सोमवार, सितंबर 28
मौसम का उल्लास समेटे
शुक्रवार, सितंबर 25
ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!
ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!
भीतर साधें शांति, संतुलन
हो गतिमय बाहर का जीवन,
ज्यों शिव शांत रहें अंतर में
बाहर करते तांडव नर्तन !
ज्यों वृक्ष टिका भीतर भू के
लिए शांत जड़ों का आधार,
बाहर झूम रहीं शाखाएँ
नित लेकर हवाओं का साथ !
शांत जिस तरह तल नदिया का
जिस पर दौड़ लगाती जाती,
अविचल, अनथक शताब्दियों से
लहरें गीत विजय के गातीं !
ऐसे रहे शांत अंतर्मन
हाथ कर्म में लगें निरन्तर
मीलों की दूरियाँ नाप लें
लेकिन हो अचलता भीतर !
जिह्वा से वाणी का प्रयोग
देखें नैन सौंदर्य जग का,
टूटे नहीं शांति भीतर की
क्या हम नहीं चाहते ऐसा ?
प्रभु से हर प्रार्थना में नित्य
पूर्ण शांति क्या नहीं माँगते ?
जो हीरे जैसी अकाट्य हो
ऐसी समता नहीं चाहते !
मंगलवार, सितंबर 22
शनिवार, सितंबर 19
वही वही
आकाश
एक वही अनंत आकाश
झरता है जिसमें से परम प्रकाश
वही आश्रय है हमारा
उपजे उसी से
उसी में समा जाएँगे
कुछ पल डोलेंगे यहाँ
इंद्रधनुष की तरह
देखते-देखते विलीन हो जाएँगे !
सागर
एक वही गहरा सागर
उसमें उठी एक लहर हैं हम
कुछ घड़ी सिर पटकेगी फिर
लौट जाएगी
उसी की गहराई में
सो जाएगी !
चेतना
एक वही परम चेतना
उधार लेकर थोड़ी सी
बन गये हैं हम ‘मन’
थोड़ी देर सोचेगा, समझेगा
सीखेगा, सिखायेगा
फिर उसी में खो जाएगा !
सोमवार, सितंबर 14
भारत माँ के भाल की बिंदी, अपनी प्यारी हिन्दी
भारत माँ के भाल की बिंदी
अपनी प्यारी हिन्दी
भाषा किसी भी राष्ट्र की पहचान होती है. वह राष्ट्र की एकता, अखंडता तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. वह राष्ट्र को सशक्त करती है. राष्ट्र भाषा का दर्जा उसे ही मिलता है, जो भाषा सम्पूर्ण देश में सम्पर्क भाषा के रूप में व्यवहार में लायी जाती हो, जो अधिक से अधिक लोगों द्वारा समझी जाती हो. हिंदी भारत की स्वयं सिद्ध राष्ट्र भाषा है. जब भारत की स्वाधीनता का आन्दोलन तीव्र हुआ तब हिंदी का उपयोग बढ़ने लगा था. हिंदी राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गयी थी. उस समय के सभी बड़े नेताओं ने यह जान लिया था कि लम्बे समय से हिंदी सारे भारत की एकता का कारण रही है. यह संतों, फकीरों, व्यापारियों तथा तीर्थयात्रियों द्वारा देश के एक भाग से दूसरे भाग में प्रयुक्त होती रही है.
आज हिंदी भारत के एक विशाल क्षेत्र में बोली जाती है. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, छतीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली एवं चंडीगढ़ में यह शत-प्रतिशत बोली व पढ़ी जाती है. यह निर्विवाद सत्य है कि चीनी भाषा के बाद संसार में दूसरे स्थान पर सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा का गौरव हिंदी को प्राप्त है. देश में ही नहीं विदेशों में बसे करोड़ों भारतीय मूल के लोगों को आपस में जोड़े रखने का काम हिंदी भाषा करती है. फिजी, मारीशस, सूरीनाम, गयाना देशों में और नेपाल की कुछ जनता भी हिंदी बोलती है. इसके अतिरिक्त यह विश्व के अनेक देशों में पढ़ाई व सराही जाती है. हिंदी में कई बोलियाँ और उप बोलियाँ हैं जैसे अवधी, ब्रज, मैथिली, भोजपुरी आदि जो इसको समृद्ध करती हैं. ४ अक्तूबर १९७६ को उस समय के विदेश मंत्री श्री अटल बिहारी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपना भाषण हिंदी में देकर विश्व के सामने हिंदी के गौरव को बढ़ाया था. आज हिंदी राष्ट्र भाषा, राज भाषा, सम्पर्क भाषा, जन भाषा की सीढ़ियाँ चढती हुई अंतर्राष्ट्रीय भाषा बनने की ओर अग्रसर है.
