्दर कर लें।

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    1. बहुत खूब ! सही कहा देवेन्द्रजी..

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  4. सार्थक विचार लिए. सुन्दर रचना..

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  5. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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  6. बहुत खूब ,बेहद सुन्दर प्रस्तुति

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  7. भावपूर्ण ... प्रेम में पगी सुन्दर रचना ...

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  8. शब्दों में वह नहीं समाये
    दिल को ही अम्बर कर लें,

    ....वाह! बहुत उत्कृष्ट और सटीक अभिव्यक्ति...

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  9. दिल को ही अम्बर ………बहुत सुन्दर |

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  10. माहेश्वरी जी, सुषमा जी,वीरू भाई, कैलाश जी, मदन जी, इमरान, दिगम्बर जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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