बुधवार, सितंबर 19

अंतर्प्रवाह


अंतर्प्रवाह

बहते हैं विचार... किसी सागर की तरह
सागर.. जो बहता है लहरों में या
भाप बनकर,
जब वह आकाश में उठ जाता है
संग हवाओं के !

जीवन भी बहता है
घटनाओं में या
फिर प्रेम भरी भावनाओं में
जब मन ऊपर उठ जाता है..
 यह तर्क है निरा... या
आत्मा की आवाज
कौन जानता है ?

शब्द आते हैं जाने किस स्रोत से
कौन उन्हें गढ़ता है भीतर गहराई में
किसने भरे हैं अर्थ उनमें
और क्या उनके लक्ष्य हैं ?  

जीवन का लक्ष्य भी क्या है
किसे पता है
मौन के सिवा कुछ नहीं है वहाँ
जहाँ जाकर रुक जाते हैं सब रस्ते
एक गहन सन्नाटा
और खामोशी !

क्यों फैलाया है इतना बड़ा माया का लोक
जहाँ होना भर है
विचारों की सीमा है
पर क्या है उसके पार
जहाँ से दिव्य गंध आती है
जहाँ जीवन एक सहज अनुभव है !

14 टिप्‍पणियां:

  1. वाह..
    उस पार जीवन साक्षात है.
    जैसा कि मैं हमेशा कहता आया हूँ
    आपकी कविताएँ बहुमूल्य हैं.
    हमेशां प्रभावित करती है.

    आत्मसात 

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  2. चाहे इन्सान का है पर ये माया लोक उसी का बनाया हुआ है ... वही खेलता है ...
    मोहरा बन इंसान सोचता है मैं कर रहा हूँ ...
    गहरी रचना है ...

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    उत्तर
    1. सही कहा है आपने, उसके सिवा और कोई यह कर ही नहीं सकता..

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20.9.18. को चर्चा मंच पर चर्चा - 3100 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  4. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन कुंवर नारायण और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार हर्षवर्धन जी, आप सदा ब्लॉगर्स का हर्ष बढ़ाते हैं..

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  5. विचारणीय , मंगलकामनाएं !

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