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बुधवार, अगस्त 26

श्वासों की समिधा को

श्वासों की समिधा को 


श्वासों की समिधा को
अंतर की हवि कर दें,
पल-पल में जी लें फिर
सुंदर की छवि भर लें !

उर के घट पावन में
प्रियतम जो बसता है,
अर्पण कर भाव सभी
मन मयूर तकता है !

पावक है शीतल सी
छुवन बड़ी कोमल सी,
हर पल का साक्षी वह
स्मृतियाँ अति श्यामल सी !

श्वासों की माला को
हर पल ही याद रखें,
उसको ही कर अर्पित
मुक्ति का स्वाद चखें !

अर्थहीन सा जीवन
क्रीड़ा इक बन भाए,
कृत्यों का करना ही
उनका फल बन जाये !

जैसे वह बाँट रहा
दोनों ही हाथों से,
भर झोली बिखराएं
हम कुछ सौगातों से !

दाता वह दानी बन
ज्ञाता वह ज्ञानी बन,
उसकी ही थाती को
चरणों पर कर अर्पण !

उसकी महाशक्ति को
जगकर हम पहचानें,
उसकी महाभक्ति को
जीवन का फल मानें !

भीतर जो रहता है
युग-युग का है साथी,
मौनी जब होता मन
झलकाता शुभ ज्योति!

बुधवार, अक्टूबर 22

जीवन एक सुवास अनोखी

जीवन एक सुवास अनोखी 

ह्रदय शुद्ध हो 
भाव विमल हों 
मन भी खाली-खाली अपना 

जीवन जैसे कोई लीला 
या फिर भोर काल का सपना !

चाह न जागे
 लौ जब लागे  
अंतर चरणों पर झुक जाये 

जीवन जैसे गीत खुशी का 
या कान्हा की बंसी  गाये !

जो जैसा है 
वैसा ही हो 
मनस  से हर द्वन्द्व मिट जाये 

जीवन एक सुवास अनोखी 
पल-पल अपना साथ निभाये !

 भय कैसा अब
कैसी उलझन 
चला रहा है वह जग सारा 

जीवन इक उपहार अनोखा 
नित्य  नूतन राज खुल जाता !

कभी धूप है 
कभी बदरिया 
बदल रहा नित मौसम बाहर 

जीवन इकरस पलता भीतर
बिछी हो ज्यों फूल की चादर !

शांति बरसती 
कृपा बह रही 
जिस पल द्वार ह्रदय का खुलता

जीवन जैसे मधुर पहेली 
हौले-हौले अंतर खिलता !
 

बुधवार, जून 12

सुख खिलता सदा उजालों में

सुख खिलता सदा उजालों में


​​उलझ-पुलझ अंतर रह जाता  

अपने ही बनाये जालों में, 

जो भी चाहा वह मिला बहुत 

खो  डाला किन्हीं ख़्यालों में !


तम की चादर से ढाँप लिया 

सुख खिलता सदा उजालों में, 

परिवर्तन भी आया केवल 

चाय के कप के उबालों में !


जिनको खाकर तन कुम्हलाया 

हर राज था उन्हीं निवालों में, 

जो विस्मय से भर सकता मन 

उलझाया उसे सवालों में !


उड़ने को खुला गगन पाया 

ख़ुद घेरा इसे दिवालों में, 

जीवन की संध्या में पूछा 

क्या पाया भला बवालों में ?


सोमवार, फ़रवरी 20

ज्वाला कोई जले निरंतर

ज्वाला कोई जले निरंतर
बरस रहा है कोई अविरत
झर-झर झर-झर, झर-झर झर-झर
भीग रहा कब कोई पागल 
ढूँढे जाता सरवर, पोखर !

प्रीत गगरिया छलक रही है
 युगों-युगों से सर-सर सर-सर,
प्यासे कंठ न पीते लेकिन
 अकुलाये से खोजें निर्झर !

ज्वाला कोई जले निरंतर
बहे उजाला मद्धिम-मद्धिम,
राह टटोले नहीं मिले पर  
अंधकार में टकराते हम !

शब्दों में वह नहीं समाये
अंतर को ही अम्बर कर लें,
कैसे जग को उसे दिखाएँ
रोम-रोम में जिसको भर लें !

गाए रुन-झुन, रिन-झिन, निशदिन
हँसता हिम शिखरों के जैसा,
रत्ती भर भी जगह न छोड़े
बसा पुष्प में सौरभ जैसा !

