सत-रज-तम का खेल है सारा
कौन हमारा, कौन पराया
इसका पता लगाया जाये,
तन-मन दिखे, अगोचर आत्मा
किसका ध्यान लगाया जाये?
तन यह माटी, मन पानी सा
दोनों आते-जाते रहते,
आत्म ज्योति से टिके हुए हैं
जिससे हम अनजाने रहते !
मन के पीछे चलता है तन
तन की सेवा में रहता मन,
सेवक बाहर, मालिक भीतर
कैसे पूर्ण लगेगा जीवन !
पहले उससे प्रीत बढ़ा लो
जो मन के उस पार का वासी,
खिल जाएँगे उपवन मन में
छँट जाएगी घोर उदासी !
सत-रज-तम का खेल है सारा
तन-तम, मन-रज खेल रहे हैं,
सत आत्मा की बात न करते
व्यर्थ ही दुविधा झेल रहे हैं !
दोनों का अवसान है सत में
मध्यम मार्ग शाश्वत निरंजन,
सत के भी जो पार गया है
बन जाता है वही चिरंतन !
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