शुक्रवार, जून 22

जाने कब फिर मिलना हो


जाने कब फिर मिलना हो


कुछ तुम कह दो, कुछ हम सुन लें
कलियों का कब खिलना हो
जाने कब फिर मिलना हो !

चंद श्वास लेकर आये थे
कुछ ही शेष रही हैं जिनमें,
कहीं अधूरा न रह जाये
किस्सा, हम तुम मिले थे जिसमें !

तुम झाँकों मेरे नयनों में
फुरसत ऐसी कल ना हो,  
जाने कब फिर मिलना हो !

कितने संगी चले जा चुके
अभिनय करते थके थे शायद,
मंच कभी खाली न हुआ यह
स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !

पलकों को न बंद करो तुम
जाने किस पल चलना हो
 जाने कब फिर मिलना हो !

जितना साथ मिला सुंदर था
इक-दूजे में झलक भी पायी,
स्वप्नों में वह छिपी न रहती
जग कहता है जिसे खुदाई !

हाथ थाम लो पल भर को तुम
अधरों का कब सिलना हो
जाने  कब फिर मिलना हो !


13 टिप्‍पणियां:

  1. जाने कब मिलना हो.....

    बहुत सुन्दर अनीता जी...

    अनु

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.......

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  3. कितने संगी चले जा चुके
    अभिनय करते थके थे शायद,
    मंच कभी खाली न हुआ यह
    स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !


    bahut khoobsurat kavita.

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  4. कितने संगी चले जा चुके
    अभिनय करते थके थे शायद,
    मंच कभी खाली न हुआ यह
    स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !

    बहुत ही सुन्दर कविता....सच कल का क्या भरोसा ।

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  5. बहुत उत्कृष्ट भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति...आभार

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  6. कितने संगी चले जा चुके
    अभिनय करते थके थे शायद,
    मंच कभी खाली न हुआ यह
    स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !

    पलकों को न बंद करो तुम
    जाने किस पल चलना हो
    जाने कब फिर मिलना हो !

    कितना सच कहा है ………जाने कब फिर मिलना हो………अति सुन्दर प्रस्तुति।

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  7. कितने संगी चले जा चुके
    अभिनय करते थके थे शायद,
    मंच कभी खाली न हुआ यह
    स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !

    सच कहा है आपने अनीता जी क्या भरोसा इस जीवन का... जाने कब फिर मिलना हो... सुन्दर प्रस्तुति...

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  8. बहुत बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  9. हाथ थाम लो पल भर को तुम
    अधरों का कब सिलना हो
    जाने कब फिर मिलना हो !

    पता नहीं कल हो ना हो. बेहतरीन भावपूर्ण प्रस्तुति.

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  10. सुन्दर सत्य कहती सुन्दर कृति.. आभार..

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  11. सही कहा...अभिनय-मंच कभी खाली नहीं होता..

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