मंगलवार, सितंबर 1

जीवन क्षण भंगुर है

जीवन क्षण भंगुर है 


प्रमाण है इसका 
नेपाल की त्रासदी
पल भर पहले जो जीवित थे 
पल भर बाद ही 
मिट गया उनका निशान 
खो गये उनके प्राण ! 

न जाने कितनी बार दोहराई जाएगी 
कुदरत की विनाश लीला 
मानव की आशाओं, आकांक्षाओं 
के सिर पर पैर रखकर 
उसे उसकी सही पहचान बतायी जाएगी !

कुछ भी तो नहीं है वह 
इस अनंत सृष्टि के आगे 
क्यों खोया है सपनों में 
अब तो जागे ! 

नदियों पर बाँध बनाता है 
जगत में महल उठाता है 
खोद देता पर्वतों में सुरंगें
 और रेगिस्तान में कमल 
खिलाता है
पर बेबस है धरा के 
प्रकोप के आगे 
अभी भी ज्वालामुखी है 
जिसके भीतर 
जो करवट बदलती है तो 
पर्वत भी हिल जाते हैं 
मानव के सारे प्रयास 
ताश के पत्तों की तरह 
बिखर जाते हैं !

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