हिंदी संसार की उन्नत भाषाओँ में सबसे अधिक व्यवस्थित भाषा है, यह सरल तथा लचीली भाषा है. यह अन्य भाषाओँ के शब्दों को अपनाने में संकोच नहीं करती. इसके पास वैज्ञानिक लिपि है. इसकी शब्द संपदा अपार है. हिंदी का साहित्य बहुत भरपूर है. यह आम जनता से जुड़ी भाषा है. कम्प्यूटर और इंटरनेट पर भी हिंदी ने अपने पांव जमा लिए हैं बड़ी संख्या में हिंदी में लोग इंटरनेट पर लिख रहे हैं.
इतना सब होते हुए भी देश में हिंदी को जो स्थान मिलना चाहिए था, अभी तक नहीं मिला है. संविधान की धारा ३४३ के अनुसार हिंदी को १४ सितम्बर १९४९ को राजभाषा का दर्जा दिया गया था, उस समय यह निर्णय लिया गया कि पन्द्रह वर्षों तक हिंदी के साथ अंग्रेजी को भी कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकार किया जायेगा उसके बाद स्वतंत्र रूप से हिंदी को राज भाषा का अधिकार मिलेगा. किन्तु आज आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हिंदी को पूर्णतः राजभाषा का दर्जा नहीं मिला है. शायद इसका प्रमुख कारण है सरकारी नौकरियों के लिए अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता. जब तक रोजगार के लिए हिंदी जानना अनिवार्य नहीं किया जायेगा तब तक इसके प्रति उदासीनता का रवैया अपनाया जाता रहेगा. इसे ज्ञान विज्ञान की भाषा भी बनना होगा.
जब देश गुलाम था तब मैकाले ने जिस शिक्षा पद्धति का विकास किया था आज तक हम उसे ढोने पर विवश हैं. भारत में अंग्रेजी बहुत कम लोगों द्वारा बोली जाती है पर बहुसंख्यक लोगों को उसे अपनाने पर विवश होना पड़ता है। किसी देश की सांस्कृतिक विशेषताएं उसकी भाषा में ही छुपी होती हैं, यदि भाषा का विकास नहीं हुआ तो उस देश की संस्कृति का पतन सम्भव है. यदि किसी समाज को अपनी मातृ भाषा को छोड़कर विदेशी भाषा को अपने कामकाज की भाषा बनाना पड़े तो मातृ भाषा की अवनति के साथ-साथ भाषा में संचित वहाँ की सांस्कृतिक धरोहर भी नष्ट होने लगती है. वे उसी भाषा के साहित्य को श्रेष्ठ मानकर उसके पीछे जाते हैं और अपने साहित्य में छिपे ज्ञान की तरफ उनकी दृष्टि नहीं जाती. हिंदी को उसका उचित स्थान दिलाकर हम न केवल अपने देश की एकता को मजबूत कर सकते हैं बल्कि अपनी प्राचीन संस्कृति के मूल्यों को धारण कर सकते हैं.
शनिवार, सितंबर 12
लोक चेतना में बसते हैं
गणपति उत्सव
श्रीगणेश कारण हैं सबके
मिट्टी, गोबर से भी रच लो,
दूर्वा का तिनका कर अर्पण
छोटा सा मोदक ही धर दो !
बहुत सरल, शुभता के दाता
कर्ण विशाल व आँखें गहरी,
ज्ञानी, बली नृत्य भी जानें
सब कलाओं के हैं पारखी !
एक मुक्त आकाश की भाँति
गणपति प्रेम का बाना ओढ़े,
सुखकर्ता, दुखहर्ता, पालक
बन कर आते अतिथि अनोखे !
लोक चेतना में बसते हैं
एक अनूठा हर्ष जगाते,
भेद भावना तज कर सारे
छोटे-बड़े सभी मिल गाते !
मोदक भाते गणनायक को
है आमोद-प्रमोद प्रिय जिनको,
घर, दुकान कहीं भी बसा दो
विशालकाय, शुभ तुंडकाय को !
गजमस्तक मुख सबसे सुंदर
लंबोदर औ" मूषक वाहन,
अद्भुत अति सिखावन उनकी
साधें हर हाल में संतुलन !
खुलकर, हँसकर, गाकर जीओ
पाठ सिखाते सहज प्रेम का,
हर नेत्र में अश्रु होते जब
समय आ गया हो विदा का !
सर्जन और विसर्जन दोनों
जीवन में सदा संग विचरते,
गणपति उत्सव यही सिखाता
मिट-मिट कर हम पुनः जन्मते !
बुधवार, सितंबर 9
सोमवार, सितंबर 7
प्रेम
कुछ भी नहीं जानते हम
जब यह जान लेते हैं,
जो भी हो चुका
वह पूर्व निर्धारित था
जो होने वाला है
वह है अभी हमारे हाथ में
यह मान लेते हैं !
यदि दृढ़ हो जिज्ञासा
और त्याग जीवन में आये
तब जीवन हर
कदम पर सिखाता !
एक धारा की तरह बहे
तभी निर्मल और स्वच्छ रहे
कर्म करते हुए
करते जाना है फल अर्पण
और…. संभव ही कहाँ?
प्रेम के बिना समर्पण !

.jpg)
.jpg)



