बुधवार, सितंबर 28

तू है तो मैं हूँ

तू है तो मैं हूँ

‘मैं’ हूँ तो ‘तुझे’ होना ही पड़ेगा
‘तू’ से ही ‘मैं’ का वंश चलेगा
तुझे बिठाया हमने सातवें आसमान पर
अनगिनत गुणों के रंग दिए भर
तू जानीजान है कहते रहे यह भी
छिप-छिप कर करते रहे जुर्म भी
एक हाथ में आरती का थाल
और मन में भरे कितना मलाल
ख़ुशी के नाम पर दुःख बटोरते रहे
कभी किस्मत कभी दुनिया को कोसते रहे
अब जब कि यह राज खुला है
न कोई गम न कोई गिला है
तू ही हर सूं नजर आता है
दिल झूम के यह गाता है
तू जो है तो मैं हूँ !  

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29-09-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2480 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. तू और मैं का अंतर ही तो दुखों का कारण है...जिस दिन यह अंतर मिट जाएगा तो केवल तू ही सर्वत्र नज़र आएगा...बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...

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