शुक्रवार, अक्तूबर 13

जिन्दगी हर पल बुलाती



जिन्दगी हर पल बुलाती

किस कदर भटके हुए से
राह भूले चल रहे हम,
होश खोया बेखुदी में
लुगदियों से गल रहे हम !

रौशनी थी, था उजाला
पर अंधेरों में भटकते,
जिन्दगी हर पल बुलाती
अनसुनी हर बार करते !

चाहतों के जाल में ही
घिरा सा मन बुने सपना,
पा लिये जो पल सुकूं के
नहीं जाना मोल उनका !

दर्द का सामां खरीदा
ख़ुशी की चूनर ओढ़ाई,
विमल सरिता बह रही थी
पोखरी ही उर समाई !

भेद जाने कौन इसका
बात जो पूरी खुली है,  
मन को ही मंजिल समझते
आत्मा सबको मिली है !


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