रग-रग रेशा-रेशा पुलकित
कण-कण गीत उसी के गाये  ,
रिसता मधु सागर के जैसा
श्वास-श्वास में वही समाये !


गुरुवार, फ़रवरी 9

जिसने भी पहचाना सच को




जिसने भी पहचाना सच को  

मानस हंस ध्यान के मोती 
चुन-चुन कर नित पुलकित होता, 
सुमिरन की डोरी में जिसको 
अंतर मन लख, निरख पिरोता !

मुस्कानों में छलक उठेगी  
सच्चे मोती की शुभ आभा, 
जिसने भी पहचाना सच को  
दुनिया में है वही सुभागा !

ध्यान बिना अंतर मरुथल सम  
मन पंछी भी फिरे उदासा,
रस की भीनी धार बहेगी  
वह लेकिन प्यासा का प्यासा !

कोई भीतर डुबकी मारे 
छू भी लेता बस उस घट को, 
अमीय छलके जहाँ  निरन्तर 
खोले जब उर घूँघट पट को !

ध्यान बरसता कोमल रस सा 
कण-कण काया का भी हुलसे, 
खोजें इक सागर गहरा सा 
व्यर्थ त्रिविध आतप  में झुलसें !

तृप्त हुआ जब मन का सुग्गा 
केवल इक ही नाम रटेगा, 
कृत-कृत्य हो जगत में डोले 
जैसे मन्द समीर बहेगा !

या सुवास बनकर  फैलेगा  
जगती के इस सूनेपन में, 
शब्द सहज झरेंगे जैसे 
पारिजात झरते  उपवन में !

बुधवार, अक्टूबर 19

सत्य

सत्य 


सत्य अमोघ है 

आग है 

शीतल जलाभिषेक है 

इससे कोई बच नहीं  सकता 

सत्य हुए बिना कोई चैन से जी नहीं सकता 

इसका एक कण झूठ के हजार पर्वतों से ज्यादा बलशाली है 

सत्य पीछा नहीं छोड़ता 

जब तक आप उस पर चलना आरम्भ न कर दें 

यह अंतर का उल्लास है 

वाणी की मिठास है 

और आपसी विश्वास है

सत्य प्रेम की गर्माहट है 

दिल के रिश्तों की नर्माहट है 

सत्य का दामन थाम लें तो वहीं ले जाता है 

हमें अपने आप से मिलाता है 

सत्य नारायण है 

अति पावन है 

अनंत युगों से उसका ही आराधन है 

वह शिव का नर्तन है 

स्नेह का वर्तन है 

आओ उसके पथ पर चलें 

पल पल उससे ही मिलें !!


गुरुवार, जुलाई 21

अंतर में इक दीप जलाये

अंतर में इक दीप जलाये


खुद का खुद से मिलना कैसा 

कली-पुष्प में खिलने जैसा, 

लहर सिंधु में ज्यों खो जाये 

सुरभि चमन में भरने जैसा !


नभ में कोई खुले झरोखा 

जल का इक सरवर दिख जाये, 

छुपी शिला में मूरत कोई 

मन की आँखों से लख जाये !


ध्वनियों का इक मधुरिम आकर 

निशदिन कोई तान सुनाये, 

अम्बर में अनगिन सूरज हैं 

अंतर में इक दीप जलाये !


पलक झपकते ही जैसे यह 

जग पल में विलीन हो जाता, 

अद्भुत मिलन घटे जब तुझसे 

जगत कहीं नजर नहीं आता !


रविवार, जनवरी 2

खोया नहीं है जो

खोया नहीं है जो 

खोया नहीं है जो 

खोया हुआ सा लगता है 

जैसे शशि झील में 

सोया हुआ सा लगता है 

न ही दूर गया उससे 

न  जा सकता है बाहर 

कोई बीज धरा की गहराई में जैसे 

बोया हुआ सा लगता है 

प्रीत का जल, ऊष्मा उर की

जब जब बहती है 

 उस पल कोई मीत 

आया हुआ सा लगता है 

जो श्वासों में है 

बसता दिल की धड़कन में भी 

कैसे भला  नज़र हटे 

जिसके बिना नहीं अंतर 

धोया हुआ सा लगता है !


