सोमवार, सितंबर 26

कोष भरे अनंत प्रीत के

कोष भरे अनंत प्रीत के

पलकों में जो बंद ख्वाब हैं
पर उनको लग जाने भी दो,
एक हास जो छुपा है भीतर
अधरों पर मुस्काने तो दो !

सारा जगत राह तकता है
तुमसे एक तुम्हीं हो सकते,
होंगे अनगिन तारे नभ पर
चमक नयन में तुम ही भरते !

कोष भरे अनंत प्रीत के
स्रोत छुपाये हो अंतर में,
बह जाने दो उर के मोती
भाव सरि के संग नजर से !

जहाँ पड़ेगी दृष्टि अनुपम
उपवन महकेंगे देवों के,
स्वयं होकर तृप्ति का सागर
कण-कण में निर्झर भावों के !

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