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शुक्रवार, जून 22

जाने कब फिर मिलना हो


जाने कब फिर मिलना हो


कुछ तुम कह दो, कुछ हम सुन लें
कलियों का कब खिलना हो
जाने कब फिर मिलना हो !

चंद श्वास लेकर आये थे
कुछ ही शेष रही हैं जिनमें,
कहीं अधूरा न रह जाये
किस्सा, हम तुम मिले थे जिसमें !

तुम झाँकों मेरे नयनों में
फुरसत ऐसी कल ना हो,  
जाने कब फिर मिलना हो !

कितने संगी चले जा चुके
अभिनय करते थके थे शायद,
मंच कभी खाली न हुआ यह
स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !

पलकों को न बंद करो तुम
जाने किस पल चलना हो
 जाने कब फिर मिलना हो !

जितना साथ मिला सुंदर था
इक-दूजे में झलक भी पायी,
स्वप्नों में वह छिपी न रहती
जग कहता है जिसे खुदाई !

हाथ थाम लो पल भर को तुम
अधरों का कब सिलना हो
जाने  कब फिर मिलना हो !