शुक्रवार, मई 21

प्रसाद

प्रसाद 


बरस रहा है कोई अनाम जल 

जो भिगोता है भीतर-बाहर सब कुछ 

भीग जाता है हर कोना कतरा अंतर  का 

तरावट से भर जाती है मन की माटी

इसका कोई स्रोत नजर नहीं  आता 

पर भर लेती है अपने आगोश में 

 प्रकाश की एक धारा 

बरसती है अकारण कभी-कभी 

शायद सदा ही 

पर नजर आती है कभी-कभी 

जाने क्यों !

शायद वह किसी का सन्देश लाती है 

अंतर को भरने आती है 

प्रेम और करुणा से 

सूना न रहे एक क्षण के लिए भी मन का घट

बहती रहे पुरवाई सदा मन के आंगन में 

वह जताने आती है अकेले नहीं हैं हम 

हर पल कोई साथ है 

 भर देती है अनोखी सिहरन रग-रग में 

 कर देती पावन शब्दों को भी अपने परस से 

कैलाश के हिमशिखरों सा 

 या गंगा के शीतल निर्मल जल जैसा  

मानसरोवर में तैरते हंसों की तरह 

अथवा उषा की लालिमा में छायी सूर्य की प्रथम रश्मि सी  

वह एक नजर है किसी गुरू की 

जो हर लेती है सारा विषाद शिष्य के अंतर का 

या एक स्पर्श  है माँ के हाथों का 

अथवा तो पिता का सबल आधार है 

जो शिशु को डिगने नहीं देता 

इन सबसे बढ़कर वह सहज प्रेम है 

या उसमें सब कुछ समाया है 

वह किसी सीमा में नहीं बंधता 

उसे मापा नहीं जा सकता  

वह अज्ञेय है 

अपार है, अनंत है 

तो फिर यही कह दें 

वह ‘उसी’ का प्रसाद है ! 



 

गुरुवार, मार्च 19

कोरे कागज सा जो मन था

कोरे कागज सा जो मन था 


जब अनजान बना फिरता था 
तब तेरे दीवाने थे हम,  
जब से आना-जाना हुआ है 
बेगाना सा क्यों लगता है !
 
रीत प्रीत की अजब निराली 
सदा अधूरी चाहें दिल की, 
जाने किसकी नजर लगी है 
रस्ता धूमिल सा लगता है !
 
कोरे कागज सा जो मन था 
अति उज्ज्वल शिखर हिमालय का, 
मटमैले दरिया सा बहता 
पथ भूला-भूला लगता है  
 
किन्तु याद इक पावन उर की  
अहर्निश वही याद दिलाती 
एक पुकार उठी जब दिल से 
भावों का निर्झर बहता है  
 
नहीं शुष्क है अंतर गहरा 
गहरे जाकर यदि खंगाले,
किन्तु खड़ा जो प्यासा तट पर 
 जग उसको सूना लगता है !

शुक्रवार, फ़रवरी 14

ढाई आखर जिसने बांचे

ढाई आखर जिसने बांचे 



ढाई आखर जिसने बाँचे अंतर पिघल-पिघल बह जाये, अधरों पर स्मित नयन मद भरे एक रहस्य मधुर बन जाये ! कदमों में मीरा की थिरकन कानों में कान्हा मुरली धुन, यादें पनघट बनी डोलतीं घटता पी से मिलन प्रतिक्षण ! मानस के उत्तंग शिखर से भावों की इक नदी उतरती कण-कण उर का डूबे जिसमें धुली-धुली मनकाया हँसती ! खो जाता ज्यों नीलगगन में हंस अकेला उड़ता कोई, अंतर सागर में मिल जाता तृप्त हुआ दीवाना सोई !


सोमवार, फ़रवरी 3

पारिजात हों उपवन में

पारिजात बिखरें उपवन में

मानस हंस ध्यान के मोती 

चुन-चुन कर पुलकित होता है , 

सुमिरन की डोरी में जिसको 

अंतर मन निरख पिरोता है  !


मुस्कानों में छलक उठेगी  

सच्चे मोती की शुभ आभा, 

जिसने पहचाना है सच को  

इस दुनिया में वही सुभागा !


ध्यान बिना अंतर है मरुथल 

मन पंछी भी फिरे उदासा,

रस की भीनी धार बह रही  

वह है क्यों प्यासा का प्यासा !


कोई भी जो डुबकी मारे 

छू ही लेता उस पनघट को, 

अमृत छलके जहाँ अनवरत 

खोलो मन के घूँघट पट को !


ध्यान बरसता कोमल रस सा 

कण-कण काया का भी हुलसे, 

खोजें इक सागर गहरा सा 

व्यर्थ ताप में क्योंकर झुलसें !


