वह
जैसे माँ करती है स्वच्छ
दुधमुहें बच्चे के मैले वस्त्र
स्नेह भरे अंतर में..
वह करता है दूर हमारे मन से
मैल की परत दर परत..
जब ईश्वर निर्विकार तकता रहता है भीतर
वह लेता है जिम्मा गर्द हटाने का
जो हमारे भीतर है
वह जानता है मन की गहराई में छिपे
संशयों के सर्पों को
वह जानता है अचेतन की गुफाओं में
हैं कुछ दंश देने वाले जीव
बल देता है शिष्य को
कि वह झाड़ बुहार सके हर इक कोना
जैसे माँ स्वीकारती है बच्चे का हर दुर्गुण
उसी प्रेम से वह भी स्वीकारता है
मन के दाँव-पेंच
मन की सिलवटें
शर्त यही है जैसे माँ पर भरोसा करता है बच्चा
आँख मूंद कर
भरोसा जगे भीतर, वह साथ है हमारे....
और तब झरता है भीतर झरना
प्रेम, शांति और आनंद का..
भीग जाता है कण कण
और बहती है सुरभित हवा इर्द-गिर्द
करती सुवासित वातावरण को
जुड़ जाता है एक रिश्ता
इस जगत से और जगदीश से भी..
और तब झरता है भीतर झरना
प्रेम, शांति और आनंद का..
भीग जाता है कण कण
और बहती है सुरभित हवा इर्द-गिर्द
करती सुवासित वातावरण को
जुड़ जाता है एक रिश्ता
इस जगत से और जगदीश से भी..