बुधवार, अगस्त 26
श्वासों की समिधा को
बुधवार, अक्टूबर 22
जीवन एक सुवास अनोखी
बुधवार, जून 12
सुख खिलता सदा उजालों में
सुख खिलता सदा उजालों में
उलझ-पुलझ अंतर रह जाता
अपने ही बनाये जालों में,
जो भी चाहा वह मिला बहुत
खो डाला किन्हीं ख़्यालों में !
तम की चादर से ढाँप लिया
सुख खिलता सदा उजालों में,
परिवर्तन भी आया केवल
चाय के कप के उबालों में !
जिनको खाकर तन कुम्हलाया
हर राज था उन्हीं निवालों में,
जो विस्मय से भर सकता मन
उलझाया उसे सवालों में !
उड़ने को खुला गगन पाया
ख़ुद घेरा इसे दिवालों में,
जीवन की संध्या में पूछा
क्या पाया भला बवालों में ?
सोमवार, फ़रवरी 20
ज्वाला कोई जले निरंतर
गुरुवार, फ़रवरी 9
जिसने भी पहचाना सच को
बुधवार, अक्टूबर 19
सत्य
सत्य
सत्य अमोघ है
आग है
शीतल जलाभिषेक है
इससे कोई बच नहीं सकता
सत्य हुए बिना कोई चैन से जी नहीं सकता
इसका एक कण झूठ के हजार पर्वतों से ज्यादा बलशाली है
सत्य पीछा नहीं छोड़ता
जब तक आप उस पर चलना आरम्भ न कर दें
यह अंतर का उल्लास है
वाणी की मिठास है
और आपसी विश्वास है
सत्य प्रेम की गर्माहट है
दिल के रिश्तों की नर्माहट है
सत्य का दामन थाम लें तो वहीं ले जाता है
हमें अपने आप से मिलाता है
सत्य नारायण है
अति पावन है
अनंत युगों से उसका ही आराधन है
वह शिव का नर्तन है
स्नेह का वर्तन है
आओ उसके पथ पर चलें
पल पल उससे ही मिलें !!
गुरुवार, जुलाई 21
अंतर में इक दीप जलाये
अंतर में इक दीप जलाये
खुद का खुद से मिलना कैसा
कली-पुष्प में खिलने जैसा,
लहर सिंधु में ज्यों खो जाये
सुरभि चमन में भरने जैसा !
नभ में कोई खुले झरोखा
जल का इक सरवर दिख जाये,
छुपी शिला में मूरत कोई
मन की आँखों से लख जाये !
ध्वनियों का इक मधुरिम आकर
निशदिन कोई तान सुनाये,
अम्बर में अनगिन सूरज हैं
अंतर में इक दीप जलाये !
पलक झपकते ही जैसे यह
जग पल में विलीन हो जाता,
अद्भुत मिलन घटे जब तुझसे
जगत कहीं नजर नहीं आता !
रविवार, जनवरी 2
खोया नहीं है जो
खोया नहीं है जो
खोया नहीं है जो
खोया हुआ सा लगता है
जैसे शशि झील में
सोया हुआ सा लगता है
न ही दूर गया उससे
न जा सकता है बाहर
कोई बीज धरा की गहराई में जैसे
बोया हुआ सा लगता है
प्रीत का जल, ऊष्मा उर की
जब जब बहती है
उस पल कोई मीत
आया हुआ सा लगता है
जो श्वासों में है
बसता दिल की धड़कन में भी
कैसे भला नज़र हटे
जिसके बिना नहीं अंतर
धोया हुआ सा लगता है !
शुक्रवार, मई 21
प्रसाद
प्रसाद
बरस रहा है कोई अनाम जल
जो भिगोता है भीतर-बाहर सब कुछ
भीग जाता है हर कोना कतरा अंतर का
तरावट से भर जाती है मन की माटी
इसका कोई स्रोत नजर नहीं आता
पर भर लेती है अपने आगोश में
प्रकाश की एक धारा
बरसती है अकारण कभी-कभी
शायद सदा ही
पर नजर आती है कभी-कभी
जाने क्यों !
शायद वह किसी का सन्देश लाती है
अंतर को भरने आती है
प्रेम और करुणा से
सूना न रहे एक क्षण के लिए भी मन का घट
बहती रहे पुरवाई सदा मन के आंगन में
वह जताने आती है अकेले नहीं हैं हम
हर पल कोई साथ है
भर देती है अनोखी सिहरन रग-रग में
कर देती पावन शब्दों को भी अपने परस से
कैलाश के हिमशिखरों सा
या गंगा के शीतल निर्मल जल जैसा
मानसरोवर में तैरते हंसों की तरह
अथवा उषा की लालिमा में छायी सूर्य की प्रथम रश्मि सी
वह एक नजर है किसी गुरू की
जो हर लेती है सारा विषाद शिष्य के अंतर का
या एक स्पर्श है माँ के हाथों का
अथवा तो पिता का सबल आधार है
जो शिशु को डिगने नहीं देता
इन सबसे बढ़कर वह सहज प्रेम है
या उसमें सब कुछ समाया है
वह किसी सीमा में नहीं बंधता
उसे मापा नहीं जा सकता
वह अज्ञेय है
अपार है, अनंत है
तो फिर यही कह दें
वह ‘उसी’ का प्रसाद है !
गुरुवार, मार्च 19
कोरे कागज सा जो मन था
शुक्रवार, फ़रवरी 14
ढाई आखर जिसने बांचे
सोमवार, फ़रवरी 3
पारिजात हों उपवन में
मानस हंस ध्यान के मोती
चुन-चुन कर पुलकित होता है ,
सुमिरन की डोरी में जिसको
अंतर मन निरख पिरोता है !
मुस्कानों में छलक उठेगी
सच्चे मोती की शुभ आभा,
जिसने पहचाना है सच को
इस दुनिया में वही सुभागा !
ध्यान बिना अंतर है मरुथल
मन पंछी भी फिरे उदासा,
रस की भीनी धार बह रही
वह है क्यों प्यासा का प्यासा !
कोई भी जो डुबकी मारे
छू ही लेता उस पनघट को,
अमृत छलके जहाँ अनवरत
खोलो मन के घूँघट पट को !
ध्यान बरसता कोमल रस सा
कण-कण काया का भी हुलसे,
खोजें इक सागर गहरा सा
व्यर्थ ताप में क्योंकर झुलसें !
तृप्त हुआ जब मन यह सुग्गा
बस उसका ही नाम रटेगा,
कृत-कृत्य हो जगत में डोले
जैसे मन्द समीर बहेगा !
या सुवास बनकर फैलेगा
जगती के इस सूनेपन में,
शब्द सहज झरेंगे जैसे
पारिजात बिखरें उपवन में !
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