तृप्त हुआ जब मन यह सुग्गा 

बस उसका ही नाम रटेगा, 

कृत-कृत्य हो  जगत में डोले 

जैसे मन्द समीर बहेगा !


या सुवास बनकर फैलेगा  

जगती  के इस सूनेपन में, 

शब्द सहज झरेंगे जैसे 

पारिजात बिखरें  उपवन में !


सोमवार, जुलाई 24

कविता हुंकारना चाहती है

कविता हुंकारना चाहती है

छिपी है अंतर के गह्वर में
या उड़ रही है नील अंतरिक्ष की ऊँचाईयों में
घूमती बियाबान मरुथलों में
या डुबकी लगाती है सागर की गहराइयों में
तिरती गंगा की शांत धारा संग
कभी डोलती बन कावेरी की ऊंची तरंग
खोज रही है अपना ठिकाना
झांकती नेत्रों में... नहीं उसके लिए कोई अजाना
 घायल हो सुबकती हिंसक भीड़ देख
पड़ जाती मस्तक पर नहीं मिटने वाली रेख
 पूछती कितने सवाल
क्यों धर्म, जाति और देश की
हदों के नाम पर इतना बवाल
तोड़ कर हर घेरा झाँकना चाहती है
जातीयता की संकीर्ण दीवारों के पार
शांति की मशाल बन जलना चाहती है
बरसना चाहती है शीतल फुहार बनकर
जला दिए जिनके स्कूल
चंद सिरफिरे वहशी दरिंदों ने
उन मासूमों के गाँव पर
उनके जमीरों के भीतर भी ढूँढना चाहती है
इंसानियत की एक खोयी किरण
सोये हुए लोगों को जगाने के लिए
अमन और चैन की हवा बहाने के लिए
आंधी बनकर घुमड़ना चाहती है
गरज-गरज कर
कविता हुंकारना चाहती है !

गुरुवार, जुलाई 6

बन जाता वह खुद ही मस्ती


बन जाता वह खुद ही मस्ती 

मस्ती की है प्यास सभी को
हस्ती की तलाश सभी को

मस्ती जो बिछड़े न मिलकर
हस्ती जो बोले बढ़चढ़ कर

दोनों का पर जोड़ नहीं है
इस सवाल का तोड़ नहीं है

हस्ती मिटे तो मस्ती मिलती
यह सूने अंतर में खिलती

हस्ती तो है एक उसी की
मस्ती जिसके नाम में बसती

मिटा दी जिसने खुद की हस्ती

बन जाता वह खुद ही मस्ती 

गुरुवार, अक्टूबर 30

प्राणों में बसंत छाएगा

प्राणों में बसंत छाएगा


फूल चढ़ाए जाने कितने
फिर भी दूर रहा वह प्रियतम,
प्राणों में बसंत छाएगा
अर्पित होगी जिस पल धड़कन !

कोरा कोरा नाम जपा था
फिर कैसे रस उपजे बाड़ी,
उससे भी तो जग ही माँगा
निर्झर बहा न विकसी क्यारी !

वह तो लुटने को है आतुर
यहाँ जमाए अपनी धूनी,
कैद किया सीमा में खुद को
हर कोई बन गया अलूनी !

कतरा कतरा रस में भीगा
रग रग में बह रहा छंद सा,
मंद स्वरों में रुनझुन गूँजे
जैसे झरता फूल गंध सा  !

क्यों फिर दूर रहे जग उससे
भेद न जाने विस्मित अंतर,
जहाँ सुखों की लहर दौड़ती
वहाँ गमों सा लगे समुन्दर !







बुधवार, अगस्त 13

उसने भी कर दिया इशारा

उसने भी कर दिया इशारा

रंग हमारे हाथ लगे हैं
कैनवास है यह जग सारा,
रंगी इसे बना डालें अब
उसने भी कर दिया इशारा !

कोई गीत रचे जाता है
हम भी सुर अपने कुछ गा लें,
गूँजे स्वर्णिम स्वर लहरियाँ
उन संग आशाएं सजा लें !

रचा जा रहा पल-पल यह जग
सृजन हमारे हाथों कुछ हो,
कोई मौन सजाता निशदिन
मिलन हृदय का उससे भी हो !

बिन मांगे ही जो देता है
देख तृप्त होता है अंतर,
नजर जहाँ भी टिक जाती है
उसका ही तो दिखता मंजर !