बुधवार, सितंबर 12

प्रतीक्षा


प्रतीक्षा 

नहीं, अब कुछ भी नहीं रुचता
न ही बादलों का शोर
न नाचता हुआ मोर
न वर्षा का बरसता हुआ जल
न झरनों की कलकल
न पंछियों की टीवी टुट् लुभाती है
न ही रुत सावन की भाती है
अब तो उस श्याम की प्रतीक्षा है
जो इन घनघोर घटाओं से भी काला है
जो इन हवाओं से भी मतवाला है !

14 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 13.9.18 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3093 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन वराह जयन्ती और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. वह श्याम आस-पास ही है .कभी जब कुछ देख कर मन पुलक उठता है तो लगता है वह यहीं है -हमारे साथ .

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    1. सही कहा है आपने प्रतिभा जी, वह श्याम तो हमारे आसपास ही है, हम ही अपने विचारों में मग्न उसे देख नहीं पाते

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  4. वो श्याम रहता है सदेव साथ ही .... शायद श्याम रंग में नज़र नहीं आता ...
    सुन्दर भाव ...

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  5. स्वागत व आभार दिगम्बर जी !

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  6. आपकी हर रचना की तरह यह रचना भी बेमिसाल है !

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